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पुस्तक अंश | कला बाज़ार | अभिज्ञात

पुस्तक अंश

 

कला बाज़ार

उपन्यास

 

कला बाज़ार | अभिज्ञात

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अभिज्ञात

प्रकाशकः आकाशगंगा प्रकाशन, 4760-61, 23 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली 110 002

मूल्यः एक सौ पचास रुपये

 


कत्याल की तल्ख़ दुनिया में मैं


यह स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं कि कत्याल ने भी मेरी इस बेचैन यात्रा में अपनी भूमिका निभाई है. उसकी मां ने उसे बचपन से ही एक अजीब ढंग के माहौल में पाला था. तीन दशक पहले जालंधर से कनाडा जाकर बसे अपने पिता के पास रहकर कत्याल की मां महिंदर ने पढ़ाई की थी. शादी अमृतसर में एक परंपरागत सिख परिवार में कर दी गयी थी. उन्हें जिस तरह की आज़ादी चाहिए थी वह उन्हें नहीं मिली थी. वे शादी के बाद भी जिंस पहनना चाहतीं थीं. कभी-कभार जीन और बीयर का भी उन्हें शौक था. पीने का शौक तो उनकी मजबूरी बन गयी क्योंकि घर में हर शाम शराब की बोतल खुल जाती थी. वह अपने टूटे हुए दिल को तसल्ली देने के लिए पति के साथ जाम टकराने लगी थी. महिंदर ख़ुद अपनी पहचान बनाना चाहती थीं. उन्हें ख़ुद को अपने पति के नाम से पहचाने जाने से नफरत थी, लेकिन पिता की इच्छा थी कि उनकी बेटी अपनी परम्परा से जुड़ी रहे, क्योंकि मोहिंदर की मां ने कनाडा के रंग में खुद को इस कदर रंग लिया था कि उन्हें तलाक दे दिया था. मोहिंदर की मां के नये पति ने मोहिंदर को अपने पास रखने से इनकार कर दिया था. महिंदर अपने पिता के अरमानों पर पानी फेरना नहीं चाहती थी. दूसरे उसे अपने रूप के जादू पर गुमान था. उसका ख़याल था कि वह उसी के बूते अपने भारतीय सरदार पति को मना लेगी और वे मनचाही ज़िन्दगी जी सकेंगे. वह इसमें बुरी तरह नाक़ामयाब रहीं. उन्होंने विद्रोह के नाम पर यही किया कि अपनी बेटी को आधुनिक बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.

अमृतसर में रहने वाले ज्यादातर सिख परिवारों के लोग कनाडा आदि में रह कर वहां अपना रोजगार कर रहे हैं, जिसका असर यहां भी देखने को मिल रहा था. एक ओर यहां के युवा मानसिक तौर पर पंजाबी संस्कारों में पल रहे थे वहीं कनाडा की चकाचौंध वाली संस्कृति का भी असर उन पर है. वहां से लौटने वालों से वे दिखावे आदि में प्रतियोगिता करते दिखाई दे जाएंगे. कत्याल को उसकी मां ने केवल बाहरी नहीं बल्कि मानसिक तौर पर कम उम्र में ही आज़ाद कर दिया था. महिंदर ने बेटी को पिता की छाया से बचाने के लिए कोलकाता एक रिश्तेदार के यहां रहकर उसके पढ़ने का इंतजाम करवा दिया था. यह भी संयोग ही कहा जायेगा कि कत्याल जब कोलकाता से संगीत में एमए की पढ़ाई पूरी कर अमृतसर लौटने को थी कि पिता की एक कार दुर्घटना में मृत्यु हो गयी. कत्याल ने मां को ध्यान में रखते हुए अमृतसर में ही रहने का मन बना लिया. यहीं एक कॉलेज में वह संगीत की प्राध्यापिक हो गयी.

अमृतसर का जीवन उसका अपना जीवन नहीं था. वह जीवन था जो उसकी मां जीना चाहती थी. बेटी की देह में उसकी मां की आत्मा थी. वे अपनी कामनाएं उसी से पूरी कर रही थीं. वे अजब-अजब तरह के फ़ैशन वाले हेयर स्टाइल की पत्रिकाएं ले आतीं. फिर कत्याल को ब्यूटीपार्लर में जाकर वैसे ही बाल कटवाने पड़ते थे. वे देश-विदेश से आधुनिक फैशन के पहनावे उसके लिए जिससे-तिससे मंगवातीं रहतीं. कई बार उसे बेहद छोटे व तंग कपड़ों में घर में रहना पड़ता. जब भी वह कपड़े बदलती वे बराबर अपनी नज़रें उस पर गडाए रखतीं. वे चाहती थीं कि कत्याल का कुछ भी उससे छुपा न रहे. वह उसके मन के कोने में भी झांकने की कोशिश करती. हर बात कुरेद-कुरेद कर पूछतीं. उनके पास इतना धैर्य और उत्सुकता थी कि हर बात को वे बग़ैर विस्तार के जाने चैन से नहीं रह सकती थीं. कई बार तो एक ही घटना के बारे में तक पूछतीं जब तक संतोष न हो जाये. जैसे वे सुनकर ही उन क्षणों को जी लेने की कोशिश करतीं जिन्हें उनकी बेटी ने जिया हो. भरसक वे कोशिश करतीं कि वे अपनी बेटी के साथ साये सी लगी रहें. ऐसा नहीं कि वे उसे किसी काम में बाधा बनने की कोशिश करती हों. नहीं.

