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गोरखपुर फायरिंग में प्रशासन की भूमिका संदिग्ध

गोरखपुर फायरिंग में प्रशासन की भूमिका संदिग्ध

 

नई दिल्ली. 4 जून 2011

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में 3 मई को एक कारखाने के मज़दूरों पर हुई फायरिंग की जांच करने वाले मीडियाकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के जांच दल ने वहां ज़िला प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करते हुए समस्त घटनाओं की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच कराने की मांग की है.

इस जांच दल ने 19 से 21 मई तक गोरखपुर का दौरा करके और विभिन्न पक्षों से बात करने के बाद नई दिल्ली में अपनी जांच रिपोर्ट जारी की. इस जांच दल में दिल्ली के पत्रकार नागार्जुन सिंह, फिल्मकार चारु चन्द्र पाठक और कोलकाता के पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता सौरभ बनर्जी शामिल थे. तीन दिनों के दौरान जांच दल ने विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों, श्रम विभाग, स्थानीय सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, श्रम संगठनों, मीडियाकर्मियों, श्रमिकों, श्रमिक नेताओं और प्रबुद्ध नागरिकों से मुलाकात करके इस पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जांच की.

रिपोर्ट के अनुसार फायरिंग की घटना का तात्कालिक कारण यह था कि कई कारखानों के करीब 1500 मज़दूर 1 मई को आयोजित मज़दूर मांगपत्रक आंदोलन की रैली में शामिल होने के लिए दिल्ली चले गये थे, जबकि कारखाना मालिकान इसका विरोध कर रहे थे. दिल्ली से लौटने पर 18 चुनिंदा श्रमिकों को निलंबित कर दिया गया. 3 मई को हथियारबंद लोग जब श्रमिक नेता प्रशांत को जबर्दस्ती फैक्टरी के अंदर ले जाने का प्रयास कर रहे थे तब श्रमिक आक्रोशित हुए और इसके विरोध तथा अपने बचाव में उन्होंने पथराव किया. इसके बाद फैक्टरी के अंदर से हुई फायरिंग में एक छात्रा समेत 19 मज़दूर घायल हो गये.

जांच टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची कि 3 मई को हुई फायरिंग एक अलग-थलग घटना नहीं बल्कि गोरखपुर में दो वर्ष से मालिकों और मज़दूरों के बीच में चल रहे टकराव की ही परिणति है. पिछले लगभग दो वर्ष से मज़दूर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं जो अब संगठित रूप ले चुका है. यह फैक्टरी प्रबंधन के लिए चिंता का सबब बन चुका है. श्रमिकों के प्रति प्रशासनिक दृष्टिकोण भी सहयोगात्मक नहीं है. जांच में यह बात मुख्य रूप से उभर कर आई कि श्रमिकों का पक्ष पूरी तरह नहीं सुना जा रहा है और प्रशासनिक स्तर पर उपेक्षा और बल प्रयोग से बात और बिगड़ रही है.

जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश शासन से मांग की है कि अंकुर उद्योग लि. में हुई फायरिंग की उच्च स्तरीय जांच करायी जानी चाहिए. टीम ने कमिश्नर द्वारा मजिस्ट्रेट जांच के आदेश को असंगत मानते हुये तर्क दिया है कि पूरे प्रकरण में प्रशासनिक भूमिका संदेह के दायरे में है. टीम की अन्य संस्तुतियों में फायरिंग के दोषी व्यक्तियों की गिरफ्तारी, श्रमिकों तथा उनके नेतृत्व से सौहार्दपूर्ण माहौल में वार्ता करके उनकी समस्याओं का समाधान करना, गोरखपुर औद्योगिक क्षेत्र की फैक्टरियों में श्रम कानूनों की वास्तविक तस्वीर सामने लाना और इनमें श्रम कानूनों के अनुपालन को सुनिश्चित कराना, पुलिस की भूमिका की जांच कराना और गोलीकांड में घायल लोगों को सरकार द्वारा उचित मुआवजा दिया जाना शामिल है.