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शिबू सोरेन की रिहाई के खिलाफ याचिका

शिबू सोरेन की रिहाई के खिलाफ याचिका

नई दिल्ली. 27 जुलाई 2010


झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झामुमो नेता शिबू सोरेन की परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. सत्ता से बेदखली के बाद अब उच्चतम न्यायालय ने उनकी नींद उड़ा दी है. अपने निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के मामले में दोषमुक्त करार दिये जाने के खिलाफ दायर याचिका को सोमवार को उच्चतम न्यायालय ने स्वीकार कर लिया है.

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ज्ञात रहे कि निचली अदालत ने सोरेन को उनके निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के अपराध में गत वर्ष पांच दिसम्बर 2006 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने शिबू सोरेन को शशिनाथ झा हत्या मामले में साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया था. न्यायमूर्ति आर. एस. सोढी और न्यायमूर्ति एच. आर. मल्होत्रा की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा था कि सीबीआई इस हत्याकांड में सोरेन की भूमिका को निर्णायक तौर पर साबित करने में विफल रही है.

उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ शशिनाथ झा की मां प्रियंबदा देवी ने अपील की थी, लेकिन सीबीआई ने सिर्फ़ चार लोगों को दोषमुक्त करार दिए जाने के फ़ैसले को ही चुनौती दी थी जबकि मामले में पांच लोगों को दोषमुक्त करार दिया गया था.

तारीख़ों में शशिकांत झा हत्याकांड
22 मई 1994: सोरेन के सहायक नंद किशोर मेहता उर्फ नंदू तथा 5 अन्य ने कथित तौर पर शशिकांत झा का अपहरण किया.

24 - 30 मई 1994: मुख्य आरोपी नंदू और 3 अन्य ने कथित तौर पर शिबू सोरेन के इशारे पर झारखंड में रांची के निकट जंगल में झा की हत्या कर उसका शव दफना दिया.

2 जून 1994: पीड़ित के भाई की शिकायत पर नई दिल्ली के संसद मार्ग थाने में मामला दर्ज किया गया.

1 अगस्त 1996: झा की मां की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने मामले की जांच का जिम्मा संभाला.

13 अगस्त 1996: सीबीआई ने रांची के पिस्का नगरी गांव से झा का कंकाल बरामद करने का दावा किया.

19 जून 1998: सीबीआई ने सोरेन को नई दिल्ली से गिरफ्तार किया.

10 नवंबर 1998: सीबीआई ने अपना पहला आरोपपत्र दाखिल किया.

28 नवंबर 2006: जज बी. आर. केडिया ने सोरेन तथा 4 अन्य को भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत आपराधिक षड्यंत्र, अपहरण और हत्या के तहत दोषी ठहराया अदालत ने हालांकि 2 अन्य लोगों आशीष ठाकुर और सुनील ख्वारे को बरी कर दिया.

5 दिसंबर 2006: अदालत ने जेएमएम अध्यक्ष और 4 अन्य दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई.

23 जनवरी 2007: अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए सोरेन और 4 अन्य दिल्ली हाईकोर्ट में पहुंचे.

22 अगस्त 2007: दिल्ली हाई कोर्ट ने सोरेन और अन्य को बरी कर दिया.

26 जुलाई 2010: उच्चतम न्यायालय ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका स्वीकार कर ली.


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