यही उनकी ख़ूबी थी जिस पर कत्याल मन ही मन रीझती और महसूस करती कि वे अपनी बेटी को बहुत ज़्यादा चाहतीं हैं लेकिन वे एक मानसिक रोग का शिकार हैं. उसने कोशिश भी की कि मां इसे समझे कि उसे एक ख़ास तरह की मानसिक बीमारी है और वह इस बारे में किसी डॉक्टर की राय ले. इस बात को उन्होंने कतई तूल नहीं दिया. वह जबरन अपनी मां को किसी डॉक्टर को दिखा कर उसे मानसिक सदमा नहीं पहुंचाना चाहती थी क्योंकि वह जानती थी कि उसके पापा के साथ उसकी मां की ज़िन्दगी खुशहाल नहीं गुजरी है. उसके पापा के गुजर जाने से उसकी मां कतई दुखी नहीं थी.


यह जरूर आभास दिया था कि दुर्घटना होनी ही थी तो और पहले क्यों नहीं हुई. उनकी इस प्रतिक्रिया से वह भीतर ही भीतर दहल गयी थी. कई बार तो उसे लगता की वह मां की ममता की खिल्ली उड़ाने में लगी है क्योंकि उसने उसकी हरेक ख़्वाइश पूरी की है. मां ने उससे बढ़कर यह किया कि उसकी अपनी ख़्वाइशों के लिए उसके जीवन में जगह ही नहीं बनने दी. मां सोचती थी कि बेटी वह सोचे जो वह सोचती है. वह चाहे जो वह चाहती है. मां ने हमेशा की कोशिश की कि वह उसकी सखी बने, उसकी हमराज़ बने. कोलकाता रहने के दौरान जब भी वह घर लौटी तो मां उसके साथ उसी तरह सोती थी जैसे की उसके बचपन में. उस समय उसे लगता था कि चूंकि वह उससे दूर रहती है इसलिए उसकी निकटता चाहती है लेकिन जब वह अमृतसर में रहने लगी थी तब भी उसकी मां ने यह क्रम जारी रखा. उसने कुछेक बार कहा कि वह अकेले सोना चाहती है लेकिन मां का मायूस चेहरा देख उसने अपनी बात वापस ले ली. मां न सिर्फ उसके साथ सोती बल्कि उससे एकदम लिपट कर सोती. जैसे वह अब भी एकदम छोटी बच्ची हो. कभी-कभी तो वह उसके सीने पर सिर रखकर उसके हृदय की धड़कन तक सुनने की कोशिश करती. कई बार तो नींद में उसे यह भी आभास हुआ कि वह उसके ज़िस्म को सहला रही है.


उसे यह भी अजीब लगता था कि मां उसकी उपस्थिति में कपड़े बदलते समय उसे पूरी तरह से अनदेखा कर देती और कई बार तो वह अपने पूरे कपड़े उतार कर कोई खास सूट आलमारी से ढूंढने लग पड़ती. उसे अजीब ज़रूर लगता लेकिन यह बात ज़रूर मन में उठती कि उसकी मां का फीगर देखने के बाद कोई उसकी उम्र का अनुमान नहीं लगा सकता. वह उसकी बहन ही लगेगी. यह सब मुझे कत्याल ने विस्तार से बताया था बिना यह सोचे कि कौन सी बात मुझे बतानी चाहिए थी और कौन सी नहीं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

raish ahmad lali (raishlali@yahoo.co.in) delhi

 
 अभिज्ञात जी की लेखनी में वाकई दम है.परिस्थितियों का भावपूर्ण चित्रण उनकी विशेषता है. प्रस्तुत उपन्यास में भी महिलाओं के मुद्दे को जिस तरीके से पेश किया है, वो लाजवाब है. 
   
 

सुरेन्द्र प्रसाद (prasadsurendra906@gmail.com) खड़गपुर

 
 अभिज्ञात जी की रचनाओं का पहले ही मुरीद रहा हूं अब इस उपन्यास खंड को पढ़ने के बाद उनके प्रति आदर और बढ़ गया है। पिछले दिनों हंस में उनकी कामरेड और चूहे कहानी पढ़ी थी। उनकी किस्सागोई का एक और रूप सामने आया। देश के विभाजन के समय का पंजाब और विभाजन से स्त्रियों की हुई दुर्गति को समझने के लिहाज से यह उपन्यास महत्त्वपूर्ण है। 
   
 

PAWAN KUAMR SHARMA (tdc@jla.vsnl.net.in) JALANDHAR.

 
 लेखक ने नारी शोषण के मुद्दे को बहुत संवेदना से प्रस्तुत किया है. पुरुष प्रधान समाज में इस तरह का होना कोई नई बात नहीं है.परंतु अभ परिवर्तन आरंभ हो गया है, ये शुभ संकेत है. इस तरह की रचनाओं का प्रकाशन होना निश्चित रुप से सकारात्मक दृष्टिकोण है. इस प्रयास के लिये लेखक बधाई का पात्र है. 
   

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