पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > फ़िल्म क्षेत्रे > दिल्ली Print | Send to Friend 

तपन सिन्हा, लता, दिलीप कुमार को लाइफटाइम अवार्ड

लता, दिलीप कुमार, तपन सिन्हा को लाइफटाइम अवार्ड


नई दिल्ली. 20 जून 2008
आजादी की 60 वीं वर्षगांठ पर दिलीप कुमार, तपन सिन्हा, लता मंगेश्कर और सुश्री सरोजा देवी को लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड दिया जाएगा.


पुरस्कार वितरण में सबसे पहले अभी तक के सिनेमाई हस्तियों में से एक श्री तपन सिन्हा को फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में जीवनकाल की उपलब्धियों के लिए पुरस्कार दिया जाएगा. उनके खराब स्वास्थ्य को देखते हुए पश्चिम बंगाल के राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी यह पुरस्कार तपन सिन्हा को आज कोलकाता में उनके निवास पर प्रदान करेंगे. यह पुरस्कार केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री पी.आर.दासमुंशी की उपस्थिति में दिया जाएगा.


यह सम्मान श्री सिन्हा के आम आदमी के संघर्षों का बिल्कुल जमीनी सिनेमाई चित्रण को रेखांकित करता है. तपन सिन्हा की काबुलीवाला (1957), हाटे बाज़ारे (1967), सफेद हाथी (1977) जैसी फिल्में संरचना एवं तकनीक के हिसाब से उत्कृष्ट हैं जो समान उत्साह एवं संवेदनशीलता के साथ अनेक विषयों को प्रस्तुत करने की उनकी प्रवीणता एवं क्षमता को प्रदर्शित करती हैं.


श्री तपन सिन्हा को विविध श्रेणियों में 19 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले हैं. इसके अलावा उन्हें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों बर्लिन, वेनिस, लंदन, मास्को, सन फ्रांसिस्को और लोकार्नो में कई पुरस्कार मिले.


उन्होंने अपना फिल्म कैरियर 1946 में कोलकाता के नए थियेटर में एक साउंड इंजीनियर के तौर पर शुरू किया था. 1950 में उन्हें यूनाइटेड किंगडम में पाइनवूड स्टुडियो में काम करने का अवसर मिला जहां उन्होंने दो वर्ष बिताए. भारत लौटने पर उन्होंने अपना ध्यान बंगाली, हिन्दी और उड़िया में फिल्म निर्देशन एवं फिल्म निर्माण में लगाया.

 

उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं- काबुलीवाला, खुदितो पाशन एवं अतिथि पर आधारित तीन फिल्में बनायीं. श्री सिन्हा की यह सिनेमाई यात्रा अंकुश (1954) से प्रारंभ हुई और उपहार (1955), तोंसिल (1956), लौहकापत (1957), कालोमाटी (1957), हांसुली बांकर उपकथा (1962), सगीना महतो (1970), बांछारामेर बगान (1980), अदालत ओ एकती मेये (1962), एक डाक्टर एक मौत (1991) और शताब्दीर कन्य (2001) से रेखांकिंत हुईं.


[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in