पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > राजनीति > बिहार Print | Send to Friend | Share This 

खुदीराम बोस को भुला दिया सरकार ने

खुदीराम बोस को भुला दिया सरकार ने

मुजफ्फरपुर. 11 अगस्त 2010


जिस देश की खातिर खुदीराम बोस 11 अगस्त को फांसी के तख्ते पर चढ़े, उसी देश के नेताओं ने उन्हें भुला दिया. बिहार के जिस मुजफ्फरपुर शहर में उन्हें फांसी दी गई थी, वहां भी रस्मी तौर पर ही उन्हें याद किया जा रहा है. सरकारी तौर पर देश में कौन कहे, बिहार में भी किसी बड़े आयोजन की सुगबुगाहट नहीं है. उनकी सौंवी शहादत दिवस कब गुजर गई, इसकी भी किसी सरकार ने सुध नहीं ली.

Khudiram-bose


ज्ञात रहे कि लगातार एक के बाद एक क्रांतिकारी कदमों से परेशान अंग्रेज सरकार ने उन्हें वैनी गांव से गिरफ्तार किया था. उनके साथी प्रफुल्लचंद चाकी ने खुद को गोली मारकर अपनी शहादत दे दी थी, जबकि 19 साल के खुदीराम बोस को पकड़े जाने के पांच दिनों बाद ही 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में फाँसी दे दी गई. पूसा रोड के जिस वैनी गांव से उन्हें गिरफ्तार किया गया था, वह स्थान आज भू माफियाओं को कब्जे में है.

कुछ महीने पहले ही निर्दलीय विधायक किशोर कुमार ने विधान बिहार विधान सभा में यह शर्मनाक तथ्य उजागर किया था कि फाँसी के बाद शहीद खुदीराम बोस का मुजफ्फरपुर के बर्निगघाट पर अंतिम संस्कार किया गया था, लेकिन उस स्थल पर शौचालय बना दिया गया. इसी तरह किग्सफोर्ड को जिस स्थल पर बम मारा गया था, उस स्थल पर मुर्गा काटने और बेचने का धंधा हो रहा है. बाद में हंगामा हुआ तो शहादत स्थल की सुध लेने की घोषणा की गई लेकिन सरकार वायदा करके भूल गई.

असल में खुदीराम बोस के साथ सरकारी उपेक्षा का ये पहला किस्सा नहीं है. जनता ने अपने पैसे से खुदीराम बोस की प्रतिमा का निर्माण किया और दिसंबर 1949 में जब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु मुजफ्फरपुर में पहले पॉलिटिकल कांफ्रेस में भाग लेने आये तो उन्हें प्रतिमा के अनावरण और शहीद स्थल के उद्घाटन के लिये आमंत्रित किया गया. जवाहरलाल नेहरु ने शहीद खुदीराम बोस की प्रतिमा और शहीद स्थल के उद्घाटन से यह कहते हुए मना कर दिया कि खुदीराम बोस हिंसा की राजनीति में विश्वास करते थे और वे इस तरह के किसीहिंसक गतिविधि में रहे व्यक्ति का समर्थन नहीं कर सकते. बाद में बिहार के मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने इसका उद्घाटन किया.

जवाहरलाल नेहरु के नाती और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बाद में इस शहीद का सम्मान करते हुए इनके नाम पर भवन निर्माण के लिये शिलान्यास किया लेकिन आज 25 वर्ष से अधिक समय गुजर गया, उस भवन का कहीं अता-पता नहीं है.


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in