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मानुष

पुस्तक अंश

 

मानुष

हकु शाह

वार्तालेखः पीयूष दईया

 

मानुष

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.

1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग

नई दिल्ली 110 002

मूल्यः तीन सौ पचास रुपये

 

 

आभळा-आतम

गुजरात में सूरत ज़िले के एक गांव वालोड़ में मेरा जन्म हुआ था. गांव के नज़दीक ही वेडछी आश्रम है. यह लगभग सारा क्षेत्र ही आदि-वासियों का है और बारडोली के बहुत क़रीब होने की वजह से महात्मा गांधी और सरदार पटेल जैसी राष्ट्रीय हस्तियों के चिन्तन व कर्म का गहरा असर इस क्षेत्र पर रहा है. मेरे गांव में मुख्यतः तीन जातियों के लोग हैं–देसाई, वणिक व काज़ी. इनमें से ज़्यादातर ज़मींदार है और मेरे पिता इनमें से एक थे. ज़मींदारों का जीवन जनजातीय समुदायों के शोषण पर आधारित था लेकिन मेरे पिता बहुत दूर तक इसके एक अपवाद थे. मेरे पिता को प्रकृति से गहरा प्रेम था और नदी किनारे बैठना उन्हें बेहद पसंद था या वे खेत-खलिहानों की ओर सैर करते थे. सभी लोग उन्हें बादशाह कहते थे. हालांकि दुनिया की नज़रों में वे कोई बहुत व्यावहारिक व्यक्ति नहीं थे. अलस्सुबह दो या तीन बजे आप उन्हें गीता पढ़ते या दोपहर में अपने किसी मुस्लिम दोस्त के घर की आराम-कुर्सी पर नींद लेते देख-पा सकते थे. कभी कभी, आधीरात के क़रीब उन्हें खोजते हुए नदी-तट की रेत पर जब एक सफ़ेद कपड़ा फरफराता दिखता तो आप यह समझ जाते थे कि वहां जो सोये हैं वह बादशाह हैं, ध्यानस्थ. आदि-वासियों को वे अपना दोस्त मानते थे और उन्हीं के साथ चाय बनाते, खिचड़ी पकाते, वहीं खाते-सोते, उठते-बैठते. दशहरे के दिन गांव में जो कोई भी दाखिल होता तो उसे मेरे दादा एक पैसा भी देते थे. हमारे पास लगभग सौ एकड़ भूमि थी लेकिन मेरे पिता की मृत्यु के समय हमारे पास ज़मीन का एक छोटा टुकड़ा तक नहीं बचा था.

मेरी मां एक समृद्ध परिवार से थी. बहुत व्यावहारिक व प्रतिभाशाली. बारडोली सत्याग्रह के दौरान (यह अंग्रेज सरकार को कर न देने का आन्दोलन था) वे सारा दिन तो अपने घर में बन्द रहतीं लेकिन अंधेरा होने पर बाहर आ जातीं क्योंकि सरकारी कारिंदे अंधेरा होने के बाद मकान में नहीं आ सकते थे. रात में घर के दरवाजे खोलने के बाद मेरी मां दो काम करती थी: कुएं से पानी लाती और गरबा नृत्य करने में रमती, जिसे देखने फिर सारा गांव जमा हो जाता.

क़रीब आठ बरस का रहा होऊंगा जब मैंने अपने दो-तीन दोस्तों के साथ शिशु नामक एक पत्रिका निकाली जिसमें मेरी भी कुछ कविताएं शामिल थीं. कुछ खास मौक़ों पर मेरी कविताओं के लिए उपयुक्त शब्द खोजने में मेरी मां मदद करती थी. मेरी एक बहन नीरू बहुत अच्छा गाती थी, रसोई घर में काम करते-करते भी. दूसरी बहन भद्र लोगों के बीच भी गाती थी. मेरी तीसरी बहन दक्षा भी वही वनस्थली, सूरत में जनजातीय विद्यार्थियों को पढ़ाती रही. मेरे भाई बाबूभाई और भाभी तरला ने अपने जीवन का ज़्यादातर समय जनजातीय समुदाय में पढ़ाते हुए ही बिताया है और उनके दोनों बच्चे–उर्विन व स्वाति–वहीं आदि-वासी बच्चों संग ही पढ़े हैं.

हमारे विद्यार्थी मंडल– जिसका कि मैं एक सक्रिय सदस्य था – की गतिविधियां भी दिलचस्प थी हालांकि आज के सन्दर्भ में हो सकता है वे बेमेल जान पड़े. हम सारे गांव को यह कविता गाते हुए जगाते थे :
जागो जागो जन जुवो/देखो
रात गयी ने भोर भयी

यह नहीं मालूम कि हमारी इन पंक्तियों को गाने से किसी तरह की राष्ट्रवादी भावनाओं का संचार होता था या नहीं लेकिन इतना ज़रूर है कि यह गांववालों को अपने बिस्तरों से ज़रूर उठा देता था ! वालोड में अपने स्कूल के आरम्भिक दिनों से ही चित्रांकन में मेरी रूचि थी. गांधी जी और सुभाष चन्द्र बोस प्रभृति नेताओं के छायाचित्रों को हूबहू बनाने की कोशिश करता था और सारी जगह रेखा-चित्र बनाता रहता था. हमारे कला शिक्षक, चिन्तामणि देसाई एक जिंदादिल व्यक्ति थे. उन्हे मेरे बनाए रेखा-चित्र बहुत पसंद आते थे.

