आलाप में गिरहः गीत चतुर्वेदी
पुस्तक अंश
आलाप में गिरहः गीत चतुर्वेदी
कविता संग्रह
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली
110002
कीमतः 195 रुपये

माउथ
ऑर्गन
भूले को फिर याद करने के सिलसिले में
याद करता ढंग से माउथ ऑर्गन बजाना
देर तक की पीं-पीं
सुनता भाषा सीखने के क्रम में
ता-ता करते बच्चे की कोशिश जैसे
कैलेंडर पर गोले लगे दिनों को
छोटे-छोटे छेदों से पार कर दूं
ऐसे कि लय की गांठ में बांधूं इलेक्ट्रॉनों-सी भटक-भवानी याददाश्त
बूढ़े के कमज़ोर फेफड़े बताते माउथ ऑर्गन के बारे में
टेप में लपेट लीं मैंने वे धुनें
सीधा-साफ़ जिन्हें छोड़ आया था वह तैरता हवा में
सुन जिन्हें याद आ जाती कोई बिसरेली हिचकी
पलट-पलट देखता पलटते रास्तों को
जिनकी दुर्गमता की सिंफनी बातों में कंपोज़ करता
हवा में कुछ लिखती अरैंजर उंगलियों से
कहता टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलते लगा हमेशा
सीधे बिल्कुल सीधे
चला जा रहा सीधमसीधे
बार-बार चूमता अपने पैर वह आज
कहता हर नोटेशन पैर की तरह दिखता है
जिस पर सभ्यता के धड़ ने की है यह यात्रा
सिंथ के सारे बटनों पर अचानक फिराता उंगली
महज़ एक तार या बटन होता है गड़बड़
सदियां सरक जाती हैं उस तक पहुंचने में
बाक़ी सारे बटन तो महज़ बाक़ी बटन होते हैं
पीड़ा-भय को नहीं, छालों को दो मान्यता
महलों को नहीं मिस्त्री हाथों को
राम को मत दो शिवधनुष तोड़ने का श्रेय
विदेह शारंग को देख सको ऐसी दृष्टि पाओ
सुरों से नहीं असुरों से समझना
मिथिहास के सारे विदेह कोप नहीं क्यों
दैवीय षड्यंत्रों के भाजन हैं
जिसे वह बूझ नहीं सकता
धुएं से आचमन करता है उसके आगे
एक काला बिलौटा अचानक सड़क बीच
भौंचक तकता है दौड़ती गाड़ियों को
उसके दिमाग़ का नहीं पता मुझे
शरीर का संतुलन वह खो रहा है
इस गाड़ी के नीचे आ जाएगा अभी
अभी एक टायर धमका गया है
भौंचक है बिलौटा भौंचक है
रफ़्तार के आगे बेबस है
भीतर और बाहर की देहरी पर बैठा मैं
रोक देता हूं माउथ ऑर्गन बजाना
टेढ़े रास्ते हर किसी को नहीं लगते सीधे
शंख में फूंकी हर वायु ध्वनि नहीं बनती
फिर लगातार बजाता हूं माउथ ऑर्गन तब तक
उस पार सलामत पहुंच जाए बिलौटा
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महज़ रिवायत
(जॉर्ज माइकल के गीतों के लिए)
तुम्हारे साथ कभी नाच नहीं सकता अब
मेरे पैरों में थकान है, थिरकन नहीं
सबसे आसान है स्वांग करना
उसको पकड़ पाना सबसे मुश्किल
कितना बौड़म हूं
यह भी नहीं जानता
आग पर बर्फ़ रखने की कोई क्षमा नहीं
तवे पर छन्न की
छल के बदले क्या मिलता है
आंख चुराना सबसे बड़ी चोरी है
जानने का अवसर सिर्फ़ एक बार आता है
बाक़ी मुलाक़ातें तो महज़ रिवायत हैं
अलोना
लिखा जाए
लिखा जाए
इस तरह लिखा जाए
बहुत हो चुका मीठा-मीठा
जो मीठा है उसको नीम लिखा जाए
झूठ एक दर्शन है
किताबों में फिल्मों में कैसेट में सीडी में सिगरेट पान बीड़ी में
चिनाब में दोआब में तांबई शराब में मेरे समय के हिसाब में
जिन दिनों मैं जिया
उसे साफ़-साफ़
बहुत साफ़-साफ़
ख़राब लिखा जाए
चिह्न नहीं बिंब नहीं कोई लघु प्रश्न नहीं
जो कुछ है- चकाचौंध सब कुछ विशाल है
जिसे कहा गया सलोना
उसे रखो जीभ पर
क्या ग़लत होगा उसे
अलोना लिखा जाए
असंबद्ध
कितनी ही पीड़ाएं हैं
जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं
ऐसी भी होती है स्थिरता
जो हूबहू किसी दृश्य में बंधती नहीं
ओस से निकलती है सुबह
मन को गीला करने की ज़िम्मेदारी उस पर है
शाम झांकती है बारिश से
बचे-खुचे को भिगो जाती है
धूप धीरे-धीरे जमा होती है
क़मीज़ और पीठ के बीच की जगह में
रह-रहकर झुलसाती है
माथा चूमना
किसी की आत्मा चूमने जैसा है
कौन देख पाता है
आत्मा के गालों को सुर्ख़ होते
दुख के लिए हमेशा तर्क तलाशना
एक ख़राब क़िस्म की कठोरता है
10.02.2009,
23.24 (GMT+05:30) पर प्रकाशित