पुस्तक अंश | मलयज | रंग अभी गीले हैं
पुस्तक अंश
रंग अभी गीले
हैं
मलयज के पत्र
सुप्रसिद्ध साहित्यकार मलयज द्वारा रमेशचंद्र शाह को लिखे गये
पत्रों का संग्रह
प्रकाशकः सूर्य प्रकाशन मन्दिर,
नेहरु मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर
suryaprakashan@gmail.com
मूल्यः तीन सौ रुपये
दिल्ली
09-1-72
भाई शाह साब,
आपका बड़ी एकात्म उदास-विह्वलता से भरा वह कार्ड मुझे मिला था. तत्काल उसका उत्तर
मैं न दे सका. जिस गहरी अनासक्त पीड़ा से उद्भूत वे शब्द थे उसका जवाब मैं किन
शब्दों से देता. बस महसूस करके रह गया. इस चुप रह जाने में आपके प्रति अन्याय तो
मैंने जरूर किया, इस अन्याय के प्रति अपने को धिक्कारता भी रहा. पर गहराई का जवाब
कम गहराई या उथली गहराई से देना अपने प्रति भी अन्याय करना होता. फिर सोचा कि आपकी
वर्तमान मनःस्थिति में शायद शब्द से अधिक सार्थ वर्ण की रेखाएं हों. अतः इस वर्ष का
एक कार्ड भेजा. पिछले बार वाला आपको बड़ा पसंद आया था न…
परसों से बुखार में पड़ा हूँ. अभी भी उससे मुक्त नहीं हूँ. दो दिन की छुट्टी और लेनी
पड़ेगी. आजकल दिल्ली में शीतलहर चल रही है. मुझ जैसे नाचीज का धराशायी हो जाना क्या
मुश्किल. आज तबियत को थोड़ी राहत है, ऐसे में बिस्तर पर पड़े पड़े आपको खत लिखने में
काँपती उंगलियों के बावजूद एक अजब तरह का आनन्द आ रहा है. आपको शायद पता नहीं
रानीखेत की अपनी बहुत सी डायरियाँ मैंने बुखार में तपते हुए ही लिखी हैं. इस वक्त
आपको खत लिखते समय रानीखेत की उस छोटी सी मोटी-मोटी सलाखोंदार छोटी-सी कोठरी का
चित्र मेरी आँखों के आगे उभर आया है. रात का वक़्त है. कोठरी से लगे पोस्टआफिस में
देर तक रूक कर काम करने वाले दो चार पहाड़ी बाबुओं की आवाजें आ रही हैं. सलाखों के
सामने देवदार के पेड़ों का एक झुंड है, थोड़ा ऊंचाई पर. उसके दूसरी तरफ नीचे बाजार को
रास्ता घूमता हुआ चला जाता है. कोठरी में मिट्टी के तेल की कुप्पी जल रही है. एक
चारपाई भर डाल सकने वाली उस छोटी सी कोठरी में उस कुप्पी की रोशनी में तकिए पर
डायरी रखे मैं कुछ लिख रहा हूँ. बाहर की साँय साँय - हवा की, कहीं टिड्डियों
की....जैसे अनस्तित्व मूर्तिमान हो उठा हो, और सिर्फ वह तेल की कुप्पी ही अस्तित्व
का चिन्ह हो, मैं भी नहीं, डायरी भी नहीं, सिर्फ वह तेल की कुप्पी.... मेरी उस तेल
की कुप्पी का खर्च एक आना रोज का था, रोज शाम को जा कर मोदी की दुकान से भरवा लाता
था. करीब करीब रात भर ही जलती रहती थी.
इसी कुप्पी की रोशनी में मैने रामचरितमानस के आदि से अंत तक कई बार पाठ किए होंगे.
वहां किताबें ही क्या मिलती जो पढता. मानस का उतना मनोयोगपूर्ण एकाग्र पाठ कभी न कर
सका. उस दर्मियान कविताएं भी खूब लिखीं.
