ग्लोबल गांव के देवता
पुस्तक अंश
ग्लोबल गांव के देवता
रणेन्द्र
यूँ तो रविवार का दिन मेंरे लिए आलस्य, नींद और बिछावन से मुहब्बत का होता है. खूब
देर से जागना. बिछावन पर पड़े-पड़े नींद की खुमारी का आनन्द लेना. स्लो मोशन में
नहाना-धोना. खूब भारी नाश्ता करके मनपसन्द किताब थाम, फिर बिछावन पर लोट-पोट होना.
कभी इस करवट, कभी उस करवट. दस पन्ना पढ़ाई, फिर दस मिनट की नींद. पढ़ाई और नींद की
खुमारी-भरी जुगलबन्दी. उचाट, बोझिल, अकेलेपन की बरछीवाले रविवार की ऐसी की तैसी.
लेकिन आज नींद की खुमारी गायब थी. अजब तरह की फूर्ती. सबेरे-सबेरे ही नहा-धो कर आ
गया. एतवारी ने भी नाश्ता के बदले भात ही राँध दिया. नौ-साढ़े नौ तक खाने-पीने की
छुट्ठी. मन में बेचैनी. कपड़ा-वपड़ा पहन कर तैयार. बार-बार निगाहें स्कूल गेट की ओर
उठतीं. कोठरी से बाहर निकल, टहलने लगा.
एतवारी बेचैनी समझ रही थी. उसने बताया कि यहाँ से दूर ही घर है रूमझुम का. मीलों
पसरा पाट एकदम सपाट नहीं है. पहाड़ों के बीच छोटी-छोटी तराइयाँ हैं, जो आधी मील तक
चौड़ी और एक-दो मील लम्बी हैं. इन्हीं दो पहाड़ियों के बीच की तराई-दोहर में पाट के
असुरों के धान के खेत हैं. ऐसी दो तराइयों-दोहर लाँघने और दो पहाड़ चढ़ने के बाद
रूमझुम का गाँव कन्दापाट पड़ता है. एतवार के कारण वे भी देर से उठे होंगे. आराम से
खा-पी कर अब पहुँचते होंगे.
लेकिन रूमझुम ने आने में देर की. थक-हार कर कोठरी में बैठा मैं किताब उलटने-पुलटने
लगा. आजकल असुरों के बारे में जानने की इच्छा बलवती हो गई थी. स्कूल की लाइब्रेरी
अच्छी खासी थी. मिंज मैडम के पहले के प्रिन्सपल को किताबों से बहुत प्यार था. अपने
सात साल के पीरियड में खूब अच्छी-अच्छी किताबें जमा की थीं. उसमें जितनी किताबें
असुरों से सम्बन्धित थीं, सब उठा कर ले आया था. वेरियर एल्विन से लेकर एस.सी. राय
तक सब मेरे कमरे के टेबुल की शोभा बढ़ा रहे थे.
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ग्लोबल गांव के देवता
उपन्यास
रणेन्द्र
प्रकाशकः भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोधी रोड़, नई
दिल्ली |
साढ़े दस के आसपास रूमझुम आए। साँवला-चमकता चेहरा, तीखी नाक, बोलती हुई ऑंखें.
घुँघराली दाढ़ी और बालों की भी घुँघराली लटें कंधों को छुती हुई. मेंरी ही उम्र के
होंगे. बातचीत से पता चला कि मुझसे दो वर्ष पहले ग्रेजुएशन किया था.
सड़क पर आ कर बॉक्साईट ट्रक से पाथरपाट मोड़ की ओर चले. रूमझुम ने बताया कि दूरी
मुश्किल से दस-बारह किलोमीटर होगी, किन्तु बॉक्साइट ट्रकों की ओभरलोडिंग ने सड़क की
हालत खस्ता कर रखी है. सरकार को लगता है कि कम्पनियाँ सड़क-मरम्मती में मदद करें.
