बूढ़े प्रेम की ये कविताएं | मैत्री | तेजी ग्रोवर
पुस्तक अंश
मैत्री
कविता संग्रहः तेजी ग्रोवर
प्रकाशकः सूर्य प्रकाशन मन्दिर,
नेहरु मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर
suryaprakashan@gmail.com
मूल्यः एक सौ पच्चीस रुपये
बूढ़े प्रेम की कविताएं
ये कविताएं चित्रकार अम्बादास को
समर्पित
वे एक या दो-दो लकड़ियां उठाये, टीले के सूर्य की सान्ध्यकालीन चित्रलिपि में एक
चिता को लिख रहे हैं नदी के तट पर
रुदन न होने से दुख केवल एक दृश्य है, जिसे छायाएं आग देती हैं, पानी के पास, एक
पंक्ति में. निश्शब्द.
नदी सिर्फ़ एक सतह है प्रवाह में, खाली है, रुग्ण है, सौन्दर्य का शल्क है, और नदी
है.
वह जो कोई भी था, उन लकड़ियों में, वे लकड़ियां थीं, और वे भी जल रही थीं. किसी के
लिए भी कोई रो नहीं रहा था.
उस समय टीले पर आसन जमाये हम ह्रदय में खींच रहे थे धुंएं को. बांस के झुरमुट के तने
भी कुछ-कुछ जले थे और बांस के पीले पत्तों की राख उड़ रही थी.
मैंने एक दहकता गुलमोहर तुम्हारी गोद में रख दिया था उस शाम, घर लौटने से पहले.
वहां खखरा के झाड़ भी थे, और हम उन्हें पलाश कहते थे
कौए वन में से निकलती हुई बिजली की तारों पर किसी घटना का शोर मचाये बैठे थे.
कहीं कुछ हुआ है, तुमने कहा. मैं अपने वन को देखने लगी, तुम अपने वन को.
दूर-दूर तक हमारी दृष्टि कुछ काले, पीले, सफेद, धब्बों और ध्वनियों से छूकर वापिस
आती रही.
कहीं कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे हम बूझ सकते, जैसे वन में हमारा मन ही हमें दिखायी
देने लगा था-
क्या हम प्रेम करते हैं
क्या हम करुणा से भरे हैं
क्या पक्षी हमें सान्तवना देते हैं
हम
चिड़िया को देख चिड़िया से मिलने वाले सुख में कुछ और देख लेते थे और सहम जाते थे.
हम आहत थे और रुग्ण थे और हर बात मन में रंग की तरह लगाकर बैठ जाते थे.
अपने अंग-संग दिन-रात रहने वाले शख़्स की याद आने लगती थी और रोना आता था.
कोई बहुत दूर था, उसकी गन्ध रन्ध्रों में फूट पड़ती थी, और सफेद रात घिर आती थी.
पास बैठे हुए की याद में हम उसकी किताबों से धूल पोंछने लगते थे.
मन की इस मरुभूमि में धूल का कोई अन्त नहीं था.
02.02.2009,
17.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित