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ममता की माओवादी समर्थक रैली पर सवाल

ममता की माओवादी समर्थक रैली पर सवाल

कोलकाता. 9 अगस्त 2010


रेलमंत्री और तृणमूल नेता ममता बनर्जी द्वारा पश्चिम मिदनापुर के लालगढ़ में आयोजित रैली को लेकर सवाल उठने शुरु हो गये हैं. इस रैली का नक्सलियों ने भी समर्थन किया था. इसके अलावा रैली में माओवादी समर्थक पीपुल्स कमेटी अगेन्स्ट पुलिस एट्रोसिटीज यानी पीसीएपीए ने भी अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित की थी.

Mamata Banerjee


रैली से पहले ही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने ममता बनर्जी को कटघरे में खड़ा करते हुए आरोप लगाया कि इस तरह की रैली संविधान का उल्लंघन है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने विजयवाड़ा में कहा कि यह ममता बनर्जी और नक्सलियों की मिली जुली रैली है और केंद्र को इस बारे में जवाब देना चाहिए. करात ने कहा कि हम जानना चाहेंगे कि क्या नक्सलियों के खिलाफ़ लडाई में केंद्र तृणमूल कांग्रेस एवं नक्सलियों के बीच गठजोड को सुसंगत पाता है.

उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम कहते हैं कि तृणमूल कांग्रेस और माओवादियों के बीच गठजोड का कोई सबूत नहीं है लेकिन लालगढ की रैली ने गठबंधन को उजागर कर दिया है.

ज्ञात रहे कि इससे पहले स्वामी अग्निवेश, मेधा पाटकर समेत दूसरे कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 9 से 14 अगस्त तक लालगढ़ में भूविस्थापन के मुद्दे पर अपने आयोजन की घोषणा की थी. लेकिन ममता बनर्जी के आयोजन के मद्देनज़र इन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया था.

उधर पीसीपीए के नये सचिव मनोज महतो ने कहा था कि यह राजनीतिक रैली नहीं है, इसलिये पीसीपीए इस रैली के साथ है. महतो का दावा था कि जंगल महल में दमन को रोकने के लिये इस रैली का निर्णय लिया गया. पीसीपीए पिछले तीन वर्ष से बेकूसर ओदवासियों पर पुलिस तथा सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ़ लड रहा है.

इसके अलावा सीपीआई माओवादी के नेता किशन ने भी इस रैली के समर्थन की घोषणा करते हुए कहा था कि इस रैली को माओवादियों का पूरा समर्थन रहेगा और जंगल महल के लोग रैली में शामिल होने वाले लोगों की रक्षा करेंगे.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sunder lohia (lohiasunder2 @gmail.com) Mandi ( H.P}.

 
 मनोज महतो का विश्वास तब किया जा सकता था, जब उस रैली में यूपीए सरकार की रेल मंत्री ममता बनर्जी न जाती. उस में स्वामी अग्निवेश, मेधा पाटेकर और महाश्वेता देवी को ही बोलने दिया जाता. जब उस रैली में केंद्रीय सरकार की तरफ से रेल फैक्ट्री खोलने की घोषणा की जाये तो उसे राजनैतिक कैसे न माने? 
   

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