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छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों से बड़े पैमाने पर लड़कियों की बिक्री किए जाने और उन्हें देश के महानगरों में बंधुवा बनाए जाने की घटनाओं ने राज्य शासन की नींद उड़ा दी है. राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लगातार इस तरह की तरह घटनाएं सामने आ रही हैं.
इनमें से कई लड़कियों को सरकार के हस्तक्षेप के बाद मुक्त कराया गया है
लेकिन एक गैर सरकारी संस्था का आरोप है कि छत्तीसगढ़ की लगभग सात हज़ार लड़कियां अभी भी दिल्ली
, मुंबई और देश के दूसरे राज्यों में बंधक हैं.

राज्य के बिलासपुर, जशपुर और सरगुजा जिले में लड़कियों के अपहरण के कई मामले दर्ज हैं, जिनमें लगातार वृद्धि हो रही है. कुछ लोगों को इस मामले में गिरफ़्तार भी किया गया है लेकिन लड़कियों को बहला-फुसला कर बाहर ले जाने का सिलसिला थमता नज़र नहीं आता.
शोषण
राज्य में पलायन की लंबी परंपरा रही है. बिलासपुर इलाके के मज़दूर
दिल्ली
, पंजाब, कश्मीर और उत्तर प्रदेश में काम के लिए पहले भी जाते रहे हैं. कई बार इन मज़दूरों को बंधक बनाने की ख़बरें भी सामने आयी हैं. सैकड़ों की संख्या में बंधुवा मज़दूरों को मुक्त भी करवाया गया है. लेकिन पिछले कुछ सालों से छत्तीसगढ़ में ऐसे कई गिरोह सक्रिय हो गए हैं, जो काम दिलाने के नाम पर यहां के आदिवासी इलाकों से लड़कियों को बहला-फुसला कर राज्य से बाहर ले जा रहे हैं.

बाद में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिसमें यहां से ले जाई गयी लड़की को दलालों ने एकमुश्त रक़म ले कर किसी को बेच दिया गया या लड़कियों को बंधक बना लिया गया. ऐसी लड़कियों का शारीरिक-आर्थिक शोषण भी किया गया.

आश्चर्यजनक बात ये है कि जिन लड़कियों को राज्य से बाहर ले जाया जा रहा है, उसमें से अधिकांश लड़कियां नाबालिग हैं. लेकिन बेहतर भविष्य की उम्मीद में अपनी बेटियों को इन गिरोहों के हाथ में सौंपने वाले ग़रीब मां-बाप अब अपने बच्चों की तलाश में दर-दर की ठोकर खा रहे हैं.
लापता
बिलासपुर के परसापानी गांव की 11 साल की तारामणि को साल भर पहले एक दलाल
पितरुस केरकेट्टा अपने साथ दिल्ली ले कर गया था. पितरुस ने तारामणि की मां को बताया था कि वहां इसे अस्पताल में नर्स का काम दिला देगा. नर्स के बतौर उसे हर माह तीन हज़ार रुपए मिलेंगे.

पहले भी कई लड़कियों को राज्य से बाहर ले जा चुके पितरुस की बात में आ कर मज़दूरी करने वाली निहारोबाई ने अपनी बेटी तारामणि को उसके साथ भेज दिया. लेकिन उसके बाद फिर कभी तारा की कोई खोज-ख़बर नहीं मिली. तारामणि और पितरुस की तलाश में वह पुलिस के साथ दिल्ली और बिहार तक घूम आयी लेकिन बेटी का कहीं पता नहीं चला.

निहोराबाई कहती है-  " पता नहीं मेरी बेटी कहां होगी  ! आंखें उसे देखने के लिए तरस गयीं. तीन हज़ार रुपए के लोभ में अपनी आंख का तारा मैंने खो दिया."

लेकिन कुछ लड़कियां ऐसी भी हैं, जिनके परिजन उन्हें घर लाने में सफल रहे.

महादेव तिर्की की 13 साल की बेटी मनीषा और राजनाथ तिर्की की बेटी मयंती को भी पितरुस केरकट्टा अपने साथ दिल्ली ले कर गया था, जहां एक रिप्लेसमेंट सेंटर ने घरेलू नौकरानी के बतौर उन्हें काम पर लगा दिया.
लेकिन बाद में उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाने लगा. यौन प्रताड़ना
की शिकार इन दोनों लड़कियों ने जब अपने शोषण की खबर किसी तरह अपने घर वालों तक पहुंचायी तब पुलिस की मदद से दोनों को छुड़वाया गया.

मनीषा कहती है- " वहां क्या-क्या हुआ, यह मत पूछो. पिंजरे की पंक्षी बन कर रह गयी थी वहां. हमें अच्छे-अच्छे सपने दिखाए गए थे लेकिन धोखा हुआ था हमारे साथ. अब काम करने के लिए कभी दिल्ली नहीं जाउंगी."
भविष्य
दिल्ली में एक प्लेसमेंट एजेंसी चलाने वाली संतोष सिंह चौहान को सरगुजा
से लड़कियों को बरगला कर ले जाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उसके चंगुल से मुक्त करायी गयी बतौली के कच्छारडीह गांव में रहने वाली सुगंती और फूलकुंवर को प्लेसमेंट एजेंसी के बजाय सरकार से ज़्यादा नाराजगी है.

सुगंती का कहना है- " हमें दिल्ली क्यों जाना पड़ा, इसके बारे में सरकार क्यों नहीं सोचती. हमें वहां काम से छुड़ाने के पहले सरकार को यह भी सोचना चाहिए था कि हमारे अपने गांव-घर में कोई काम क्यों नहीं है ? "

हालांकि फोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डाक्युमेंटेशन एंड एडवोकेसी के सुभाष महापात्रा की राय में सबसे पहले राज्य सरकार को देश के विभिन्न शहरों में बंधक बनायी गयी या बेच दी गयी लड़कियों को छुड़ाना चाहिए. सुभाष के अनुसार ऐसी लड़कियों की संख्या 7021 है.
सुभाष महापात्रा की स्वयंसेवी संस्था ने मानवाधिकार आयोग से जब इस मामले
में हस्तक्षेप का अनुरोध किया तो मानवाधिकार आयोग ने राज्य के पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव से इस मामले में जवाब तलब किया है. सुभाष कहते हैं- " हमें ग्रामीण इलाके से लगातार शिकायतें मिल रही हैं लेकिन आश्चर्यजनक है कि अधिकांश मामले में पुलिस खानापूर्ति कर ख़ामोश बैठ जा रही है. "

दूसरी ओर राज्य के गृहमंत्री रामविचार नेताम का दावा है कि इस तरह के मामले में जहां से भी शिकायतें आती है, पुलिस तत्काल कार्रवाही करती है. नेताम के अनुसार पुलिस ने हर बार इन लड़कियों की तलाश में महानगरो की ख़ाक छानी है और उन्हें मुक्त कराया है.

नेताम कहते हैं- " पिछले कई सालों से ऐसे मामले सामने आते रहे हैं. हमारी कोशिश होती है कि जब भी कोई मामला हमारी जानकारी में आए तो हम उस पर तत्काल कार्रवायी करें. लेकिन कई बार संबंधित परिवार के लोग ही शासन को सहयोग नहीं करते. "

 
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