कम्पनियों को लगता है कि सड़क सरकार की है. हम टैक्स तो भरते ही हैं, फिर सड़क मरम्मत
क्यों करें ? बरसात में गङ्ढो को लेटराइट से भर कर अपनी डयुटी पूरी समझ लेते हैं.
अब हिचकोले खाते, दस किलोमीटर की दूरी एक घंटे में पूरी करते रहिए. कम्पनी के
आफिसरों का क्या ? वे तो अपनी जोंगा की मोगा शिकारी जीपों को सड़क छोड़, खेत-बघार में
दौड़ाते स्पीड बनाये रखते हैं. उनका समय कीमती है भाई ! हमलोग जैसे
बेकार-निकम्मा-निठल्ला थोड़े ही हैं.
देश-दुनिया की बातें करते हम पाथरपाट मोड़ पर पहुँचे. अब ट्रक को नीचे उतरना था.
लगभग साठ किलोमीटर पर रेलवे जंक्शन तक दूरी तय करनी थी, जहाँ मालगाड़ी में बॉक्साइट
लोड होकर अल्युमिनयम कारखाने तक पहुँचेगा. हमें ट्रक उसी मोड़ पर छोड़ना था. हालाँकि
पाथरपाट पर्यटन के ख्याल से बंगालियों में बड़ा लोकप्रिय था. सो छोटी-बड़ी गाड़ियाँ आ
जा रही थीं. किन्तु रूमझुम को एक-डेढ़ किलोमीटर के लिए गाड़ी पर चढ़ना उचित नहीं लगा.
सड़क छोड़, जंगल की शार्टकट पगडंडी हमने पकड़ी. बातों ने फिर रफ्तार पकड़ी. रूमझुम
बातों की गहराई तक उतरते. उनका रोष भी वाजिब लगता.
''हमारा बॉक्साईट यहाँ से डेढ़-दो सौ किलोमीटर दूर, जहाँ प्रोसेस हो कर अल्युमिनयम
में ढलता है वह जगह सिल्वर सिटी ऑफ इन्डिया कहलाती है. एक बार घूमने का मौका मिला
था. फूलों-पार्कों से लदी हरी-भरी खूबसूरत कॉलोनी. एक से एक स्कूल, चमचमाते बाजार,
क्लब घर, योगा केन्द्र, लाइब्रेरी, खेल के मैदान और न जाने क्या-क्या ?
सुन्दर-सुन्दर कुत्तों को घुमाती सुन्दर-सुन्दर महिलाएँ, बर्फ के गोलों से गुलथुल
उजले-उजले बच्चे, रंग-बिरंगी गाड़ियाँ. लगा, इन्द्रलोक धरती पर उतर आया हो. और यहाँ
पाट में अब तो आप आ ही गए हैं मास्टर साहब. धीरे-धीरे सब जान जाइएगा. पानी और जलावन
जुटाने में ही हमारी औरतों की आधी जिन्दगी गुजर जाती है. बरसात के गिंजन की तो मत
पूछिए. बन्द खदान के सैकड़ों गङ्ढे विशाल पोखरों में बदल जाते हैं. कीचड़ में लोटते
सुअरों और हमारे बच्चों में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. वहाँ के गेस्ट हाउस के
मेंस में छत्तीस तरह के व्यंजन. मुहावरे वाले नहीं. सचमुच के. क्या खाएँ-क्या नहीं
खाएँ. एक ही दिन में पेट खराब हो गया. यहाँ मकई का घट्टा खा-खा कर जीभ पर घट्टा पर
जाता है. हमारे ज्यादातर घरों में भात-दाल सब्जी भी पर्व-त्यौहार का भोजन है.''
रूमझुम की आवाज थरथराने लगी थी और ऑंखें छलछलाने. हमारी चाल भी धीमी हो गई थी. एक
चट्टान पर हम बैठ गये. माहौल थोड़ा भारी सा हो गया था. हम नजरें मिलाने से बच रहे
थे.
कुछ मिनटों बाद मैंने ही टोका. मूड बदले इसीलिए विषय बदलने की कोशिश की. '' आप
लोगों का टाइटिल बहुत चौंकाता है रूमझुम भाई. ''
रूमझुम हँसने लगे.
