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पीएसएलवी सी-15 अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक प्रक्षेपित

पीएसएलवी सी-15 अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक प्रक्षेपित

श्रीहरिकोटा. 12 जुलाई 2010

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने सोमवार को ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसलवी-सी 15) का श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफल प्रक्षेपण किया. इस रॉकेट ने प्रक्षेपित होने के बाद रिमोट सेंसिंग उपग्रह कार्टोसेट-2 बी समेत पाँच उपग्रहों को उनकी कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया. चार चरण वाले 44.4 मीटर लंबे पीएसएलवी सी-15 को 51 घंटे की उलटी गिनती पूरी होने के बाद आज सुबह नौ बज कर 22 मिनट पर प्रक्षेपित किया गया.

पीएसएलवी यान ने रिमोट सेंसिंग उपग्रह 'कार्टोसेट-2 बी' के अलावा चार उपग्रहों को एक के बाद एक उनकी कक्षा में स्थापित किया. इन उपग्रहों में अल्जीरिया का अलसैट, कनाडा और स्विट्जरलैंड के एक-एक नैनो उपग्रह और आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक के सात इंजीनियरिंग छात्रों द्वारा निर्मित छोटा सा उपग्रह 'स्टुडसेट' शामिल हैं. इस अवसर पर इसरो के प्रमुख डॉ के राधाकृष्णन ने वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘ये बड़ी सफलता है. हमने दूसरे देशों के उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने में सफलता प्राप्त की है.’’

इस अवसर पर योजना आयोग के चेयरमैन मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी मौजूद थे. उन्होंने इसरो को इस सफलता पर कहा कि इसरो ने देश को गौरव का एहसास कराया है और मैं उनको सभी लोगों की तरफ से बधाई देता हूं.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Himalayas

 
 बधाई! वैज्ञानिकों से एक प्रार्थना है. हिमालय में आज भी अज्ञात स्थानों से आती-जाती उड़न खटोले जैसी चीज़ें अचानक दिखाई देती हैं. मेरे पड़ोस चंद्रताल में तो खुद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के वैज्ञानिक अपनी आँखों से उन्हें देख चुके हैं. यह खबर पूरी दुनिया में प्रसारित भी हुयी थी. मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है की विज्ञान धरती पर मौजूद रहस्यों का पता लगाने में गहरी दिलचस्पी नहीं ले रहा है, जबकि हिमालय के कुछ अनपढ़ लोग भी इन उड़नखटोलों का रहस्य बता सकते है.

दलाई लामा से पूछें तो वे बताएँगे की किस तरह से मनुष्य गुरुत्वाकर्षण पर विजय पाकर आकाश में उड़ सकता है या इतनी तेज़ी से चल सकता है की उसके पांव धरती से न छुएं. कर्मापा लामा इसी तेज़ी से चाइना के चंगुल से छूट कर हिमाचल प्रदेश पहुंचे थे और खुद चाइना चकित रह गया था की 14 वर्ष का एक किशोर कैसे इतनी जल्दी हिमाचल जा पहुंचा. आशा है, वैज्ञानिक धरती पर मौजूद करिश्मों पर पहले खोज-बीन करने में रूचि लेंगे.
 
   

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