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भोपाल गैस कांड पर बंद करो शोर- अमरीका

भोपाल गैस कांड पर बंद करो शोर- अमरीका

नई दिल्ली. 18 अगस्त 2010


भोपाल गैस कांड के पीड़ितों द्वारा यूनियन कार्बाइड की मातृ संस्था डाउ केमिकल से हरजाना मांगे जाने पर अमरीका ने नाराजगी जताई है और कहा है कि इस मुद्दे पर शोर मचाना बंद किया जाये. इस अमरीकी कंपनी के पक्ष में अमरीका ने भारत को साफ चेताया है कि अगर इस मुद्दे पर भारत में शोर मचता रहा तो इसका भारत में होने वाले निवेश पर फर्क पड़ेगा.

अमेरिका के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (डिप्टी नैशनल सिक्युरिटी अडवाइजर) माइकल फ्रोमैन ने भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष को लिखे ईमेल में लिखा है- 'मुझे भरोसा है कि आप इस मामले पर नज़र रखे हुए हैं। हम यहां अमेरिका में डाउ केमिकल को लेकर काफी शोर-शराबा सुन रहे हैं। मुझे डर है कि अगर भारत से दबाव बनता रहा तो इसका भारत में होने वाले निवेश पर बुरा असर पड़ सकता है।' फ्रोमैन ने यह ईमेल आहलूवालिया के उस मेल के जवाब में भेजा है, जिसमें उन्होंने वर्ल्ड बैंक से आसान शर्तों वाले लोन जारी रखने में अमेरीकी सहायता का अनुरोध किया था. फ्रोमैन और मोंटेक भारत-अमेरिका सीईओ फोरम के सहअध्यक्ष भी हैं.

हालांकि इस बारे में पूछे जाने पर मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा है कि इस तरह के मेल को दबाव की राजनीति के तहत नहीं देखा जाना चाहिये.

ज्ञात रहे कि 2-3 दिसंबर 1984 की रात भोपाल की यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की फैक्टरी से मिक नामक गैस के रिसाव ने भोपाल में मौत का तांडव मचा दिया था. इस हादसे में 15 हजार लोगों की मौत हुई थी और हजारों लोग हमेशा के लिये विकलांग हो गये थे. भोपाल गैस कांड मामले में 23 साल बाद जून 2010 में भोपाल के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मोहन पी तिवारी ने 8 आरोपियों को दोषी करार दिया है. कोर्ट ने इन आरोपियों को धारा 304-ए के तहत लापरवाही का दोषी पाया और इन सभी को दो-दो साल की सज़ा सुनाई है.

भारतीय इतिहास के इस भयानक लापरवाही के कारण हुई दुर्घटना में भोपाल में मामला दर्ज होने के बाद के 3 सालों तक मामला स्थानीय अदालत में पड़ा रहा. बाद में इस मामले को सीबीआई को सौंपा गया.

सीबीआई ने 30 नवंबर 1987 को वारेन एंडरसन सहित 12 आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया. 1989 में पीड़ितों ने मुआवजे के लिए मामले अदालत में लगाए. बाद में इनकी ओर से केंद्र सरकार ने मुआवजे के लिए मुकदमा अमरीका की कोर्ट में लगाया लेकिन वहां मामला सुनवाई योग्य नहीं पाये जाने के बाद इसे भोपाल में लगाया गया.

भोपाल के जिला न्यायाधीश एम डब्ल्यू देव ने अंतरिम मुआवजे के तौर पर 710 करोड़ रुपए के भुगतान का आदेश दिया, जिसे यूनियन कार्बाइड कॉपरेरेशन ने चुनौती दी. बाद में मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा.

उच्चतम न्यायालय में अंतरिम आदेश पर सुनवाई के दौरान 14 फरवरी 1989 को दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया. समझौते में तय हुआ कि यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन अमरीका और यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड समझौता राशि का भुगतान करेगी और इसके बाद गैस त्रासदी से जुड़े सभी सिविल और आपराधिक प्रकरण खत्म हो जाएंगे. यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन द्वारा समझौता राशि का भुगतान कर दिया गया और सभी मुकदमे खत्म हो गए.

इसके बाद कुछ संगठनों की ओर से उच्चतम न्यायालय में एक रिव्यू पिटीशन लगाकर मांग की गई कि आपराधिक प्रकरण खत्म नहीं किया जा सकता. उच्चतम न्यायालय ने 3 अक्टूबर 1991 को आपराधिक प्रकरण चलाने का आदेश दिया, जिसके बाद अदालती कार्रवाई के दौरान मामला फिर से उच्चतम न्यायालय पहुंचा. जहां, 1996 में उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि आरोपियों के खिलाफ 304 ए में मामला चलाया जाए.


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