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लोकपाल समस्या का हल नहीं- माओवादी

लोकपाल समस्या का हल नहीं- माओवादी

नई दिल्ली. 20 अप्रैल 2011


अन्ना हजारे के अनशन और उसके बाद जन लोकपाल के लिये कमेटी बनाये जाने के मुद्दे पर माओवादियों ने अपना रुख स्पष्ट करते हुये कहा है कि लोकपाल विधेयक के लिए सरकार द्वारा सांझी कमेटी की घोषणा की जाने के बाद अन्ना हजारे ने तो अपनी अनशन तोड़ दी, लेकिन जनता को इससे इंसाफ नहीं मिला, जो देश भर में उनकी हड़ताल के साथ खड़ी हुई थी.

माओवादियों की ओर से पार्टी की केद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि सरकार ने यह मांग अन्ना की भूख हड़ताल से डरकर पूरी नहीं की, बल्कि उनके समर्थन में उभर कर आए जनता के आक्रोश को ठण्डा करने के लिए की. शासक वर्ग को पता है कि इस तरह के कानूनों से मौजूदा व्यवस्था को कोई नुकसान नहीं होने वाला है, इसीलिए उन्होंने बेखौफ होकर लोकपाल विधेयक के लिए कमेटी की घोषणा की.

भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में आगे आई जनता के रुख का स्वागत करते हुये कहा गया है कि “भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष का हमारी पार्टी तहेदिल से समर्थन करती है. हमारी पार्टी का यह विश्वास है कि जनता के सांझे, संगठित और जुझारू संघर्षों के जरिए ही भ्रष्टाचार का अंत करना संभव हो सकेगा. हमारी पार्टी देश की जनता से आग्रह करती है कि वह सरकार द्वारा घोषित सतही कानूनों और कानून तैयार करने के लिए कमेटियों के गठन की घोषणाओं से संतुष्ट होकर अपने संघर्ष को समाप्त न करे, बल्कि संघर्ष की राह पर दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़े.”

माओवादियों ने इसके लिये मजदूरों, किसानों, छात्र, बुद्धिजीवियों, कर्मचारियों, जनता की भलाई चाहने वाले गांधीवादियों समेत तमाम देशभक्त तबकों का एक व्यापक संयुक्त मोर्चा बनाने की अपील की है.

विज्ञप्ति में कहा गया है कि हाल के दिनों में उजागर हुए 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कामनवेल्थ घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी, कर्नाटका जमीन खरीद, एस-बैंड स्पेक्ट्रम आदि घोटालों ने भ्रष्टाचार को फिर एक बार एक बड़ी समस्या के रूप में सामने लाया है. मजदूर, किसान, आदिवासी, दलित, महिलाएं, मुख्य रूप से शहरी मध्यम वर्ग आदि सभी वर्गों और सभी तबकों की जनता भ्रष्टाचार के खिलापफ अपना गुस्सा और नाराजगी प्रकट कर रही है.

अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता को रेखांकित करते हुये विज्ञप्ति में कहा गया है कि जनता में भ्रष्टाचार, भ्रष्ट राजनीतिक पार्टियों तथा उन पार्टियों के नेताओं के प्रति संचित गुस्से का नतीजा ही था कि हाल में अन्ना हजारे द्वारा की गई भूख हड़ताल को देश भर में जनता से मिली प्रतिक्रिया. विज्ञप्ति के अनुसार अन्ना हजारे के अनशन का लक्ष्य जन लोकपाल विधेयक था लेकिन देश के चारों कोनों से व्यक्त हुई जनता की आकांक्षा भ्रष्टाचार को जड़ से सफाया करने की है.

