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नक्सलियों के खिलाफ वायु सेना

नक्सलियों के खिलाफ वायु सेना

नई दिल्ली. 13 अगस्त 2010


केंद्र सरकार भले नक्सलियों के खिलाफ सेना के इस्तेमाल से इंकार कर रही हो लेकिन सरकार ने वायुसेना को नक्सलियों पर हमले की अनुमति दे दी है. सरकारी गलियारों से आने वाली खबरों पर यकीन किया जाये तो बचाव के नाम पर नक्सलियों के खिलाफ भारतीय वायुसेना को हमले की अनुमति मिल गई है.

कुछ माह पहले ही रक्षा मंत्नी ए.के.एंटनी ने साफ कहा था कि रक्षा मंत्नालय को नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए केन्द्र के आदेश और फैसले का इन्तजार है. यह एक संवेदनशील मुद्दा है और इस मामले में कोई भी निर्णय केन्द्र सरकार को ही लेना है. रक्षा मंत्नालय अपनी ओर से इस मामले में कुछ भी नहीं कर सकता.

बाद में नक्सलियों के खिलाफ सेना के इस्‍तेमाल को लेकर हुई मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक में सेना के प्रयोग पर आम सहमति नहीं बन सकी थी. गृहमंत्री पी चिदंबरम ने तो सेना के इस्तेमाल से इंकार किया था. हालांकि छत्तीसगढ़ ने इससे पहले केंद्र को सेना के इस्तेमाल का प्रस्ताव भेजा था, जिसे गृहमंत्रालय ने खारिज कर दिया था.

ताज़ा मामले में माना जा रहा है कि अपने बचाव के नाम पर वायुसेना नक्सलियों पर सीधा हमला बोल सकती है. नक्सल प्रभावित इलाके में तैनात वायुसेना के दो ध्रुव हेलिकॉप्टर और दो एम आई-17 इस तरह के किसी भी हमले के लिये सक्षम हैं.

ज्ञात रहे कि इस तरह के हमले की रणनीति के अलावा छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ में थल सेना का बेस कैंप बनाने की दिशा में भी प्रक्रिया चल रही है. सरकार करीब 500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को बेस कैंप के लिए कब्जा देने पर विचार कर रही है. वायु सेना के एयरबेस के साथ ही थलसेना ने भी यहां बेस कैंप बनाने का प्रस्ताव दिया है. इस सिलसिले में थलसेना अध्यक्ष की राज्य शासन के अधिकारियों के साथ प्रारंभिक चर्चा हो चुकी है. राज्य सरकार थल सेना के बेस कैंप के लिए जमीन उपलब्ध कराने पर सहमत हो गई है.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

नितेश नंदा

 
 देर से उठाया जा रहा सही कदम। लाल-आतंकवादियों के समर्थन में खडे तथाकथित "लेनिन-मार्क्स" की छाती फटनी स्वाभाविक है। जो सैनिक कार्यवाही में मरे वे आदिवासी और जो सैनिक को मार दे वो "चे-गेवारा"। जो नक्सली आतंक के विरोधी वो "सिस्टम का हिस्सा" और जो नक्सलियों के साथ वो "महान क्रांतिकारी"। बढिया फेंटसी है।  
   
 

bhagat singh raipur c.g.

 
 बहुत खतरनाक पहल हैं. अभी छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ने एक बयान में कहा कि अब हम मरने की नहीं मारने की नीति का अनुसरण करेंगे. इसका मतलब क्या यही हैं.एक बार इन आदिवासी गृहमंत्री ने यह भी कहा था कि सेना के इस्तेमाल से आदिवासियों का कुछ नुकसान जरुर होगा,लेकिन हमें सेना का प्रयोग करना ही पड़ेगा.इसका मतलब यही हैं कि सरकार यह तयकर चुकी है कि कैसे भी घेर के मार कर इन क्षेत्रों को खाली करवाना ही हैं. बहुत ख़राब और अपने ही लोगो को ख़तम करने का यह निर्णय आत्मघाती ही होगा. 
   
 

lenin kumar (janabadi@rediffmail.com) bhubaneswar

 
 जाने भी दो यारों,यह असभ्य आदिवासी जो हमारे विकास के नाम पर पूंजीवादी शिल्पायन के खिलाफ हथियार उठा रहे हैं, देशवासी कैसे हो सकते हैं. सम्पूर्ण दहन होना चाहिए,इस से बाद में हम जी पाए या नहीं,हम क्यों सोचे? सोचना मना है. 
   

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