लेकिन मैं जरूरत से ज्यादा बहकता जा रहा हूँ. मेरे जीवन के अविस्मरणीय प्रसंगों में
रेलवे स्टेशन और प्लेटफार्म बहुत निजी प्रसंगो की श्रृंखला लिए हुए है. क्या इंसान
नौस्टेल्जिया के बिना भी रह सकता है ? मेरा ख्याल है बिना नौस्टेल्जिया के जीवन बड़ा
फीका और अधूरा होगा. मेरे दिमाग में कई जगहों के कई रेलवे स्टेशन और उनके
प्लेटफार्म हमेशा के लिए अंकित हो गए हैं. आपके साथ इस बार प्लेटफार्म पर बिताए गए
कुछ घंटे भी एक ताजे चित्र के समान है. उन्हें अभी छुऊंगा नहीं, क्योंकि रंग अभी
गीले हैं.
हमारे एक मित्र हैं, इस वक्त जापान में हैं, उन्हें पुरानी क्रिस्तानी सिमिट्रियों
से बड़ा लगाव था. इलाहाबाद में रसूलाबाद तरफ और मैक्फर्सन लेक की तरफ ऐसी कई
सिमिट्रियाँ थी. वे कभी-कभी साइकिल पर बिठाकर हमें वहां ले जाया करते थे. लगता था
कि शुरू विक्टोरियन युग में चले आए हैं, या कि क्रिस्टिना रोजेटी के जमाने में.
मसूरी के कैमल्ज़ बैक रोड वाली सिमिट्री भी मेरे दिमाग पर बहुत दिन तक छायी रही.
लगता है कि बहुत सी अंग्रेजी कविताओं को तब तक महसूस नहीं किया जा सकता जब तक आप
किसी पुरानी सिमिट्री को महसूस न कर लें.
इस वक्त मुझे बहुत कुछ याद आ रहा है. याद करना जैसे इस वक्त अपने को मुक्त करना है.
किससे ?
कल तक यहीं तक लिख सका था. लगता है जितनी जल्दी यह पत्र आप तक भेजना चाहता हूं उतनी
जल्दी नहीं पहुंच पाएगा. कल रात से बुखार फिर चढ गया है. अभी दवा से एक गहरी नींद
लेने के बाद उठा हूँ. तबियत हल्की लग रही है. और मेरा यह पत्र भी एक डायरी का सा ही
रूप लेता जा रहा है.
आपकी पन्ना में जैसे संपर्क-शून्य सी स्थिति रहती है, उससे मेरी स्थिति कोई ज्यादा
बेहतर नहीं है. कहने को यहां क्या नहीं है, पर देखो तो कुछ भी नहीं. मैं भी
गीताप्रेस वाली उपनिषद ले आया हूँ और धीरे धीरे पढ़ता हूँ. जिस मनोयोग से आपको
पतंजलि का योग दर्शन पढते-गुनते देखा था उतना तो मेरे बूते का नहीं. पर जब तबियत
कुछ गंभीर खोजती है तब उसे ही उठाता हूं.
मैंने वह येट्स वाला अनुवाद बहुत ढूंढा. मिला नहीं.
इधर कुछ खास पढने को न मिल रहा है न सूझ रहा है. साहित्यिक चिन्ताओं से ज्यादा कुछ
घरेलू भौतिक चिंताएं चित्त को घेरे हुए हैं. इस बार का जाड़ा बड़ा अनप्रॉड्क्टिव रहा
…न तो कोई लेख, न कविता ही. आप लिख लिख कर पछताते हैं. मैं न लिख पाने से पछताता
हूं.
कविता संग्रह की कुछ प्रतियां पत्नी इलाहाबाद से लायी थीं. स्थानीय कुछ लोगों को दी
है. बाहर समीक्षा के लिए भी खुद ही पैकेट बना बना कर भेजना है. यह समय साध्य और
व्यय साध्य दोनों ही है, अतः अभी कुछ कर न सका. सर्वेश्वर जी को एक कापी दी थी,वे
चुपके हो लिए हैं. दिनमान में कुछ खबर ही नहीं.
शमशेरजी से कुछ सप्ताह पहले मुलाकात हुई. वे अभी हाल ही में अपने भाई के पास से
लौटे हैं पूरी तरह से आराम करके. अब चूंकि शमशेरजी इतनी दूर चले गए हैं कि उनसे
अक्सर मुलाकात नहीं हो पाती. अच्छे हैं, हालांकि पहले जैसे ही दुबले हो कर लौटे
हैं.
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ये सब सूचनाएं मैं आपको लिखता चला जा रहा हूं. इन्हें लिखने में मेरा भी खास उत्साह
नहीं. क्योंकि आपके साथ पत्र-संपर्क इन सूचनाओं से ऊपर एक बिलकुल ही भिन्न स्तर पर
होता रहा है. आपके कार्ड की याद आती है. एक पूरी रचना की सी एकाग्रता उसमें है. और
अंत में कीट्स की पंक्ति से जिस अनायास ढंग से अपनी मनःस्थिति का ज्ञापन किया है वह
बेजोड़ है. आपकी स्वयं के प्रति शंकाएं और संदेह, अन्तर्मंथन हर बार एक नयी धार लिए
हुए होते हैं. ये स्वयं से ऊबे परेशान आदमी का लक्षण तो नहीं है. आपकी शंका
आत्मघाती नहीं है. आपकी कविताएं पढ कर मैं एम्बेरेस भी नहीं हुआ. हां, यह जरूर है
कि उन पर आपसे बातचीत न हो सकी. हां, आपने मेरी कविता पर जो लंबी टिप्पणी लिखी थी
उसके कई अंशों पर मैं एम्बेरेस जरूर हुआ - वह इसलिए कि आप मेरे प्रति तटस्थ नहीं हो
सके थे. कुछ उत्साह ज्यादा ही था. शायद इसलिए कि वह सब एक तरंग में लिखा गया था.
दुबारा उस पर काम करते तो वह ठीक हो जाता. पर अब तो आपने वह भेज ही दिया है.
इन्सिडेन्टली वह कविता शमशेरजी को भी बहुत अच्छी लगी.
बंधु, अब पत्र समाप्त करता हूं. आप कुछ अपने मन की बातें लिखें. जो गुना हो, पढा हो
बताएं. पतंजलि के अपने अध्ययन में कहां तक पहुंचे? ज्ञान की दो-चार किरणें इधर भी
फेंकें. अपने पूर्व पत्र में आपने जो रस दर्शन और द्वंद्व दर्शन की विपरीत
दृष्टियों और उनके संभावित सामंजस्य की बात की थी वह बड़ी गहरी बात थी. वैसे रस
दर्शन मेरी समझ में अभी तक पूरी तरह आया नहीं है. कॉन्फ्लिक्ट का दर्शन तो वैसे भोग
ही रहा हूं. इस पर कभी जम कर बात करूंगा. आपने इस दिशा में कुछ और खोजबीन की हो तो
लिखियेगा. अन्ना ऐरेन्ट की ‘ह्यूमन कंडीशन’ पढने के लिए लाया हूं. पर ज्यों की
त्यों धरी है. अब इस बुखार में मस्तिष्क इतना सुन्न पड़ गया है कि शायद ही उसे पढ
पाऊं.
ज्योत्स्नाजी क्या अभी बंबई में ही हैं ? आ गई हों तो मेरा नमस्कार कहें.
आपका
मलयज
पुनश्चः आपका तौलिया यहां सुरक्षित रखा है. जोधपुर के बारे में नई खबर लिखिएगा.
नामवरजी यहां आए थे, मुलाकात हुई थी. अपनी किताब उनको दे नहीं पाया. अब पोस्ट से
भेजनी पड़ेगी. आप जोधपुर कब जा रहे हैं?