हालांकि माओवादियों ने साफ किया है कि “लोकपाल विधेयक तैयार करने हेतु कमेटी का गठन कर उसमें आधे सदस्यों का चयन नागरिक समाज में से करने का सरकार ने जो फैसला लिया, इससे इस समस्या का हल हो गया या हो जाएगा, ऐसा मानना नादागी ही होगी. दरअसल आज भ्रष्टाचार के इतने गहरे तक जड़ें जमा लेने और बेहिसाब बढ़ जाने का यह कारण नहीं है कि यहां इसे रोकने का कोई कारगर कानून-कायदा ही मौजूद नहीं है. कानून चाहे जितने भी हों, चूंकि उन पर अमल करने और करवाने वाली व्यवस्था पर ही लुटेरे वर्गों का कब्जा है, इसीलिए यह बदहाली व्याप्त है. एक जमाने के जीप घोटाला और लॉकहीड विमान खरीदी घोटाले से लेकर राजीव गांधी के समय का बोफोर्स घोटाला आदि अनगिनत घोटालों का लम्बा इतिहास रहा है. चंद करोड़ रुपयों से शुरू कर आज लाखों करोड़ रुपए के घोटाले सामने आ गए हैं. कांग्रेस, भाजपा जैसी मुख्य संसदीय पार्टियों से लेकर आरजेडी, बीएसपी, एसपी, डीएमके, अन्ना डीएमके, तेलुगुदेशम वगैरह सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय पार्टियों के नेता व मंत्री तथा उनके पिट्ठू प्रशासनिक अधिकारी सभी का दामन भ्रष्टाचार से दागदार है.”

भारतीय न्यायप्रणाली पर सवाल उठाते हुये विज्ञप्ति में कहा गया है कि देश में पहले से मौजूद कानूनों पर ठीक से अमल कर और विभिन्न भ्रष्टाचार-विरोधी विभागों का ठीक से संचालन कर ऐसे भ्रष्टाचार-घोटालों को रोका जा सकता है तथा उसके लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी सजाएं दिलवाई जा सकती हैं. लेकिन पिछले 64 सालों के ‘आजाद’ भारत के इतिहास में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है जिसमें भ्रष्ट राजनेताओं, मंत्रिायों, कार्पोरेट घरानों के मालिकों और नौकरशाहों को कभी कोई सजा मिली हो. जनता और विपक्ष के दबाव के कारण विरल मौकों पर किसी को गिरफ्तार कर किया भी गया तो सालों साल तक खिंचने वाली अदालती कार्रवाई के बाद मामलों को रफा-दफा कर दिया जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मौजूदा न्याय व्यवस्था भी देश की शोषक राज्य मशीनरी का अभिन्न अंग है. यह उम्मीद रखना कि कानूनों या न्यायालयों के जरिए भ्रष्टाचार का अंत हो जाएगा, मरीचिका में पानी की उम्मीद रखने के बराबर होगा.

विज्ञप्ति में पार्टी ने अपना तर्क रखते हुये कहा है कि “ भ्रष्टाचार व घोटाले उस पूंजीवादी व्यवस्था का विकृत परिणाम है जिसका मूल मंत्र ही मुनाफे के पीछे भागना है. हालांकि पूंजीवाद उपर से लोकतंत्र का चोला ओढ़े रहते हैं तथा आजादी, समानता आदि मूल्यों की रट लगाया करते हैं, लेकिन वास्तव में वह दूभर श्रम-शोषण, रिश्वतखोरी, दलालखोरी आदि व्यवस्थाओं से भरे रहते हैं. इसलिए भ्रष्टाचार और अव्यवस्थाओं को जड़ से खत्म करने का मुद्दा व्यवस्था-परिवर्तन से जुड़ा हुआ सवाल है. यह मानकर चलना एक कोरा भ्रम ही होगा कि देश में मौजूद अर्धऔपनिवेशिक व अर्ध सामंती व्यवस्था को बनाए रखते हुए ही चंद बेहतर कानूनों के सहारे से इस समस्या का पूरी तरह समाधन किया जा सकता है. दरअसल घोटालों के रूप में जो उजागर होते हैं, उनसे कई गुना ज्यादा रोशनी में आए बिना ही रह जाते हैं.”

विज्ञप्ति में अनेक राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर रिश्वतखोरी के आरोप लगाते हुये कहा गया है कि “ सरकारों द्वारा लागू उदारीकरण, निजीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों ने ही इस तरह के कई भ्रष्टाचार-घोटालों के लिए तथा देश की सम्पदाओं की मनमानी लूटखसोट के दरवाजे खोल रखे हैं. इस पृष्ठभूमि में इन साम्राज्यवाद-परस्त नीतियों का विरोध किए बिना तथा उनके खिलाफ संघर्ष छेड़े बिना ही भ्रष्टाचार का अंत कर पाने की आस लगाए बैठना या कर पाने का दावा करना जनता को गुमाराह करना ही है.”


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