''ठीक कहते हैं. असुर सुनते दो ही बात घ्यान में आती है. एक तो बचपन में सुनी
कहानियों वाले असुर, दैत्य, दानव और न जाने क्या-क्या. वर्णन भी खूब भयंकर. दस-बारह
फीट लम्बे. दाँत-वाँत बाहर. हाथों में तरह-तरह के हथियार। नरभक्षी,
शिवभक्त-शक्तिशाली. किन्तु अन्त में मारे जाने वाले. सारे देवासुर संग्रामों का
लास्ट सीन पहले से फिक्स्ड. दूसरी ऐन्थ्रोपॉलोजी की 1926, 1946 या 1966 की किताबों
में छपी केवल कॉपीन पहने मर्द और छाती तक नंगी औरतों वाली तस्वीरों वाले असुर.''
'' अब आप खुद ही तय कर लीजिए, मास्टर साहब, कि हम क्या हैं ?'' उनका चेहरा फिर काला
पड़ने लगा था और आवाजें डूबने लगी थी. लेकिन थोड़ी ही देर में सँभल गए. फिर बातें
शुरू हुईं.
''इस देवासुर संग्राम ने मुझे भी बहुत उलझाया था मास्टर साहब. इसीलिए मैने पढ़ाई के
लिए संस्कृत को चुना. बाबा की जमा की गई किताबों ने भी इसमें भूमिका निभाई होगी.
ऐसे तो बाबा साइंस टीचर हैं किन्तु लगता है कि अपनी जड़ों की तलाश में
धार्मिक-ऐतिहासिक किताबें जमा कर रखी थीं.''
हम फिर पाथरपाट की ओर बढ़ चले थे. जंगल में धूप छन-छन कर आ रही थी, किन्तु उसके चढ़ने
का अहसास हमारे कदमों को तेज कर रहा था.
''हम असुर लोग मोटा-मोटी तीन भाग में बँटे हैं.'' रूमझुम ने फिर बात शुरू की, ''बीर
असुर, अगरिया असुर और बिरिजिया असुर. हालाँकि 'बीर' यहाँ बहादुर के सेन्स में नहीं
आया बल्कि जंगल के अर्थ में आया है. लेकिन प्राचीन असरिया-बेबीलोन सभ्यता में असुर
का अर्थ बलवान पुरूष ही होता है. अपने यहाँ भी सायणाचार्य असुरों को बलवान,
प्रज्ञावान, शत्रुओं को नाश करने वाला और प्राणदाता पुकारते हैं. ऋग्वेद के
प्रारम्भ के लगभग डेढ़ सौ श्लोकों में असुर देवताओं के रूप में हैं. मित्र, वरूण,
अग्नि, रूद्र सभी असुर ही पुकारे जा रहे हैं. बाद में यह अर्थ बदलने लगता है और
असुर दानव के रूप में पुकारे जाने लगते हैं.''