000
दिल्ली
21.5.72
भाई शाह साब,
आपका 11 तारीख का पत्र यथासमय ही मिल गया था. उत्तर अब जा कर दे पा रहा हूँ. आप इस
देरी पर कुढ़ रहे होंगे, जानता हूँ. पर एक तो मैं श्री कृष्णगोपाल वर्मा से मिलकर
कुछ निश्चित जान लेना चाहता था और दूसरे इधर कई निहायत वाहियात घरेलू झंझटों में
फंस गया था. दोनों में ही कई दिन निकल गए. कल रात वर्माजी से मुलाकात हुई. वे
सौभाग्य से अभी दिल्ली में ही हैं- देहरादून 2/6 तक जाएंगे. कापियाँ जांचने में और
दूसरे पारिवारिक मामलों में वे बेतरह उलझे रहे. आपका पत्र उन्हें मिल गया था, उससे
वे मुतासिर भी दीखे. अब शायद दो-एक दिन में कापियों से निबट कर वे आपको उत्तर देंगे
–
ऐसा उन्होंने कहा. उनकी बातचीत से दो-एक बातें साफ हुई. 1. दिल्ली कैंपस के कालिजों
में किसी बाहर के आदमी को लिया जाना बहुत संदिग्ध- लगभग असंभव है. उन कालिजों में
यहीं के पास किए विद्यार्थियों को तरजीह दी जाती है और हर साल फर्स्ट क्लास में
निकलने वालों की कमी नहीं है. 2. नान-कैंपस कालिजों में वर्मा अपने कालिज के हेड आफ
डिपार्टमेंट श्री कोहली के साथ सारा जोर लगा देंगे कि आपको किसी परमानेंन्ट
वेकेन्सी में जगह मिल जाय. ऐसे कोई दस-बारह कालिज हैं. हिन्दुस्तान टाइम्स में
विज्ञापन निकलते ही आप सबमें अप्लाई कर दीजिए. पूरे विवरण के साथ, अंग्रेजी में
प्रकाशित लेखों के विशेष विवरण के साथ. 3. बीए और एमए में आपने अपना नंबर प्रतिशत
नहीं लिखा था, यह वर्मा जी को चाहिए.
तो यह स्थिति है. पर आपने इस संबंध में जो अपने मन की विकल निराशा और हताशा व्यक्त
की उसने मुझे बहुत पीड़ित किया. बंधु, आप इस बारे में लिखकर मुझे परेशानी में डाल
रहे हैं, यह ख़याल आपके मन में कैसे आया ? वर्माजी के साथ मेरे संबंध ऐसे आत्मीय
नहीं हैं कि उनकी तरफ से मिली आपकी निराशा मुझसे वर्मा जी और अपने संबंध में कोई
एबेरेस्मेंट पैदा करे. आपका दुख मैं ज्यादा अपना करके समझ सकता हूँ और उसी के सामने
मेरी कोई जवाबदेही भी है. आपके मसले को ले कर बार-बार वर्माजी के पास जाने में न तो
मुझे कोई एम्बैरेस्मेंट है न उनके साथ संबंध में किसी खिंचाव की आशंका, न कोई अपनी
परेशानी.
ठीक है, वर्माजी ठीकठाक आदमी हैं, मेरे लिए उनके दिल में आदर जैसी कोई चीज है. पर
इससे ज्यादा कुछ नहीं. उनके जिन्दगी के मोमेन्ट्स कोई और है, मेरे कोई और. अलग अलग,
अभी तक. वे मेरे लिए अभी तक एक अमूर्त व्यक्ति ही हैं, क्योंकि उनके सिवाय कुछ
खयालातों के, किसी अन्तरंग पहलू से मैं वाकिफ नहीं. अतः सच मैं उन्हें ठीक से नहीं
जानता. आपके बारे में उन्होंने ही पहल की थी. आपके लेखों की चर्चा अक्सर हुई. और
उसी का अंजाम है कि वे आपमें इतनी ‘रूचि’रखने लगे कि यहाँ आपको लाने की सोचें. अब
इस ‘रूचि’में ठोस वास्तविकता कितनी है, कितना कुछ उनके बूते का है, कितना कुछ वह कर
सकते हैं, इसका मुझको कुछ अंदाजा नहीं. इसीलिए कहा न मैंने कि वे मेरे लिए एक
अमूर्त साफ-सुथरे समझदार भद्र लोक हैं.
अतः मित्र, आप यह कभी ख्याल में न लाएं कि आपके इस इतने अहम मसले को लेकर वर्माजी
के तई किसी अप्रिय जवाबदेह से ग्रस्त हो सकता हूं. कहा तो आपने भी नहीं, पर आपके मन
में बात यही शायद घुमड़ रही हो.
