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लोग ही चुनेंगे रंगः लाल्टू

पुस्तक अंश

 

लोग ही चुनेंगे रंगः लाल्टू

कविता संग्रह

प्रकाशकः शिल्पायन, 10295, लेन नम्बर-1, वैस्ट गोरखपार्क, शाहदरा, दिल्ली-110032

लाल्टू का नया संग्रह

 

कवि की याद में
गुज़रने से पहले ही एक युवा कवि ने लिखी थी उस पर पाँच छह कविताएँ
इधर साल भर आधा दर्जन समकालीन मित्र जन
लिख रहे छप रहे उसके नाम
करीब करीब हाय कवि हाय कवि कहती कविताएँ

अपने समय के प्रमुख कवियों की तरह वह पुरुष
खासी ऊँची जाति का और मध्य वर्गीय
घर में चाय शायद ही कभी बनाई
बीबी जैसी होती वैसी ही थी
उसका काम शराब पीना और महाकवि घोषित खुद को करना
दोस्तों का काम उसे शराब पिलाना और साथ बिताई शामों का खजाना बढ़ाते रहना
दूर दूर तक युवाओं ने पढ़ीं उसकी कविताएँ
दूर दूर तक फैले उसके शब्द
हालाँकि वह था एक निहायत कमज़ोर आदमी
दुबारा कह रहा हूँ हालाँकि वह एक निहायत कमज़ोर आदमी
उसके शब्दों में थी ताकत बला की
आशा के दीप थे उसके शब्द
जब अँधेरा हो
बहुत अँधेरा घनघोर
दूर दूर से हम आएँगे मिलेंगे
उसके शब्द बाँटेंगे
याद करते हुए रोएँगे
शब्दों में रोता उसका दिल
हमारी यादों में होगा
हम रोएँगे खूब रोएँगे.
(पश्यन्ती - 2001)

कोई बाहर से आता है
कोई बाहर से आता है
कोई अन्दर है.

कोई भाषा ले आता है
कोई गूँगा है
कोई गीत गाता है
कोई बहरा है.

किसी के अन्दर क्या बुझा है
कोई सोचता है ढूँढा जाए
कोई बुझी आँखों से
किसी को दिखलाता है
ज़मीन आसमान के रंग.

कोई थका लौटता
कोई सोच बुनता.

किस ने किस को कितना समझा
किसी के जाते ही किसी की दुनिया से
गायब हो जाता किस और किस का निजी इतिहास
बन्द होते ही खिड़की
बन्द हो जाते
पेड़ आसमाँ फूलों के बाग़ .

किसी की ज़िन्दगी बहुत करीब होती है
कोई ज़िन्दगी से बहुत दूर होता है .
(2000)
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