पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
चावल से चुनावी दाल गलाने की कोशि

चावल से चुनावी दाल गलाने की कोशिश

छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव में भले अभी दस महीने बचे हों लेकिन चुनावी राजनीति अभी से शुरु हो गई है. राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह-तरह के आश्वासन देना शुरु कर दिया है. छत्तीसगढ़ विकास पार्टी ने कहा है कि अगर वह सत्ता में आती है तो हर बेरोजगार को 1750 रुपए देगी तो बसपा अध्यक्ष मायावती ने राज्य के सभी गरीब मतदाताओं को 3 एकड़ जमीन मुफ्त देने का वायदा किया है. एक अन्य पार्टी ने सभी आदिवासियों को घर बना कर देने का आश्वासन दिया है.

लेकिन इन वायदों से अलग राज्य में बीपीएल धारियों को कम क़ीमत पर चावल देने के मुद्दे पर भाजपा सरकार और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बीच जंग छिड़ी हुई है.

भाजपा सरकार ने 16 जनवरी से राज्य के 34 लाख कथित बीपीएल परिवार को 3 रुपए की दर से हर महीने 35 किलोग्राम चावल बांटने का कार्यक्रम शुरु किया है.

चावल बांटने के इस मुख्यमंत्री खाद्यान योजना को भाजपा ने चुनावी बिगुल फूंकने वाले अंदाज में बड़े तामझाम और प्रचार-प्रसार के साथ शुरु किया. इस योजना की शुरुवात के लिए भाजपा ने राज्य के सभी 18 जिलों में एक ही दिन रैलियां और सभाएं की. हर जिले में भाजपा के किसी बड़े दिग्गज को कमान सौंपी गई थी, जिसमें राजनाथ सिंह और वैंकेया नायडू से लेकर नरेंद्र मोदी, वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह जैसे अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल थे.

लेकिन पहले दिन से ही चावल बांटने की योजना विवादों में घिर गई. विवाद का पहला मुद्दा बने वे 34 लाख परिवार, जिन्हें सरकार ने बीपीएल माना. राज्य सरकार ने महीने भर पहले ही विधानसभा के शीतकालीन सत्र में एक सवाल के जवाब में सदन में कहा था कि राज्य में 2002 में किए गए अंतिम सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में 17.89 लाख औऱ शहरी क्षेत्र में 3.15 लाख परिवार यानी कुल 21.4 लाख बीपीएल हैं. लेकिन महीने भर बाद जब सरकार ने 3 रुपए किलो चावल बांटने की योजना की शुरुवात की और बीपीएल धारियों को राशन कार्ड बांटना शुरु किया तो यह संख्या 34 लाख बता दी गई.

चावल बांटने की इस योजना ने राज्य में जिस तरह गरीबों की बाढ़ लाई, उसने सरकार को मुश्किल में डाल दिया है. योजना आयोग भले 46 फीसदी से अधिक परिवारों को बीपीएल मानने के लिए तैयार नहीं हो लेकिन ताज़ा आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में 18 में से 5 जिले ऐसे हैं, जहां 80 फीसदी परिवार गरीबों की श्रेणी में आते हैं. औद्योगिक विकास के लिए मशहूर रायगढ़ जिले में 94 प्रतिशत यानी 2 लाख 53,890 परिवारों को बीपीएल के राशनकार्ड दिए जा चुके हैं.

विपक्ष ने जब इस पर हंगामा शुरु किया तो राज्य के हरेक जिले में फर्जी तरीके से बीपीएल धारियों की संख्या बताए जाने की सरकारी पोल खुलने लगी. बीपीएल परिवारों में शामिल किए जाने से बेहद नाराज कोरबा राजपरिवार के मुखिया मिलान सिंह कहते हैं- सरकार ने मजाक बना रखा है. हमें बीपीएल धारियों में क्यों शामिल किया गया, इससे हम चकित हैं. हम पूरे मामले को कोर्ट तक ले जाएंगे.

हालत ये है कि हर दिन राज्य के अलग-अलग हिस्सों से हजारों की संख्या में ऐसे बीपीएल कार्ड जांच में सामने आ रहे हैं, जो गलत तरीके से जारी किए गए हैं.

राज्य के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति सचिव डाक्टर आलोक शुक्ला कहते हैं- बीपीएल कार्ड बांटने में गड़बड़ी तो हुई है. इसलिए हमने कलेक्टरों को निर्देश दिया है कि वे कार्ड वितरण के मामले को गंभीरता से लें और इसकी जांच भी करें.

इसके अलावा सरकार ने प्रत्येक गांव में ग्रामसभा में राशनकार्डधारियों की सूची का पाठ कराने के निर्देश भी दिए हैं. लेकिन सरकार की मुश्किलें इतने भर से कम हो जाएंगी, इसकी संभावना कम ही है.

चावल बांटने की इस योजना ने विशेष पिछड़ी जनजातियों के चूल्हे पर चढ़ी हांडी भी उतार दी है. पहाड़ी कोरवा और बिरहोर जनजाति को अन्नपूर्णा योजना के तहत 10 किलोग्राम चावल बरसों से मुफ्त मिलता रहा है. लेकिन इस योजना के शुरु होने के बाद से इन आदिवासियों को मुफ्त चावल दिए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

राज्य में 15 लाख अतिगरीब परिवारों को राज्य में पहले ही केंद्र सरकार की अंत्योदय अन्न योजना के तहत हर महीने 35 किलोग्राम चावल 2 रुपए प्रति किलो की दर से मिलता रहा है. इसके अलावा 65 वर्ष से अधिक उम्र के बेसहारा लोगों को अन्नपूर्णा योजना के तहत 10 किलोग्राम चावल मिलता रहा है.

राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी कहते हैं- "रमन सरकार प्रति माह महज 6.65 करोड़ रुपये की सहायता राशि देकर गरीबी रेखा से नीचे-बीपीएल और अंत्योदय परिवारों को तीन रुपये किलो चावल देने की योजना पर 800 करोड़ रुपये खर्च करने का भ्रामक दावा कर रही है. सच तो यह है कि उसे उचित मूल्य पर राशन वितरण के लिये केन्द्र प्रति वर्ष 1101.18 करोड़ रुपये की खाद्यान्न सब्सिडी दे रहा है."

केन्द्र की बीपीएल, अंत्योदय खाद्यान्न योजना का नाम बदल कर मुख्यमंत्री खाद्यान्न योजना किये जाने का आरोप लगाते हुये अजीत जोगी कहते हैं कि जिस योजना को रमन सरकार खूब बढ़ा चढ़ाकर प्रचारित कर रही है उसमें 90 प्रतिशत योगदान केन्द्र का है जबकि राज्य का महज 10 प्रतिशत है.

लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह जोगी के आरोप को गलत ठहराते हुए केंद्र की नीतियों को ही गड़बड़ बताते हैं. रमन सिंह इस योजना को दुनिया की सबसे बड़ी खाद्यान योजना बताते हुए कहते हैं- केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ के हिस्से का एपीएल के चावल का कोटा 61 हजार मीट्रिक टन से घटाकर 616 टन कर दिया है. इससे राज्य को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. अंत्योदय अन्न योजना के सात लाख परिवारों के लिए ही केंद्र सरकार से चावल मिल रहा है. बाकी योजना राज्य के बजट से संचालित की जा रही है.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष चरणदास महंत ने घोषणा की है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो राज्य के गरीबों को 2 रुपए किलो चावल दिया जाएगा.

जाहिर है, भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस भी चावल की हांडी चढ़ा कर अपना चुनावी दाल गलाना चाह रही है. इसमें किसे सफलता मिलेगी, इसके लिए तो राज्य की जनता भी नवंबर में होने वाले चुनाव की प्रतीक्षा कर रही है.

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in