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पर क्या यह सब मेरी कल्पना है ? अब देखिए, आपका पत्र जिस वक्त आया मैं भी ‘ ब्रदर्स
कारमाजोव ’ पढ रहा था. उसे पढने की तात्कालिक प्रेरणा आपके इसके पहले वाले खत ने ही
दी थी (इसमें ज्योत्स्नाजी का भी कुछ श्रेय है) और मैंने उसे पढना जो शुरू किया तो
वह सिलसिला अभी तक चल ही रहा है. लगता है ‘ब्रदर्स कारमाजोव ’ जैसी कृति एक बार पढ
कर कभी खत्म नहीं की जा सकती. या शायद पढकर कभी भी खत्म नहीं की जा सकती, उसके पढने
का सिलसिला हमेशा जारी रहता है. एक बात शायद आपने और नोट की हो, यह आदमी को कितना
मुलायम कर देता है, सॉफ़्ट, कोमल, संवेदनशील. भावनाएं किस कदर नर्म हो जाती हैं. और
ऐसे होना कोई आश्चर्य भी नहीं. ‘ ब्रदर्स कारमाजोव ’ के खूंख्वार, हत्यारे, शराबी,
अर्द्धपागल, सनकी सब कितने कोमल हैं, भीतर से कितने नर्म – अपने तमाम रिटेरिक के
बावजूद, अपनी तमाम भावनात्मक जोशखरोशी, आक्रामकता के बावजूद. सब कितने वल्नेरेबल
हैं. आपने सही लिखा था, इससे बढकर ह्यूमन चरित्र कहीं नहीं मिलेंगे. दरअसल आपके इस
वाक्य ने ही मुझे यह उपन्यास पढ़ने को विवश कर दिया.
इसी संदर्भ में आपके इस पत्र की एक बात याद आ गयी और मैं चाहता हूं कि आप अपने पत्र
में इसका खुलासा करें. आपने लिखा है कि दॉस्तॉएवस्की मार्क्सवाद का प्रत्याख्यान है
और ईवान भावी रूस का प्रोफेट (कुछ इसी तरह के शब्द हैं). आपकी यह दो स्थापनाएं मुझे
बड़ी सारगर्भित लगती हैं, और रहस्यात्मक भी. कृपया इसे स्पष्ट करें. ‘ ब्रदर्स
कारमाजोव ’ को पढते समय आपके ये दो सूत्र बराबर मेरे मन में चल रहे हैं, पर इनका
अर्थ नहीं खुल रहा है. करीब 600 पेज पढ चुका हूँ. कल परसों तक तक बाकी खत्म कर
दूंगा.
दॉस्तॉएवस्की और टाल्सटाय वाला प्रश्न मैंने आपको उकसाने के लिए पूछा था. दोनों की
जो तुलना आपने की है वह बहुत सही है.
यह सब पढते पढते आपकी आंखें बेजार हो चुकी होंगी. आप प्रतीक्षा कर रहे होंगे मैं
आपके महानिबंध पर कब कुछ कहूँगा. बंधु, उस लेख के बारे में विस्तृत लिखने लायक
क्षमता का इस वक्त अभाव पा रहा हूं. बस उसे पढकर ऐसा लगा था कि चिंतन का इतना
विस्तार-कई शताब्दियों की संस्कृति का इतिहास जैसा – और इतनी गहराई आपने एक निबंध
में जो भर दी उसकी प्रक्रिया कितनी लम्बी, एकान्त, एकाग्र और चुनौतीपूर्ण रही होगी
और आपने कैसे उसे धारण किया होगा. लेख पहली बार पढते समय मैंने कुछ प्वाइंट्स मन
में नोट किए थे, उन्हें लिखने की सोचा था, पर रह गया. आज दुबारा लेख पढने की कोशिश
की, लेकिन पहले पत्र लिख डालूं क्योंकि लेख पढने में आज इतवार का पूरा दिन निकल
जाएगा. और आपको पत्र डाल देना आज बेहद जरूरी है – वैसे ही काफी देर हो चुकी है. तो
वे प्वाइंट्स दुबारा ताजा नहीं हो सके. बस इस संदर्भ में एक बहुत अस्पष्ट सा विचार
मन में अब भी बना हुआ है कि आपने जितना बड़ा फलक लिया है वह शायद आवश्यकता से थोड़ा
ज्यादा बड़ा हो गया है. उस फलक को ठोस बनाने में तथ्य पूरी तरह नहीं जुट पाए हैं.
