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रमण-विश्वरंजन में खिंची तलवार

रमण-विश्वरंजन में खिंची तलवार

रायपुर. (छत्तीसगढ़) 17 जुलाई 2010

 

सीआरपीएफ के विशेष डीजी विजय रमण ने एक पत्रिका के आने वाले अंक में छप रहे एक इंटरव्यू में छत्तीसगढ़ के चर्चित पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन पर करारा हमला किया है. उन्होंने कहा कि विश्वरंजन कोई बात सुनते नहीं हैं और उन्होंने उनके बनाए हुए ऑपरेशन ग्रीन हंट से असहमति जाहिर की. उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में अवैध हत्याओं से समस्या बढ़ी है.

raman-vishwaranjan


‘द वीक’ पत्रिका के आगामी अंक में रमण ने कहा है ‘‘डीजीपी सुन नहीं रहे हैं. दरअसल बात यह है कि जब कभी आपको कोई काम सौंपा गया हो तो जिस चीज को आपको सबसे पहले करने की जरूरत है वह समाधान का हिस्सा बनना है. गैर-कानूनी हत्याओं ने समस्या में अपना योगदान दिया है. इसलिए यदि आप इसमें पार्टी हैं तो आप समस्या का भी एक हिस्सा बन जाते हैं.’’ यह पूछे जाने पर कि क्या ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ ने आम लोगों में गलत संदेश दिया है, इस पर रमण ने कहा ‘‘यह ऑपरेशन छत्तीसगढ़ के डीजीपी की रचना है. मैं इसे नहीं मानता. जहां तक भारत सरकार का मानना है, यह वजूद में नहीं है.’’ रमण से जब यह पूछा गया कि उन्होंने छत्तीसगढ़ को सबसे ज्यादा चुनौतियों से भरा राज्य क्यों कहा, तब उन्होंने कहा ‘‘मेरा मानना है कि यह व्यक्तित्व से जुड़ा एक मुद्दा है.’’

इन तमाम मुद्दों पर विश्वरंजन से की गई एक लंबी बातचीत में उन्होंने विजय रमण पर एक व्यक्ति के रूप में कोई टिप्पणी करने से इंकार दिया लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा कि उनकी कही बातों से जो मुद्दे उठते हैं उन पर वे कुछ कह सकते हैं. विश्वरंजन का कहना है कि सीआरपीएफ के इस उच्चाधिकारी का यह कहना कि वे बात सुनते नहीं हैं, गलत है. उन्होंने कहा कि किसी भी ऑपरेशन की तैयारी की बैठक में बातचीत होती है और अगर दो अलग-अलग सुरक्षा बलों के बीच ऐसे ऑपरेशन को लेकर असहमति रहती है तो छत्तीसगढ़ पुलिस उस ऑपरेशन को सिर्फ अपनी ही ताकत पर करती है. उन्होंने कहा कि अगर कोई फोर्स असहमत है तो उसे मोर्चे पर किस तरह साथ में रखा जा सकता है या साथ रहने के लिए दबाव डाला जा सकता है.

अंग्रेजी साप्ताहिक पत्रिका ‘द वीक’ को दिए इंटरव्यू में विजय रमण ने छत्तीसगढ़ पुलिस के प्रमुख की पहली बार ऐसी कड़ी आलोचना की है. कल जब इस साक्षात्कार के कुछ हिस्से एक समाचार एजेंसी पीटीआई ने जारी की तो इसे लेकर खलबली मची.

आज छत्तीसगढ़ संवाददाता के सवालों का जवाब देते हुए विश्वरंजन ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पुलिस को ऐसे साफ निर्देश हैं कि कानून के दायरे के बाहर जाकर कोई काम नहीं करना है क्योंकि ऐसा करने वाले व्यक्ति का साथ खुद पुलिस विभाग छोड़ देगा और कानून तोडऩे वाला पुलिस अधिकारी अदालत में अकेले खड़ा रहेगा. उन्होंने कहा कि जब कभी किसी पुलिस ज्यादती की शिकायत नक्सल मोर्चे के तनाव भरे इलाके से आती है तो उसकी जांच करके कार्रवाई की जाती है. कुछ मौतों के बारे में ऐसी जांच भी की गई और उनके तथ्य मिलने पर मामले दर्ज किए गए.

