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पर्यावरण बिगाड़ने वाले जिदंल को पुरस्कार

पर्यावरण बिगाड़ने वाले जिदंल को पुरस्कार

रायपुर. (छत्तीसगढ़ संवाददाता) 21 जुलाई 2010

पर्यावरण की अनदेखी, नियमों को ताक में रखकर उद्योग स्थापित करने, उत्खनन करने के मामले में केंद्र और कोर्ट की फटकार खाने वाले, राज्य सरकार द्वारा दायर मुकदमा झेल कटघरे में खड़े, और लोगों के विरोध का सामना कर रहे जिंदल स्टील को अब पर्यावरण सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय गोल्डन पीकॉक अवार्ड 2010 के लिए चयनित किया गया है. लंदन में आगामी 30 जुलाई को एक समारोह में दिया जाएगा. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस पुरस्कार को देनेवाले निर्णायक मंडल में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के सदस्य जस्टिस पीएन भगवती शामिल थे.

इधर राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण के फैसले को चुनौती देने वाली जिंदल की याचिका पर सुनवाई करते हुए 20 जुलाई को हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने तमनार स्थित गारे 4/6 कोल माइंस में किसी भी प्रकार का निर्माण व उत्खनन पर आगामी आदेश तक रोक लगा दी है.

जिंदल उद्योग को बीते एक माह के भीतर यह लगातार तीसरा बडा झटका है जब हाई कोर्ट ने जिंदल की गारे कोल माइंस पर उत्खनन की रोक लगाई है. इससे पहले जिंदल उद्योग के तमनार स्थित 24 सौ मेगावाट का पॉवर प्लांट की अनुमति केंद्रीय पर्यावरण विभाग ने रद्द कर दी थी और उसके बाद राज्य शासन से इसी मामले में जिला न्यायालय में एक मामला भी दर्ज कराने के लिए पेश कर दिया है.

गारे कोल माइंस की पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए खम्हरिया में 5 जनवरी 08 को जन सुनवाई हुई थी. लाठी चालन से सैकड़ों ग्रामीण घायल हो गए थे और अफरातफरी में भय के माहौल में लोग अपने घरों को लौट गए थे. उसके बावजूद प्रशासन द्वारा जन सुनवाई पुन: शुरू कर जन सुनवाई
करने की औपचारिकता पूरी कर केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेज दी. जन सुनवाई पूरी करने में भारी अनियमतता पाते हुए मंत्रालय ने पहली मीटिंग में जन सुनवाई दोबारा करवाने का निर्णय लिया लेकिन बाद में अपने ही फैसले को दरकिनार करते हुए पर्यावरणीय स्वीकृति दे दी गई.

मंत्रालय के निर्णय के खिलाफ तमनार के आदिवासी मजदूर किसान एकता संगठन के संयोजक डॉ.हरिहर पटेल एवं जिले के सक्रिय जन संगठन जन चेतना ने प्राधिकरण के समक्ष अपील दायर की थी. कई बार बहस के बाद अंतत: अपीलेट अथार्टी ने जन सुनवाई की वीडियो सीडी देखने निर्णय लिया. जिस पर जिंदल के वकीलों ने आपत्ति करते हुए प्राधिकरण के वर्तमान स्वरूप को ही चुनौती देते हुए मामला हाइकोर्ट ले जाने की बात कही, जिस पर प्राधिकरण ने गारे कोल माइंस पर किसी भी किस्म की मैदानी गतिविधि पर रोक लगाते हुए हाईकोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा करने की बात स्वीकार कर ली थी.

प्राधिकरण के निर्णय को यथावत रखते हुए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने याचिका का निराकरण होने तक गारे कोल माइंस पर किसी भी किस्म का निर्माण अथवा खनन पर रोक लगाने का आदेश पारित कर दिया. मामले की अगली सुनवाई 14 सितम्बर को होगी.

जन चेतना के रमेश अग्रवाल ने बताया कि मंत्रालय से पर्यावरणीय स्वीकृति मिलते ही छ.ग. पर्यावरण संरक्षण मंडल ने स्थापना व उत्पादन सम्मति जारी कर दी थी जबकि पक्षकार होने के नाते मंडल को अच्छी तरह मालूम था कि पर्यावरणीय स्वीकृति का मामला विचाराधीन था और स्वीकृति रद्द भी हो सकती है.


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