इसी से बाद में चलकर लेख की कई महत्वपूर्ण स्थापनाएं (और मौलिक स्थापनाएं) प्रबलरूप
से पुष्ट नहीं लगतीं. बस, इतना ही वह विचार है. इसके बारे में कुछ विस्तार से लेख
दुबारा-तिबारा पढने पर ही लिख सकूंगा. पर हाँ, जिस मुद्दे से आपने बात शुरू की,
जितनी दूर तक अपनी खोजपूर्ण दृष्टि फेंकी, जितना श्रमसाध्य यह सब था, उसे देखकर
चित्त बहुत प्रसन्न हुआ. पढकर सचमुच और सच्ची खुराक पाने का सुख मिला. ऐसी खुराक
बार बार पाने की भूख पैदा हुई. और इसके लिए आपकी दाद देता हूँ.
बंधु, अन्ततः आवेग वालों ने मेरी कविता पर आपकी और एक किन्हीं प्रसन्नकुमार मिश्र
की टिप्पणियाँ भेजी और मैंने उन पर अपनी टिप्पणी भी लिख कर भेज दी. आपकी टिप्पणी इस
बार पढकर कुछ दूसरे ही प्रकार का अनुभव हुआ. कुछ यह पहले से कटी-छंटी भी लगी,
ज्यादा चुस्त. बात के मर्म तक आप पहुंच सके हैं. आपको यह गलतफहमी हुई कि मैं उससे
संकोच में पड़ गया — शायद संकोच कुछ है, पर उस तरह का नहीं. मतलब आपके असामर्थ्य की
तरफ से नहीं, इससे समर्थ समीक्षा भला कोई क्या लिखेगा. मैं इस संकोच को ठीक से
व्याख्यायित नहीं कर पा रहा हूँ. शायद वह इस वजह से हो कि मैं इतना डिजर्व नहीं
करता. आप शायद मुझे जरूरत से ज्यादा अहमियत दे गए. और शायद इसी तरह आप मुझमें यह
कसक भरी चाह पैदा कर गए कि काश मैं सचमुच इतनी समर्थ कविता कर सकता. आपकी यह
टिप्पणी पढकर कुछ विचित्र-सी कैफियत हुई. मैंने उस पर जो लिखा है उसका सार-संक्षेप
देते नहीं बन रहा है. लेकिन मेरे मूल-स्वर को आप पहचान लेंगे इतना मुझे विश्वास है.
अशोक जी के दो पत्र इधर मुझे मिले थे. मेरी कविता पर वे ‘पहचान’ में लिख रहे हैं,
खुशी की बात है. पहचान-3 के लिए वे मुझसे 64 पृष्ठों की नई पुरानी आलोचनात्मक
सामग्री चाहते हैं. क्या ख्याल है आपका? तृप्तिभर पानी के बजाय क्या यही दो-दो बूंद
पानी हम लोगों के नसीब में है? आपसे भी उन्होंने यह प्रस्ताव किया है. ऐसा उन्होंने
लिखा था. अशोक जी की नीयत बड़ी साफ है और इस तरह के नये विचार और योजनाएं उनके दिमाग
में आते रहते हैं यह सचमुच बड़ा उत्साहवर्द्धक लगता है. पर अपने आलोचनात्मक कृतित्व
की शुरूआत को 64 पृष्ठों की कोठरी में घुसेड़ने को जी नहीं करता. यह मन की बात है.
वैसे ख्याल कोई बुरा नहीं. अपनी राय लिखें.
नामवरजी से एक दिन अनायास ही मुलाकात हो गयी थी. गर्दन पर मांस चढ़ आया है, काफी
हृष्ट-पुष्ट दीखने लगे हैं साथ ही ठस भी. यह एक इम्प्रेशन है, कोई टिप्पणी नहीं.
अच्छा बंधु, ‘कल्पना’क्या बंद हो गयी? इधर अरसे से दिखायी नहीं दी. आप अब सुस्थिर
होंगे. मैदान तो इस वक्त जल रहे हैं. पहाड़ पर सुशीतल पवन का आनंद लेते हुए आजकल किस
चिन्तन-कर्म में लगे हैं. तबियत की खिन्नता और उदासी दूर हुई कि नहीं. यहाँ तो लगता
है सूर्यदेव तीन साल की गर्मी का इकट्ठा ब्याज समेत वसूल करने पर तुले हैं.
ज्योत्स्ना जी को नमस्कार कहें. पत्र लिखें-पहाड़ की ठंडी हवा की तरह मैदान में जलते
इस तन-मन को जिलाएं.
सस्नेह आपका
मलयज
25.11.2008,
01.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित