पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > साहित्य > दिल्ली Print | Send to Friend | Share This 

कुरूप और शहरयार को ज्ञानपीठ पुरस्कार

कुरूप और शहरयार को ज्ञानपीठ पुरस्कार

नई दिल्ली. 25 सितंबर 2010


मलयालम के प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार ओएनवी कुरूप को वर्ष 2007 के लिए 43वां और उर्दू के नामचीन शायर शहरयार को वर्ष 2008 के लिए 44वां ज्ञानपीठ दिया जायेगा.

जाने माने लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता डॉ सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता में ज्ञानपीठ चयन समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया. इसमें चयन समिति के अन्य सदस्य प्रो मैनेजर पांडे, डॉ के सच्चिदानंदन, प्रो गोपीचंद नारंग, गुरदयाल सिंह, केशुभाई देसाई, दिनेश मिश्रा और रवीन्द्र कालिया मौजूद थे.

वर्ष 2007 के लिए 43 वें ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले ओएनवी कुरूप का जन्म 1931 में हुआ और वह समकालीन मलयालम कविता की आवाज बने. उन्होंने प्रगतिशील लेखक के तौर पर अपने साहित्य सफ़र की शुरूआत की और वक्त के साथ मानवतावादी विचारधारा को सुदृढ़ किया. मगर उन्होंने सामाजिक सोच और सरोकारों का दामन कभी नहीं छोड़ा.

कुरूप पर बाल्मिकी और कालीदास जैसे क्लासिक लेखकों और टैगोर जैसे आधुनिक लेखकों का गहरा प्रभाव पड़ा. उनकी ''''उज्जयिनी'' और ''स्वयंवरम'' जैसी लंबी कविताओं ने मलयालम कविता को समृद्ध किया. उनकी कविता में संगीतमयता के साथ मनोवैज्ञानिक गहराई भी है. कुरूप के अब तक 20 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और उन्होंने गद्य लेखन भी किया है. कुरूप को केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, वयलार पुरस्कार और पद्मश्री से नवाजा गया है.

वर्ष 2008 के लिए 44 वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गये शहरयार का जन्म 1936 में हुआ. बेहद जानकार और विद्वान शायर के तौर पर अपनी रचनाओं के जरिए वह स्व अनुभूतियों और खुद की कोशिश से आधुनिक वक्त की समस्याओं को समझने की कोशिश करते नजर आते हैं.

इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं, जुस्तजू जिस की थी उसको तो न पाया हमने, दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये, कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता. जैसे गीत लिख कर हिंदी फ़िल्म जगत में शहरयार बेहद लोकप्रिय हुये हैं.

इस वक्त की जदीद उर्दू शायरी को गढ़ने में अहम भूमिका निभाने वाले शहरयार को उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू पुरस्कार और फ़िराक सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया.


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in