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आज़ाद की मौत शांति वार्ता के लिये गंभीर झटका- अग्निवेश

आज़ाद की मौत शांति वार्ता के लिये गंभीर झटका- अग्निवेश

कोलकाता. 8 जुलाई 2010


माओवादियों और केंद्र सरकार के बीच शांति वार्ता के लिये मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे स्वामी अग्निवेश ने कहा है कि माओवादियों के पोलित ब्यूरो सदस्य चेरुकुरी राजकुमार ऊर्फ आज़ाद की मौत शांति वार्ता के लिये एक गहरा आघात है. उन्होंने कहा कि पिछले दो महीने से शांति वार्ता के लिये चल रहे प्रयास को यह एक गंभीर झटका है.

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पत्रकारों से बातचीत में आज़ाद और पत्रकार हेमचंद पांडेय के मौतों की न्यायिक जांच की मांग करते हुए स्वामी अग्निवेश ने कहा कि मैं यह कहने की स्थिति में नहीं हूं कि यह फर्जी मुठभेड़ थी या नहीं. लेकिन आज़ाद की मौत के बाद माओवादियों और सरकार के बीच अविश्वास का वातावरण पैदा हो गया है और एक स्वस्थ माहौल फिर से बनाने की जिम्मेवारी सरकार की है.

उन्होंने कहा कि 11 मई को केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने उन्हें बुलाया था और माओवादियों से बातचीत के लिये 72 घंटे के लिये युद्ध विराम और हिंसा का रास्ता छोड़ कर लोकतांत्रिक तरीके से सामने आने संबंधी पत्र सौंपा था. 31 मई को उन्हें माओवादी प्रवक्ता आज़ाद का पत्र मिला, जिसमें बातचीत से पहले अपने शीर्ष नेताओं की रिहाई, ऑपरेशन ग्रीन हंट रोकने और आदिवासी इलाकों से सुरक्षाबलों को हटाने संबंधी शर्त रखी गई थी.

स्वामी अग्निवेश के अनुसार इन परिस्थितियों में उन्होंने पी चिदंबरम से मुलाकात की और जिसमें गृहमंत्री ने माओवादियों द्वारा 72 घंटे के लिये हिंसा रोकने संबंधी कोई जवाब नहीं मिलने की बात कही. स्वामी अग्निवेश ने कहा कि उनके आस्ट्रेलिया दौरे पर जाते समय यह उम्मीद थी कि सरकार और नक्सलियों के बीच शांति वार्ता को लेकर कोई सकारात्मक उत्तर प्राप्त होगा लेकिन 4 जुलाई को जब भारत वापसी हुई तो आज़ाद की मौत की खबर उन्हें मिली.

पत्रकार वार्ता में उपस्थित नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर ने कहा कि सरकार कारपोरेट घरानों के पक्ष में है और प्राकृतिक और खनिज संसाधन इन घरानों को सौंपने के लिये आदिवासियों को उनके इलाके से बेदखल कर रही है.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Leh

 
 स्वामी जी,
आप सन्यासी हैं. ये सत्ताधारी हैं, जिनकी नीतियों से बीमारी पैदा होती है. सीधी सी बात है की सियासत और समाज में बड़ा रुतबा चाहने वालों के कारण ही एक दिन छोटे-छोटे सपने देखने वाले लोग अचानक खूंखार हो उठते हैं. अब सत्ताधारी लोगों की सुविधा-परस्ती को चैन नहीं मिलने वाला. आप निराश न हों. अपनी भूमिका अडिग होकर निभाएं.
 
   

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