''अंगिरा या अंगिरस ऋषि और अगरिया में एकापन भी ध्यान खींचता हैं.' रूमझुम ने बात
आगे बढ़ाई, ''अंगिरा ऋषि भी अपने को आग से उत्पन्न बताते हैं और अगरियों की भी
पैदाइश आग से ही हुई है. यह अंगिरा ही हैं जिन्होंने सबसे पहले आग की खोज की थी. आग
की खोज और देवताओं से लड़ाई की कहानी कई जगह प्रचलित है. ग्रीक कथाओं में भी
प्रमथ्यू स्वर्ग से आग चुरा कर लाता है तो देवता उसे सजा देते हैं. सिंगबोंगा-सूर्य
देवता द्वारा असुरों को सजा देने की कथा प्रचलित है. किन्तु यह सुर-असुर लड़ाई एक
जटिल पहेली है. कभी हमलोग स्थिर से बैठकर इसे सुलझायेंगे. क्या यह पाषाणकालीन लोगों
का धातु पिघलाने वाले लोगों से संघर्ष था ? सुर में सू शामिल है जिसका अर्थ उत्पादन
होता है. इसीलिए क्या जंगलों को काट कर उत्पादन यानी खेती करने वालों और सखुआ पेड़
के कोयले पर आश्रित लोहा पिघलाने वालों के बीच की लड़ाई है. विष्णु के कई अर्थ हैं
जिनमें फैलनेवाला और यज्ञ भी है. जंगल की आग तेजी से फैलती है. झूम खेती जंगलों को
काट कर और जला कर ही की जाती रही है. स्वाभाविक है, जो लोग भोजन और रोजगार के लिए
जंगल पर निर्भर रहे होंगे उन्हें जंगलों का जलाया जाना अखरता होगा, चाहे उसे यज्ञ
कहिए या विष्णु कहिए, क्या फर्क पड़ता है ? यह लड़ाई का कारण बना होगा. कई -कई
व्याख्याएँ हो सकती हैं. फिर इस पर बात की जायेगी. अभी स्कूल घूमा जाए।''
पाथरपाट स्कूल का गेट सामने ही था. स्कूल का इतना बड़ा कैम्पस कि हमलोगों के
भौंरापाट जैसे दो-तीन गाँव समा जाए. हरा-भरा, सुन्दर, व्यवस्थित कैम्पस. कैम्पस में
घुसते ही सबसे पहले हाट जाती एक आदिवासी स्त्री की मूर्ति पर नजर पड़ती थी. पीठ पर
बँधा हुआ बच्चा, एक हाथ में मुर्गी, माथे पर लकड़ी का छोटा सा गठ्ठर. एकदम सजीव सी
मनोहारी मूर्ति. इन्ही विशालकाय भवनों में राज्य के सबसे मेंधावी लड़के पढ़ते.
जिन्हें सबसे ज्यादा वेतन पाने वाले सुयोग्य शिक्षक पढ़ाया करते. आखिर इन्हें ही
शासक बनना था. छात्रावास की व्यवस्था भी अनूठी थी. एक शिक्षक परिवार एक छात्रावास
के साथ जुड़ा था. उसकी आवासीय व्यवस्था भी वैसी ही बनाई गई थी. वे ही उस छात्रावास
के बच्चों के माता-पिता थे. उनकी ही देखरेख में बच्चे पलते-बढ़ते. खेल-कूद,
चित्र-संगीत, वाद-विवाद, यानी हर पहलू के विकास की चिन्ता. एकदम ठीक कहा था डॉक्टर
साहब ने, असल स्कूल यही है.
लेकिन रूमझुम की चिन्ता कुछ और थी. ''असुरों के सौ से ज्यादा घरों को उजाड़ कर बना
था यह स्कूल. अभी भी आसपास असुर आबादी है. ज्यादा दूर नहीं बीस-बाईस किलोमीटर के
दायरे में लगभग सारी की सारी असुर, बिरिजिया, कोरबा आबादी बसती है. पिछले तीस
वर्षों का रजिस्टर उठा कर देख लीजिए, एक भी आदिम जाति परिवार के बच्चे ने इस स्कूल
में पढ़ाई की हो ! मैंने खुद कितनी कोशिश की थी. पिछले दो-तीन वर्षों से कैजुअल
शिक्षक के रूप काम करने की इच्छा है. लेकिन वहाँ भी दाल नही गलती. आखिर हमारी छाया
से भी क्यों चिढ़ते हैं ये लोग. माड़-भात खिलाकार, अधपढ़-अनपढ़ शिक्षकों के भरोसे,
फुसलावन स्कूल के हमारे बच्चे, ज्यादा से ज्यादा स्किल्ड लेबर, पिऊन, क्लर्क
बनेंगे, और क्या ? यही हमारी औकात है. हमारी ही छाती पर ताजमहल जैसा स्कूल खड़ा कर
हमारी हैसियत समझाना चाहते हैं लोग.''
हवा फिर भारी हो गई थी.
24.12.2009, 18.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित