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बाबरी मस्ज़िद विवाद पर सुनवाई पूरी

बाबरी मस्ज़िद विवाद पर सुनवाई पूरी

लखनऊ. 27 जुलाई 2010


हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई पूरी होने के बाद अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है. उम्मीद की जा रही है कि सितंबर के अंत तक इस मामले में फैसला सुनाया जा सकता है.

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कई सालों तक निचली अदालतों में यह मामला चलता रहा. 1989 में उच्च न्यायालय ने इसे अपनी सुनवाई में लिया. तब से यह मुकदमा चल रहा था. सोमवार को अदालत ने सुनवाई पूरी की.

तारीख़ों में बाबरी मस्ज़िद
1528: अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे हिंदू भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं. समझा जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर ने ये मस्जिद बनवाई थी जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था.

1853 : पहली बार अयोध्या के पास सांप्रदायिक दंगे हुए.

1859 : ब्रिटिश सरकार ने विवादित जगह पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को पूजा पाठ करने की इजाजत दे दी.

1949: मस्जिद के भीतर भगवान राम की मूर्तियां पाई गयीं. मुसलमानों ने इसका विरोध किया और दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया. सरकार ने इस जगह को विवादित घोषित करके ताला लगा दिया.

1984: कुछ हिंदुओं ने विहिप के नेतृत्व में भगवान राम के जन्म स्थल को "मुक्त" करने और वहां राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया.

1986: जिला मजिस्ट्रेट ने हिंदुओं के लिए विवादित मस्जिद के दरवाजे पर से ताला खोलने का आदेश दिया. मुसलमानों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया.

1989: विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज किया और विवादित स्थल के नजदीक राम मंदिर की नींव रखी.

1990: विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को कुछ नुकसान पहुंचाया. तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की कोशिश की मगर अगले साल बातचीत फेल हो गई.

1992: विहिप, शिव सेना और भाजपा के कार्यकर्ताओं ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को गिरा दिया. इसके बाद देश भर में हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिसमें 2000 से ज़्यादा लोग मारे गए.

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Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Laddakh

 
 कोई भी सद्भाव वाला फैसला कभी किसी गिरोह्बाज़ मानसिकता को अच्छा नहीं लगता, क्योंकि उस से उनका साम्प्रदायिक कारोबार और सदा का रोज़गार चौपट होता है. अब न्यायपालिका को ऐसा फैसला देना होगा, जिस से गड़े मुर्दे उखाड़-उखाड़ कर मरने-मारने वाले लोग ज़रूर ख़त्म हो सकें और बेकुसूर लोग बच सकें. जो न बचना चाहें, उन्हें भी सही वक्त पर रुखसत होने दिया जाए. इन सबको इनके खोदे हुए गढ्ढों में ही जाना है तो देर कैसी?

एक बार हर शख्स से अच्छी तरह पूछ लिया जाए. बच्चों और स्त्रियों को समझदार लोगों के साथ रखा जा सकता है. यह आसान नहीं है, मगर जितने उपाय और खर्च किये जा रहे हैं, बेकुसूरों को जितना मारा जा रहा है, उस से बहुत आसान और सस्ता है. गन्दगी से छुटकारा पाने के लिए पहले ध्यान देना चाहिए. आखिर वह गन्दगी स्वयं गढ्ढे में जाने को बेचैन है. एक बार सबको मरना ही है, लेकिन जो लोग रोज़-रोज़ मरने और मारने को आतुर रहता हैं, वे तत्काल तशरीफ़ ले जा सकें तो राम और रहीम अगर सचमुच कहीं जिंदा रह गए हैं तो सुख की सांस लेकर कुछ और जी लेंगे. मैत्री मिस्टिक हिमालय नामक स्वैछिक चेतना-कर्म के अंतर्गत हम और भी बेहतर सुझाव दे सकते हैं, क्योंकि हमारे कुछ सदस्याओं ने गिरोह्बाज़ हिन्दुओं और मुसलमानों की नीचताओं को अयोध्या और गुजरात में खूब झेला और समझा है.
 
   

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