पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
 पहला पन्ना > दूर देखती आंख Print | Send to Friend 

रविवार | Raviwar | दूर देखती आंखें | रमेशचन्द्र शाह

पुस्तक अंश

 

दूर देखती आंखें

विश्व कविता से एक चयन

 

दूर देखती आंखें

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादः रमेशचंद्र शाह

प्रकाशकः सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरु मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर

suryaprakashan@gmail.com

मूल्यः एक सौ पच्चीस रुपये

 

 

 

स्तेफान स्पेन्डर
ब्रिटिश

चौक के ऊपर वाला कमरा
लगता था अनन्त प्रकाश इस खिड़की का
रहते थे जब तुम यहां, मेरे लिए
छिपती थी पेड़ों के ऊपर वह पत्तों के झुरमुट से
मेरे भरोसे की तरह

अस्त हो गया है प्रकाश वह और हो चुके हो तुम भी कब के
ओझल एक खड्ग के उजले प्रायद्वीपों में
चिथड़े-चिथड़े हो चुकी है शान्ति समूचे यूरोप में
जो बहती थी हमारे आर-पार कभी

चढ़ता हूं अकेला अब मैं सीढ़ियां इस ऊंचे कमरे की
अंधेरे चौक के ऊपर
जहां पत्थर और जड़ों के बीच है कोई अन्य
अक्षत प्रेमीजन



अपनी बेटी के लिए
टहल रहे हम साथ आज ; मैं, मेरी बिटिया
कितनी उजली पकड़ हाथ की उस के पूरे
मेरी इस उंगली पर
आजीवन आलोक-वलय यह
इस हड्डी के गिर्द करुंगा अनुभव मैं, जब
हो जाएगी बड़ी- आज से दूर, कि जैसे
दूर देखती आंखें उस की अभी, आज ही

 

 

अनहोना
कभी नहीं होता, पर होने की कगार पर सदा टंगा-सा,
मेरा सिर-मत्यु का मुखैटा, लाया जाता है प्रकाश में.
छाया पड़ती आर-पार गाल के और मैं, होंठ हिलाता हूं छूने को ;
लेकिन मेरी पहुंच महज छूने तक ही सीमित रह जाती,
भले आत्मा कितना ही बाहर निकाल कर गरदन झांके.
निरख रहीं हों वे गुलाब, सोना, आंखें या दृश्य भला सा
ये मेरी इंद्रियां आंकती क्रिया चाहने भर की ;
होने की कामना दृश्य, सोना, गुलाब, दूसरा व्यक्ति वह.
“ करता हूं मैं प्यार ”- एक बस इसी तथ्य पर
दावा मेरा पूर्णकाम बनने का टिका हुआ है.

आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

banshilalverma (vermabanshi@yahoo.in) ghaziabad

 
 कविताएं सारगर्भित तथा दार्शनिक हैं. मेरा सिर-मत्यु का मुखैटा, यथार्थ - दार्शनिक प्रतीक है. कुछ और कविताएं होती तो अच्छा होता. 
   
 

ravi (dablu1987@gmail.com) bhopal

 
 बहुत मार्मिक कविता है. काफी अच्छी संवेदना नज़र आती है. 
   
 

vidhu bhopal

 
 कविताएं नीले आसमान में ले जाती है-शब्दों की मुखरता,एक ख़ुशी का आभास देती है...शब्दों से जूझते भाव एक निराशा/उबासी से निकला उल्लासित सुख रचते हैं. चौक के ऊपर वाला कमरा ,अपनी बेटी के लिए,खुले मैदानों में...कुछ चेहरे ज्यादा साफ हो आते हें ...आदि कवितायें अपूर्व निजता गढ़ती हैं, एक सुझाव है यदि लेखक का संक्षिप्त परिचय देगें तो कविताओं के अनुवाद की सार्थकता होगी.  
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in