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नहीं चाहिये भाजपा का समर्थन-अन्ना हजारे

नहीं चाहिये भाजपा का समर्थन-अन्ना हजारे

नई दिल्ली. 6 अप्रैल 2011


भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने राजनीतिक दलों का समर्थन लेने से साफ इंकार करते हुये कहा है कि यह जनता का आंदोलन है और इसमें जनता का ही समर्थन लिया जायेगा.

जंतर मंतर पर अनशन कर रहे अन्ना हजारे के प्रति समर्थन जताने के लिए बुधवार को भाजपा की पूर्व नेता उमा भारती और इंडियन नेशनल लोकदल के नेता ओम प्रकाश चौटाला जैसे नेता पहुंचे लेकिन अन्ना हजारे के समर्थकों ने उन्हें वहां से चलता कर दिया. इससे पहले मेनका गांधी और प्रकाश जावड़ेकर भी उनका समर्थन देने पहुंचे थे.

अन्ना के अनशन के पहले दिन विपक्षी दलों के कई नेता अन्ना के पास पहुंचे थे. इन नेताओं ने कहा था कि अन्ना की इस मुहिम में वे पूरी तरह उनके साथ हैं लेकिन बाद में जब मीडियाकर्मियों ने उनसे अलग से बातचीत कर जनलोकपाल बिल के बारे में उनकी राय पूछी तो वे अन्ना हजारे को दिये आश्वासन से मुकर गये. अन्ना हजारे नेताओं के इस कदम से बेहद नाराज थे. उसके बाद से ही उन्होंने साफ कर दिया था कि अब किसी भी राजनीतिक दल को वे अपने मंच का इस्तेमाल नहीं करने देंगे.

अन्ना हजारे ने कहा कि जिस भी राजनीतिक दल को उनका समर्थन करना है, वो उन्हें विधानसभा और संसद में समर्थन करे.

अन्ना हजारे से पत्रकारों ने जानना चाहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चला रही भाजपा का समर्थन लेने में उन्हें क्या ऐतराज है ? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि भाजपा उनके द्वारा देश भर में शुरू किए गए आंदोलन का फायदा उठाना चाहती है. अन्ना हजारे ने कहा 'भाजपा एक राजनीतिक पार्टी है और वह ऐसा कर सकती है. पहले भी भाजपा की सरकारों के दौरान मैंने विरोध प्रदर्शन किया है, तब कांग्रेस उसका समर्थन करती थी. लेकिन अब मामला उलटा हो गया है.'

इस बीच केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा है कि संसद के मानसून सत्र में लोकपाल बिल सदन के सामने लाया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भ्रष्टाचार से लड़ने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने अन्ना हजारे से अनशन समाप्त करने की भी अपील की.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

bhagatsingh [bhagatsingh788@gmail.com] raipur

 
  कोई भी राजनेतिक दल अन्ना हजारे जी का समर्थन नही करना चाहेगा, भले ही कांग्रेस विरोध के नाम पर समर्थन का नाटक करे.वामपंथी से लेकर धुर दक्षिण पंथी दल भी जन लोकपाल बिल नहीं लाना चाहते हैं क्योंकि वे भी सत्ता में आने के बाद जोखिम नहीं लेंगे. इस आन्दोलन को हम सब का समर्थन रहेगा ही.9 अप्रैल को रायपुर में उनके समर्थन में उपवास में बहुत से लोग बैठेंगे. अन्ना हजारे जी के इस आन्दोलन को हम सब का पूरा समर्थन है. 
   
 

archana [] New Delhi

 
  खिचड़ी विप्लव देखा हमने…

सम्मान योग्य अन्ना हजारे अनशन पर हैं। उन्होंने जन लोकपाल की माँग की है और वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैं। यहाँ तक सब स्पष्ट है। सरकारें बेईमान रही हैं, जन प्रतिनिधि दागी और बदनाम रहे हैं। अफ़सर घूसखोर और नेता उन पर मेहरबान रहे हैं। टू जी स्पेक्ट्रम, कामनवेल्थ, आदर्श और कई घोटाले होते रहे हैं। नैतिकता का पतन हुआ है और जनता इनसे परेशान रही है। क्या हम चर्चा करें कि भ्रष्टाचार से परेशान जनता में कौन कौन से लोग हैं? क्या पेशी पर आए लोगों से पाँच रुपए लेते क्लर्क, क्या सड़कों पर छज्जे निकालते लो्ग, दलाली करते पत्रकार या अपने साथ के लोगों को धोखा देते आम लोग!

चलिए नजरिए को स्वीकृति के योग्य बना लेते हैं। आम लोग परेशान हैं क्योंकि खास भ्रष्ट लोगों ने समाज में मात्र बेईमानों को ही लाभ का पात्र बनाया है और इस तरह आम लोग भ्रष्ट होने के लिए मजबूर होते जा रहे हैं। इसीलिए लोग दुखी हैं, चिंतित हैं।

इसीलिए लोकपाल की आवश्यकता है।

अन्ना हजारे, संदीप पाण्डेय, अरविंद केजरीवाल, स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी और कई कई बड़े बड़े नाम इसी की माँग कर रहे हैं। क्या हम आमिर खान, अमिताभ बच्चन, बाबा रामदेव, नफ़ीसा अली, शिल्पा शेट्टी, राखी सावंत का इन्तजार कर रहे हैं! भारत होने के नाते भविष्य के भारत के लिए उनका भी इस आन्दोलन पर उतना ही हक है।

दुख इस बात का है कि यदि काँग्रेस (माफ़ कीजिए, बहुत बड़ी पार्टी है) दक्षिण की निवर्तमान प्रजाराज्यम पार्टी जैसी छोटी पार्टी भी इससे अधिक जनसमर्थन जुटा सकती है और चाहे तो इसके विरोध में भी आम आदमियों की ही इससे बड़ी क्रान्ति कर सकती है।

तब क्यों न लोकपाल के बारे में ही सोचा जाए?

एक लोकपाल जो सर्वशक्तिमान हो, सर्वोपरि हो, न्यायाधीशों के विरुद्ध भी मामले ले सके, चला सके, दंड दे सके। एक साल के भीतर फ़ैसले कर सके!

क्या कुछ और सोचें! जो निरंकुश न हो सके, घपलेबाज न हो सके, हिस्सेदारी न माँग सके, डराया न जा सके और जो सीबीआई से भी ऊपर रहकर मामले सु्लझा सके, तय समय में फ़ैसले दे सके – क्या हम भगवान की बात कर रहे हैं?

उसे नियुक्त किया जाना चाहिए, हमें ऐसे भगवान की आवश्यकता है। जरूरी है कि वह गलत फ़ैसले न करे और वह भगवान ही हो।

भगवान की नियुक्ति कौन करे? जन लोकपाल के मसौदे के अनुसार उसमें भारतीय मूल के नोबेल विजेता और मैग्सेसे (माफ़ करें इस पुरस्कार का हिन्दी उच्चारण थोड़ा कठिन है) शामिल रहें। दोनों विदेशी सरकारों की समितियों से पुरस्कृत लोग इस सभा में चिन्हित हैं। अजीब है कि पुलित्जर, भारत रत्न, निशान-ए पाकिस्तान और नाईटहुड को जगह नहीं दी गई है। क्या हम माँग करें कि इस सूची में ज्ञानपीठ विजेताओं को भी शामिल किया जाए।

केजरीवाल और संदीप पाण्डेय को यह पुरस्कार मिला है और शायद उन्हें यही नाम सबसे ज्यादा विशिष्ट लगे हों। वैसे भी अपने आपको केंद्र में रखकर ही नियम बनाने की परम्परा रही है।

क्या सर्वोच्च न्यायालय को संज्ञान की शक्ति नहीं है? क्या आम आदमी को लोकहित याचिका का अधिकार नहीं है? क्या सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग की व्यवस्था नहीं है? क्या सर्वोच्च न्यायालय भ्रष्टाचार के मामलों की लगातार देख्रेने के लिए स्थायी पीठ नहीं बना सकती है?

लोकपाल के रूप में हम किस भगवान के उतर आने की कामना करें? क्या सूचनाधिकार वाले शैलेष गाँधी से खुश हैं? क्या लोकपाल वाले अरविंद केजरीवाल से खुश हो जाएँगे?

कांग्रेस की सरकार (भाजपा और वामदल भी) जनमत के खेल को जानते हैं, सबने मीडिया स्पेश्लिस्ट रखे हैं, जो सिर्फ़ जनमत के जोड़-तोड़ का अध्ययन करती रही है। मामला बड़ा हो गया है। अन्ना एक वाहियात ड्राफ़्ट के साथ और उससे भी अधिक वाहियात लोगों के साथ खड़े हो गए हैं। भ्रष्टाचार कम करने के लिए व्यवस्था बदलनी होगी, वह उसके भीतर से उपज रही है। साथ खड़े लोग यह जाने बगैर खड़े हो गए हैं कि क्या लोग संविधान की संस्थाओं से भी ताकतवर कानूनी संस्था चाहते हैं? क्या लोग चाहते हैं कि कोई आदमी तय समयसीमा में कानूनी फ़ैसले करे? क्या लोग उसकी जल्दबाजी के गलत फ़ैसलों का बोझ उठाने के लिए तैयार हैं? और क्या लोग यह सपना दे्खना चाहते हैं कि दूसरों की गर्दन मरोड़ने की बेपनाह ताकत रखने वाले लोकपाल बगैर किसी लोभ के जनता के लिए ही काम करेंगे?

पूज्य अन्ना साहब,

इरो्म बड़े लम्बे अनशन करती है, बेवकूफ़ भी नहीं बनती है, और उसके कारण कोई बाबा रामदेव यह महसूस नहीं करते कि भ्रष्टाचार का मुद्दा उनसे छिन गया है। कृपया देश के कुकर के सेफ़्टी वाल्व न बनें और लोगों की उम्मीदों को लोकपाल का धोखा न दिखाएँ।

पुनश्च:

लेखक बिहारी है- और इस क्रान्ति के दूसरी क्रान्ति कहे जाने से नाराज है। उसकी समझ से संपूर्ण क्रान्ति दूसरी क्रान्ति की बात करती थी, दूसरी आजादी की भी। उसके सबसे प्रखर लोक-प्रसारक बाबा नागार्जुन ने लिखा कि–‘ खिचड़ी विप्लव देखा हमने…”

ये विप्लव किस श्रेणी का होगा- अन्दाजा लगा लें।
 
   
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