उनसे पूछा गया कि ऐसे मामलों में सीआरपीएफ, राज्य पुलिस या एसपीओ कौन शामिल है? तो उन्होंने कहा कि बाहर के सुरक्षा बल, राज्य की पुलिस और एसपीओ के कुछ लोगों के खिलाफ ऐसे मामले दर्ज हुए हैं और छत्तीसगढ़ पुलिस कभी हिंसा में शामिल नहीं होती क्योंकि ऐसा होना खुद पुलिस के लिए आत्मघाती होगा.

सीआरपीएफ के विशेष डीजी की अवैध हत्याओं की बात पर बहुत खेद जताते हुए विश्वरंजन ने कहा कि छत्तीसगढ़ पुलिस का अपना अनुभव है कि किसी भी तरह की हिंसा से सुरक्षा बल स्थानीय जनता का समर्थन खो बैठते हैं और उसके बिना उस इलाके में वे खुद खतरे में पड़ जाते हैं. जनता ही अगर साथ न रहे तो पुलिस को सूचना कहां से मिलेगी और सुरक्षा कहां से मिलेगी? उन्होंने कहा कि नक्सल मोर्चे के तनाव के बीच अपने साथियों को खोने वाले लोग कभी तनाव में अगर कोई वारदात कर भी बैठते हैं तो पुलिस उस पर पूरी कार्रवाई करती है और ऐसी कार्रवाई कुछ मामलों में चल भी रही है.

सीआरपीएफ की बात न सुनने के विजय रमण के आरोप पर विश्वरंजन ने कहा कि किसी रणनीति से असहमति एक अलग बात हो सकती है लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस का यह साफ मानना है कि सीआरपीएफ इस राज्य में संयुक्त अभियान के लिए आया हुआ सुरक्षा बल है और वह किसी भी तरह से राज्य पुलिस की दास नहीं है, मातहत नहीं है. जब भी दो सुरक्षा बल मिलकर काम करते हैं तो दोनों के बीच समन्वय हासिल करने की कोशिश होती है लेकिन ऐसा जब नहीं हो पाता है तब छत्तीसगढ़ पुलिस या तो अपनी अकेले की पर्याप्त ताकत रहने पर उस अभियान को अकेले करती है या फिर नहीं करती है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

zulaikha raipur cg

 
 जिन्हें नाज़ है डी़जीपी, मुख्यमंत्री पे वे कहां हैं ???? 
   
 

bhagat subgh raipur cg

 
 एक सीआरपी के डीजीपी का अवैध हत्याओं की बात करना, मानवाधिकारवादियों के आरोपों की पुष्टि ही करता है. विजय रमण जी ने दो तीन माह पहले के इंटरव्यू में कहा था कि हम अपने ही लोगो पर गोली कैसे चलायें. क्योंकि जब ऑपरेशन होता है तब यह किसी आदिवासी के माथे पर तो नहीं लिखा होता कि वो नक्सली है और इसमें निर्दोष आदिवासी मरे जाते हैं.ग्रीन हंट के चलाये जाने की बात पहली बार डीजीपी विश्वरंजन ने माना है कि यह ऑपरेशन उनका है. यदि इससे सीआरपी तक सहमत नहीं है तो देश में अधिकांश बुद्धिजीवी विरोध करते हैं तो गलत क्या है. ग्रीनहंट और सलवा जुडूम ने फर्जी हत्याओं को ही बढ़ावा दिया है. विजय रमन जी को बहुत बहुत बधाई. 
   

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