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हिंसा का रास्ता छोड़ें माओवादी- प्रतिभा पाटिल

हिंसा का रास्ता छोड़ें माओवादी- प्रतिभा पाटिल

नई दिल्ली. 15 अगस्त 2010


राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कहा है कि उग्र विचारधाराओं के प्रवर्तकों और वामपंथी उग्रवाद के हिमायतियों को हिंसा का रास्ता छोड देना चाहिए. उन्होंने ऐसे लोगों को देश की तरक्की और विकास के राष्ट्रीय प्रयासों में शामिल होने का आह्वान करते कहा कि बातचीत के जरिये ही मुद्दों का समाधान ढूँढ़ा जा सकता है.

भारत के चौसठवें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संदेश में राष्ट्रपति ने कहा कि उग्र विचारधाराओं के प्रवर्तकों और वामपंथी उग्रवाद के हिमायतियों को हिंसा का रास्ता छोड़ देना चाहिए. मुझे उम्मीद है कि सिविल समाज के सभी सदस्य और सभी व्यक्ति आगे आकर उनको इस दिशा में आगे बढ़ने में सहयोग देंगे.

बातचीत को संवाद का माध्यम चुने जाने की आवश्यकता बताते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि एक-दूसरे की बात सुनने से और एक-दूसरे के आपसी नजरिए का आदर करने से तथा एक दूसरे को समझने से हम अपने सामने मौजूद मुद्दों का समाधान ढूँढ़ सकते हैं. उन्होंने कहा कि आतंकवाद को पराजित करने के लिए विश्व के सभी देशों को एकजुट होकर काम करना होगा ताकि उन्हें कहीं कोई आश्रय, प्रशिक्षण की जगह, वित्तीय साधन और ढाँचागत सहायता न मिले और उनकी विचारधारा की कोई हिमायत करने वाला न हो.

उन्होंने कहा कि हम पर अपनी 54 करोड युवाओं की इस नई पीढी को अपनी समृद्ध विरासत को सौंपने का भी दायित्व है. हमें उन पर पूरा भरोसा है और ऐसा कराना उचित भी है. हमारे युवा देश के भविष्य के निर्माता हैं. हमें उन्हें शिक्षित करना है और उनमें बलिदान, समर्पण, देशभक्ति तथा राष्ट्र सेवा जैसी भावनाओं का समावेश भी करना है. इस तरह से वे विश्वास के साथ भविष्य का सामना करने के लिए तैयार होंगे तथा अभी तक प्राप्त उपलब्धियों को आगे बढाएंगे.

राष्ट्रपति ने कहा कि हम मानते हैं कि अगर समृद्धि प्राप्त करनी है तो शांति जरूरी है. आतंकवाद विश्व की शांति, स्थिरता और सुरक्षा के लिए सबसे बढ़ा खतरा है. इसे पराजित करने के लिए विश्व के सभी देशों को एकजुट होकर काम करना होगा ताकि उन्हें कहीं कोई आश्रय, प्रशिक्षण की जगह, वित्तीय साधन और ढाँचागत सहायता न मिले और उनकी विचारधारा की कोई हिमायत करने वाला न हो. विश्व में हिंसा और नफरत का कोई स्थान नहीं हो सकता.

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भ्रष्टाचार को बिलकुल भी सहन नहीं करने की बात करते हुए कहा कि जनसेवा के उच्च मानदंडों को अपनाने से शासन प्रणालियों की कारगरता जरूर कायम होगी और विकास एवं तरक्की कई गुना तेजी से होगी.

उन्होंने कहा कि नीतियाँ तैयार करने और कार्य क्षेत्र में जाकर अमल में लाने के लिए सरकार में कार्यरत लोगों को शक्तियाँ दी गई हैं. यह हमेशा याद रखना चाहिए कि इस शक्ति का प्रयोग जिम्मेदारी से किया जाए. राष्ट्रपति ने उच्चतर शिक्षा में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने के लिए माध्यमिक शिक्षा भी सभी को उपलब्ध कराने पर जोर दिया और कहा कि शिक्षा के द्वारा सशक्तीकरण जरूरी है क्योंकि इससे अवसरों के बहुत से दरवाजे खुल जाते हैं.

उन्होंने कहा कि हमारे उद्योगों को प्रगति करते रहना चाहिए और भारतीय कंपनियों को कुशल और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बनने के प्रयास जारी रखने चाहिए. उन्होंने कहा कि दूसरी हरित क्रांति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कृषि क्षेत्र को नई दिशाओं और ताजा विचारों सहित पूर्णत: अलग चिंतन की जरूरत है ताकि कृषि पैदावार, उत्पादकता और मुनाफा बढ़ सके. यह खाद्य सुरक्षा और कीमतों में स्थिरता के लिए बहुत आवश्यक है. कृषि को अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों के साथ जोड़ने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि उद्योगों को कृषि के साथ जोड़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक विकास को आधार मिलेगा और कृषि संबंधी व्यापार को बढ़ावा मिलेगा.

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने देशवासियों की शांति, समृद्धि और प्रगति की कामना करते हुए राष्ट्रपति ने सभी नागरिकों से राष्ट्र के भविष्य को सुदृढ़ और उज्जवल बनाने में योगदान देने का आह्वान किया.


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