विद्यालय का पूरा माहौल एक सुंदर गांव जैसा था.

समाज में व्याप्त शोषण को अपने रेखा-चित्रों में अंकित करते हम प्रदर्शनियां आयोजित करते थे. टिन के बक्सों में इन्हें एक गांव से दूसरे गांव तक ले जाते और लोगों के घरों के सामने चौपाल वग़ैरह पर इन्हें प्रदर्शित करते. इन गतिविधियों में - झाडू लगाकर सड़कों को साफ़ करना , दीवारों को प्रेरणास्पद नारों से सजाना, गांव के बाहर रहने वाले डूबळा आदि-वासियों को रात में लालटेन लेकर पढ़ाने जाना, उन्हें चिकित्सकीय मदद सुलभ करना, नृत्यनाटिका व गरबा करना, गांव गांव घूमना, चरखा चलाना, प्रार्थना करना वग़ैरह – समाजवादी गीतकार व चित्रकार कुलिन पंड्या हमारी प्रेरणा के मुख्य स्त्रोत थे. साल के अन्त में मनोरंजन के कई खेल भी हम आयोजित करते थे जिनमें सभी सक्रियता से भाग लेते थे. उन्हीं दिनों हमने दो बड़े जुलूस भी निकाले थे. एक था गाली विरोधी दिन और दूसरा था मच्छर विरोधी दिन.

वहीं गांव में नदी – वाल्मीकि – थी और मुझे कुछ ऐसा याद पड़ता है कि मैं चालीस डोल पानी तो बहुत बार वहां से भर कर लाता था.

डोबडु नाम का आदि-वासी वाद्य-यंत्र मुझे बहुत प्रिय था. उसका गहरा अनुनादी स्वर मुझे इतना विमोहित कर देता था कि मैंने उस पर सैकड़ों रेखा-चित्र बनाए. हम विद्यार्थी एक अखाड़े/ व्यायामशाला में एकत्र होते. यह एक उजाड़ जगह थी जिसे हमने एक जीवन्त स्थल में बदल दिया था - वहां पौधे लगाये थे, गोबर से ज़मीन लीप दी थी और इसे अपना कार्यालय बना लिया था, सारे ज़रूरी उपकरण भी ले आए थे. अखाड़े की धूसर दीवारों को हमने मिट्टी रंगों से रंग दिया था – टूटे दातूनों की मदद से. यह स्थल इतना मनभावन बन गया था कि सभी गांववासी इसे देखने आ गये थे.

यह चालीस से पचास का दशक था. हम परोड़/भोर में गांव में घूमते हुए गाते थे:

जागजो जागजो नवे प्रभात जागजो
भारत ने अंग अंग हर्ष ना उठे तरंग

हर वह बालक जो विद्यालय की वार्षिक परीक्षाओं में बैठता था, होनहार माना जाता था और जो सातवीं कक्षा में सफल हो जाता उसे शिक्षक की नौकरी मिल सकती थी. मैं इस इम्तिहान में सफल रहा था और ड्राइंग में भी. अलावा इनके कोविद ( हिन्दी ) व विनीत ( हिन्दुस्तानी ) परीक्षाओं में भी. मुझे चरखा कातना बहुत पसंद था. मैं एक दिन में क़रीब एक मीटर कपड़े जितना सूत कात लेता था. वालोड में मैट्रिक पास करने के बाद मैंने श्री नरहरि पारीख के साथ महादेवभाई की डायरी लिखने के लिए लहिया का काम किया. वे रोज़ाना महादेवभाई की गांधी जी के जीवन पर लिखी जा रही डायरी में से कुछ पन्ने मुझे बोल कर लिखवाते थे. मुझे हर पृष्ठ के हिसाब से मेहनताना मिलता था, मेरे जीवन का पहला रोज़गार.

अब समस्या यह थी कि मैं आगे की पढ़ाई के लिए कहां जाऊं ? शांतिनिकेतन बहुत दूर लगता था इसलिए यह तय हुआ कि मैं मुम्बई में जे. जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट में जाने के लिए कोशिश करूं या बडौदा में ललित-कला विभाग में जाने के लिए. मुम्बई में मुझे खारिज़ कर दिया गया. विडम्बना देखिए कि मुम्बई में जिस प्रोफ़ेसर ने मुझे खारिज़ किया था बहुत बरसों बाद मैं उन्हीं के साथ एक कमेटी में था, कला-विद्यार्थियों के कार्य का साक्षात्कार लेने वास्ते ! बडौदा में प्रवेश-परीक्षा के लिए मैंने टेराकॉटा का बैल बनाया था. बेंद्रे, जो वहां के प्रमुख थे, बोले–”बहुत बढिया” हालांकि मैं इसे लेकर सजग था कि मेरे बैल में दरारें पड़ सकती है.
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