पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > रंग अभी गीले हैं Print | Send to Friend 

पुस्तक अंश | मलयज | रंग अभी गीले हैं

पुस्तक अंश

 

रंग अभी गीले हैं

मलयज के पत्र

 

ramesh chandra shaha-malyaj

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सुप्रसिद्ध साहित्यकार मलयज द्वारा रमेशचंद्र शाह को लिखे गये पत्रों का संग्रह

प्रकाशकः सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरु मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर

suryaprakashan@gmail.com

मूल्यः तीन सौ रुपये

 

 

 


दिल्ली
09-1-72

भाई शाह साब,

आपका बड़ी एकात्म उदास-विह्‌वलता से भरा वह कार्ड मुझे मिला था. तत्काल उसका उत्तर मैं न दे सका. जिस गहरी अनासक्त पीड़ा से उद्भूत वे शब्द थे उसका जवाब मैं किन शब्दों से देता. बस महसूस करके रह गया. इस चुप रह जाने में आपके प्रति अन्याय तो मैंने जरूर किया, इस अन्याय के प्रति अपने को धिक्कारता भी रहा. पर गहराई का जवाब कम गहराई या उथली गहराई से देना अपने प्रति भी अन्याय करना होता. फिर सोचा कि आपकी वर्तमान मनःस्थिति में शायद शब्द से अधिक सार्थ वर्ण की रेखाएं हों. अतः इस वर्ष का एक कार्ड भेजा. पिछले बार वाला आपको बड़ा पसंद आया था न…

परसों से बुखार में पड़ा हूँ. अभी भी उससे मुक्त नहीं हूँ. दो दिन की छुट्टी और लेनी पड़ेगी. आजकल दिल्ली में शीतलहर चल रही है. मुझ जैसे नाचीज का धराशायी हो जाना क्या मुश्किल. आज तबियत को थोड़ी राहत है, ऐसे में बिस्तर पर पड़े पड़े आपको खत लिखने में काँपती उंगलियों के बावजूद एक अजब तरह का आनन्द आ रहा है. आपको शायद पता नहीं रानीखेत की अपनी बहुत सी डायरियाँ मैंने बुखार में तपते हुए ही लिखी हैं. इस वक्त आपको खत लिखते समय रानीखेत की उस छोटी सी मोटी-मोटी सलाखोंदार छोटी-सी कोठरी का चित्र मेरी आँखों के आगे उभर आया है. रात का वक़्त है. कोठरी से लगे पोस्टआफिस में देर तक रूक कर काम करने वाले दो चार पहाड़ी बाबुओं की आवाजें आ रही हैं. सलाखों के सामने देवदार के पेड़ों का एक झुंड है, थोड़ा ऊंचाई पर. उसके दूसरी तरफ नीचे बाजार को रास्ता घूमता हुआ चला जाता है. कोठरी में मिट्टी के तेल की कुप्पी जल रही है. एक चारपाई भर डाल सकने वाली उस छोटी सी कोठरी में उस कुप्पी की रोशनी में तकिए पर डायरी रखे मैं कुछ लिख रहा हूँ. बाहर की साँय साँय - हवा की, कहीं टिड्डियों की....जैसे अनस्तित्व मूर्तिमान हो उठा हो, और सिर्फ वह तेल की कुप्पी ही अस्तित्व का चिन्ह हो, मैं भी नहीं, डायरी भी नहीं, सिर्फ वह तेल की कुप्पी.... मेरी उस तेल की कुप्पी का खर्च एक आना रोज का था, रोज शाम को जा कर मोदी की दुकान से भरवा लाता था. करीब करीब रात भर ही जलती रहती थी.

इसी कुप्पी की रोशनी में मैने रामचरितमानस के आदि से अंत तक कई बार पाठ किए होंगे. वहां किताबें ही क्या मिलती जो पढता. मानस का उतना मनोयोगपूर्ण एकाग्र पाठ कभी न कर सका. उस दर्मियान कविताएं भी खूब लिखीं.

लेकिन मैं जरूरत से ज्यादा बहकता जा रहा हूँ. मेरे जीवन के अविस्मरणीय प्रसंगों में रेलवे स्टेशन और प्लेटफार्म बहुत निजी प्रसंगो की श्रृंखला लिए हुए है. क्या इंसान नौस्टेल्जिया के बिना भी रह सकता है ? मेरा ख्याल है बिना नौस्टेल्जिया के जीवन बड़ा फीका और अधूरा होगा. मेरे दिमाग में कई जगहों के कई रेलवे स्टेशन और उनके प्लेटफार्म हमेशा के लिए अंकित हो गए हैं. आपके साथ इस बार प्लेटफार्म पर बिताए गए कुछ घंटे भी एक ताजे चित्र के समान है. उन्हें अभी छुऊंगा नहीं, क्योंकि रंग अभी गीले हैं.

हमारे एक मित्र हैं, इस वक्त जापान में हैं, उन्हें पुरानी क्रिस्तानी सिमिट्रियों से बड़ा लगाव था. इलाहाबाद में रसूलाबाद तरफ और मैक्फर्सन लेक की तरफ ऐसी कई सिमिट्रियाँ थी. वे कभी-कभी साइकिल पर बिठाकर हमें वहां ले जाया करते थे. लगता था कि शुरू विक्टोरियन युग में चले आए हैं, या कि क्रिस्टिना रोजेटी के जमाने में. मसूरी के कैमल्ज़ बैक रोड वाली सिमिट्री भी मेरे दिमाग पर बहुत दिन तक छायी रही. लगता है कि बहुत सी अंग्रेजी कविताओं को तब तक महसूस नहीं किया जा सकता जब तक आप किसी पुरानी सिमिट्री को महसूस न कर लें.

इस वक्त मुझे बहुत कुछ याद आ रहा है. याद करना जैसे इस वक्त अपने को मुक्त करना है. किससे ?

कल तक यहीं तक लिख सका था. लगता है जितनी जल्दी यह पत्र आप तक भेजना चाहता हूं उतनी जल्दी नहीं पहुंच पाएगा. कल रात से बुखार फिर चढ गया है. अभी दवा से एक गहरी नींद लेने के बाद उठा हूँ. तबियत हल्की लग रही है. और मेरा यह पत्र भी एक डायरी का सा ही रूप लेता जा रहा है.

आपकी पन्ना में जैसे संपर्क-शून्य सी स्थिति रहती है, उससे मेरी स्थिति कोई ज्यादा बेहतर नहीं है. कहने को यहां क्या नहीं है, पर देखो तो कुछ भी नहीं. मैं भी गीताप्रेस वाली उपनिषद ले आया हूँ और धीरे धीरे पढ़ता हूँ. जिस मनोयोग से आपको पतंजलि का योग दर्शन पढते-गुनते देखा था उतना तो मेरे बूते का नहीं. पर जब तबियत कुछ गंभीर खोजती है तब उसे ही उठाता हूं.

मैंने वह येट्स वाला अनुवाद बहुत ढूंढा. मिला नहीं.

इधर कुछ खास पढने को न मिल रहा है न सूझ रहा है. साहित्यिक चिन्ताओं से ज्यादा कुछ घरेलू भौतिक चिंताएं चित्त को घेरे हुए हैं. इस बार का जाड़ा बड़ा अनप्रॉड्क्टिव रहा …न तो कोई लेख, न कविता ही. आप लिख लिख कर पछताते हैं. मैं न लिख पाने से पछताता हूं.

कविता संग्रह की कुछ प्रतियां पत्नी इलाहाबाद से लायी थीं. स्थानीय कुछ लोगों को दी है. बाहर समीक्षा के लिए भी खुद ही पैकेट बना बना कर भेजना है. यह समय साध्य और व्यय साध्य दोनों ही है, अतः अभी कुछ कर न सका. सर्वेश्वर जी को एक कापी दी थी,वे चुपके हो लिए हैं. दिनमान में कुछ खबर ही नहीं.

शमशेरजी से कुछ सप्ताह पहले मुलाकात हुई. वे अभी हाल ही में अपने भाई के पास से लौटे हैं पूरी तरह से आराम करके. अब चूंकि शमशेरजी इतनी दूर चले गए हैं कि उनसे अक्सर मुलाकात नहीं हो पाती. अच्छे हैं, हालांकि पहले जैसे ही दुबले हो कर लौटे हैं.
आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Ratan Jain (marwaridigest@gmail.com) Parihara( Raj.)

 
 पत्र लेखन एक शानदार विधा है जिसका उपयोग कम लोग ही कर पाते हैं. प्रस्तुत पत्र ऐसा एक नमूना है जिसमें असली जीवन राग ध्वनित हो रहा है.  
   
 

Darpan Sah (darpansah@yahoo.com) Almora

 
 आपके साथ इस बार प्लेटफार्म पर बिताए गए कुछ घंटे भी एक ताजे चित्र के समान है. उन्हें अभी छुऊंगा नहीं, क्योंकि रंग अभी गीले हैं..... वाह ! वाह !! 
   
 

अनिरुद्ध कुमार (aniruddhajnu@hotmail.com) पटना, बिहार

 
 बहुत बढ़िया। पत्र साहित्य में वो कुछ मिलता है जो व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों एक साथ होता है। मलयज मुक्तिबोध, निराला, प्रेमचंद के पत्र उनके समय का इतिहास हैं। कृप्या इन्हें भी सामने लाने की कोशिश करें। 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in