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नेपाली माओवाद पर फिल्म को सेंसर बोर्ड की ना

नेपाली माओवाद पर फिल्म को सेंसर बोर्ड की ना

नई दिल्ली. 25 जून 2010


सेंसर बोर्ड ने नेपाल पर बने वृत्तचित्र ''फ्लेम्स ऑफ दि स्नो'' को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र देने से इंकार कर दिया है. बोर्ड का मानना है कि 'यह फिल्म नेपाल के माओवादी आंदोलन की जानकारी देती है और उसकी विचारधारा को न्यायोचित ठहराती है.'

prachand maoist


बोर्ड की राय में हाल के दिनों में देश के कुछ हिस्सों में फैली माओवादी हिंसा को देखते हुए इस फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जा सकती. 'ग्रिन्सो' और 'थर्ड वर्ल्ड मीडिया' के बैनर तले बनी 125 मिनट की इस फिल्म के निर्माता नेपाल मामलों के विशेषज्ञ वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा हैं और इसका निर्देशन किया है आशीष श्रीवास्तव ने. फिल्म की पटकथा भी आनंद स्वरूप वर्मा ने लिखी है.

बोर्ड के इस फैसले पर हैरानी प्रकट करते हुए पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि इस फिल्म में भारत में चल रहे माओवादी आंदोलन का जिक्र तक नहीं है. इसमें बस निरंकुश राजतंत्र और राणाशाही के खिलाफ नेपाली जनता के संघर्ष को दिखाया गया है.

उन्होंने कहा कि 1770 ई. में पृथ्वी नारायण शाह द्वारा नेपाल राज्य की स्थापना के साथ राजतंत्र की शुरुआत हुई जिसकी समाप्ति 2008 में गणराज्य की घोषणा के साथ हुई. इन 238 वर्षों के दौरान 105 वर्ष तक राणाशाही का भी दौर था जिसे नेपाल के इतिहास के एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है.

फिल्म में बताया गया है कि किस प्रकार 1876 में गोरखा जिले के एक युवक लखन थापा ने राणाशाही के अत्याचारों के खिलाफ किसानों को संगठित किया जिसे राणा शासकों ने मृत्युदंड दिया. लखन थापा को नेपाल के प्रथम शहीद के रूप में याद किया जाता है. निरंकुश तानाशाही व्यवस्था के खिलाफ 'प्रजा परिषद' और 'नेपाली कांग्रेस' के नेतृत्व में चले आंदोलनों का जिक्र करते हुए फिल्म माओवादियों के नेतृत्व में 10 वर्षों तक चले सशस्त्र संघर्ष पर केंद्रित होती है और बताती है कि किस प्रकार इसने ग्रामीण क्षेत्रों में सामंतवाद की जड़ों पर प्रहार करते हुए शहरी क्षेत्रों में जन आंदोलन के जरिए जनता को जागृत किया.

उन्होंने कहा कि फिल्म राजतंत्र की स्थापना से शुरू हो कर, संविधान सभा के चुनाव, चुनाव में माओवादियों के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित होने, राजतंत्र के अवसान और गणराज्य की घोषणा के साथ समाप्त होती है. सेंसर बोर्ड की आपत्ति को ध्यान में रखें तो ऐसा लगता है कि नेपाल पर कोई राजनीतिक फिल्म बनाने की यह अनुमति नहीं देगा. कारण यह कि आज माओवादियों की प्रमुख भूमिका को रेखांकित किए बिना नेपाल पर कोई राजनीतिक फिल्म बनाना संभव ही नहीं है.

आनंद स्वरुप वर्मा का कहना है कि नेपाल में माओवादी पार्टी की मई 2009 तक सरकार थी और इस पार्टी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल उर्फ प्रचंड प्रधनमंत्री की हैसियत से भारत सरकार के निमंत्रण पर भारत की यात्रा पर आए थे. नेपाल की मौजूदा संविधान सभा में माओवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है और प्रमुख विपक्षी दल है.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

bhagat singh raipur c.g.

 
 बहुत अच्छा. आपातकाल में तो गाँधी जी और नेहरु जैसे राष्ट्रवादी की किताबें सेंसर हो सकती हैं तो ये तो नेपाल की राजशाही के खिलाफ बदलाव की बात हैं. बंगाल, केरला और त्रिपुरा में कम्यूनिस्ट की चुनी हुई सरकार के बाबजूद हमारे यहाँ लाल सलाम को भी नक्सल का स्लोगन ही कहते हैं. फिल्म तो भारत में दिखाई देगी ही क्योंकि जिस पर रोक लगती हैं वो आसानी से बाजार में मिल जाती है. यह भी सब जानते हैं की भारत तो राजशाही के बचे रहने के लिए पूरे प्रयास कर रहा था, और सहायता भी दे रहा था. 
   

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