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सांसद द्वारा जारवा आदिवासियों के बच्चे छीनने का प्रस्ताव

सांसद द्वारा जारवा आदिवासियों के बच्चे छीनने का प्रस्ताव

नई दिल्ली (छत्तीसगढ़ संवाददाता). 2 जुलाई 2010

अंडमान निकोबार द्वीप समूह से भारतीय जनता पार्टी के सांसद बिश्नुपाद रे द्वारा जारवा आदिवासियों के बच्चों को मुख्य धारा में लाने के लिए उनके कबीले से अलग करने के प्रस्ताव का दुनिया भर में भारी विरोध हो रहा है. रे ने यह प्रस्ताव द्वीप विकास प्राधिकरण की जुलाई में होने वाली बैठक के पहले किया है.

भाजपा सांसद ने इस प्रस्ताव में कहा है कि दक्षिण और मध्य अंडमान में जारवा आदिवासियों के रिहाईश वाले इस इलाके में लागू प्रतिबंधों के कारण पोर्ट ब्लेयर को दक्षिण, मध्य और उत्तरी अंडमान से जोड़ते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग और रेल लाईन परियोजना रुकी पड़ी है यह रोक हटाने की मांग करते हुए भाजपा सांसद ने जारवा आदिवासियों से सम्बंधित इस प्रस्ताव में कहा है कि विकास की प्रारम्भिक अवस्था में पड़े महज 300 आदिवासियों को संसाधन देने के नाम पर 4 लाख लोगों को विकास और सुविधाओं से वंचित रखना तार्किक नहीं है. उन्होंने मांग की है कि झारखंड के सिंहभूम और खुंटी जिलों की तर्ज पर 6 से 12 साल की उम्र के जारावा बच्चों को उनके कबीलों से निकाल कर सामान्य स्कूलों में पढ़ाने के लिए कदम उठाने की तात्कालिक जरूरत है.

सांसद ने अपने प्रस्ताव में कहा है कि झारखंड के इन आदिवासी बच्चों को इस तरह रखने से बह जल्दी ही लिखना पढ़ना, निजी स्वच्छता और मुख्य धारा के लोगों की तरह खाना पीना सीख गए. उन्हें आधुनिक सुविधाओं जैसे टेलिविजन और मोटर वाहनों से भी परिचित करवाया गया. झारखंड में किए गए इस प्रयोग में इन बच्चों को 6 महीने तक मुख्यधारा के जीवन में रखने के बाद वापस उनके कबीले के बीच भेजा गया, और एक महीने बाद उनसे दोबारा सम्पर्क किया गया तो उनके कपडे और मुख्य धारा की कुछ आदतें वह गंवा चुके थे. यह भी पाया गया कि कबीले के लोगों ने भी कपड़े पहनने और निजी स्व.छता जैसी मुख्य धारा की कुछ बातें अपना ली थीं.

प्रस्ताव में कहा गया है कि इन्हीं बच्चों के साथ यह कवायद पहले से .यादा समय के लिए की गई और इसके जरिये प्रशिक्षक आदिवासी इलाकों में घुस पाने, और उन्हें स्वच्छ कपड़े पहनने और पका हुआ खाने, खेती किसानी और बागबानी की बुनियादी तकनीकें जैसी बातें सिखाने में कामयाब रहे. इसका नतीजा यह रहा कि वह पूरी आदिवासी आबादी झारखंड के किसी भी आदिवासी गांव जैसी हो गई. भाजपा सांसद ने कहा है कि खुद जारावा लोगों की भलाई इसी में है कि उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए.

पूरी दुनिया में मूल आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे लोगों और संगठनों ने भाजपा सांसद के इस प्रस्ताव को आस्ट्रेलिया और उणरी अमरीका में आदिवासियों की चुराई गई पीढ़ी खड़ी करने की कोशिशों जैसा बताया है. कनाडा के नेशनल रेसिडेंशियल स्कूल सर्वाईवर्स (एनआरएसएसएस) के कार्यकारी निदेशक माईकल कशागी ने कहा है कि आज के जमाने में वह इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि कनाडा और दुनिया के दूसरे हिस्सों में इस तरह के आवासीय स्कूलों का भयानक इतिहास देखने के बाद भी कोई देश अपने नागरिकों, खासकर बच्चों के बारे में ऐसा सोच भी सकता है.

ब्राज़ील के एक संगठन यानोमामी के नेता दावी कोपेनावा यानोमामी ने इस प्रस्ताव को बहुत खराब बताते हुए कहा है जारावा के जंगल इन आदिवासियों के घर हैं. वह अपने इलाके में हैं. उनकी अपनी संस्कृति और परम्पराएं हैं. सरकार अगर उनके बच्चों को छीनकर उन्हें स्कूलों में डाल देगी तो वह अपनी संस्कृति खो देंगे. उन्हें जंगल छोड़कर स्कूल या नगर में रहने को कहना एक अपराध है. सर्वाईवल इंटरनेशनल के निदेशक स्टीफन कोरी ने कहा कि यह प्रस्ताव मूल नागरिकों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा के लिए राष्ट्र संण द्वारा तय किए गए मानदंडों दोनों का अपमान है. जारावा लोगों को उनकी जीवन शैली छोड़ने के लिए मजबूर करने की कोशिशें उन्हें नष्ट कर देंगी. उल्लेखनीय है कि 2002 में सर्वोच्च न्यायालय ने जारावा लोगों की सुरक्षा के लिए अंडमान ट्रंक रोड बंद करने का आदेश दिया था.