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मट्टू हत्याकांड में मौत नहीं जीवन

मट्टू हत्याकांड में मौत नहीं जीवन

नई दिल्ली. 6 अक्टूबर 2010

 

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड मामले में दोषी संतोष कुमार सिंह को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दी गई मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया. उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति एच एस बेदी और न्यायमूर्ति सी के प्रसाद की पीठ ने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा संतोष कुमार सिंह को दोषी ठहराए जाने का फैसला यथावत है लेकिन हमारे विचार से, कुछ बातें निश्चित रूप से अपीलकर्ता [सिंह] के पक्ष में हैं. इसीलिए हम उसकी मौत की सजा को उम्रकैद की सजा में परिवर्तित कर रहे हैं.

गौरतलब है कि प्रियदर्शिनी मट्टू दिल्ली विश्वविद्यालय में एलएलबी में तीसरे वर्ष की छात्रा थी. उसकी लाश दिल्ली स्थित उसके आवास से 23 जनवरी 1996 को बरामद हुई थी. संतोष कुमार सिंह भी उसी संकाय का छात्र था जिस पर प्रियदर्शिनी मट्टू का पहले बलात्कार करने और फिर उसकी हत्या करने का आरोप लगा था. इस मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालत के जज जीपी थरेजा ने संतोष को 3 दिसंबर, 1999 को यह कहते हुए बरी किया था कि वह जानते हैं कि हत्या संतोष ने की है, लेकिन सबूतों के अभाव में उन्हें छोड़ा जा रहा है.

लेकिन बाद में सीबीआई ने इस निर्णय के विरुद्ध दिल्ली उच्च न्यायालय में अर्जी लगाई और न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2006 को इस मामले में उसे दोषी मानते हुए मौत की सजा सुनाई. संतोष सिंह ने दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की थी जिस पर उच्चतम न्यायालय की पीठ ने बुधवार को फैसला सुनाते हुए उसकी फांसी की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया.

उच्चतम न्यायालय के इस फैसले पर प्रियदर्शिनी मट्टू के 75 वर्षीय पिता सीएल मट्टू ने कहा है कि वे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से निराश हुए हैं क्योंकि वे उम्मीद कर रहे थे कि इस अपराध के लिए संतोष कुमार सिंह की मौत की सज़ा को बरकरार रखा जाएगा.