पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > Print | Send to Friend | Share This 

नागपाश में स्त्रीः गीताश्री

पुस्तक अंश

 

नागपाश में स्त्रीः गीताश्री

स्त्री विमर्शःआलेख संग्रह

प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली. कीमतः 250 रुपये


नागपाश में स्त्रीः गीताश्री

बदलाव की बयार बह रही है
मृदुला गर्ग

हम पांच बहनें थीं और एक भाई. मेरे परिवार में लड़के और लड़कियों के बीच उस तरह का फर्क नहीं किया जाता था कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ना नहीं चाहिए या एक तय उम्र में लड़की की शादी हो जानी चाहिए. बल्कि ज्यादा जोर हम बहनों की पढ़ाई-लिखाई पर ही दिया गया और शादी-विवाह की चर्चा ही नहीं होती थी. इस हद तक कि मेरी बड़ी बहन मंजुल को खुद कहना पड़ा-'भई, हमारी शादी-वादी भी होगी!' मगर यह तय है कि लड़कियों के लिए हमारा समाज सुरक्षित नहीं.

हमारे बचपन में यह संभव नहीं था कि हम सड़कों पर अकेले घूमें. विभाजन से पहले दिल्ली शहर में किसी लड़की का अकेले सड़क पर निकलना असंभव था. क्योंकि मुसलमान लड़कियां तो बुर्के में होती थीं इसलिए जो बुर्के में नहीं होती थीं उनकी पहचान साफ थी कि वे हिंदू हैं. तो छेड़छाड़ और किसी भी तरह की दुर्घटना का खतरा बना रहता था. लड़कियां ही नहीं, बड़ी उम्र की औरतों के साथ भी सड़कों-बाजारों में हादसे हो जाया करते थे. विभाजन के बाद यहां औरतों को थोड़ी सुरक्षा और स्वतंत्रता मिली. मगर आज तो और ज्यादा असुरक्षा का माहौल है. चाहें दफ्तर में काम करती हों, बस में सवार हों या सड़क पर हों, औरतें कहीं सुरक्षित नहीं. औरतें हर जगह, हर वक्त असुरक्षित हैं. समाज में औरतों की सुरक्षा नहीं, इसलिए औरत अपने मन का बहुत कुछ नहीं कर पाती.

मसलन मुझे नहीं याद कि बचपन में कभी देर तक अकेले बाहर रही हूं. हां, हमारे घर लडकों के साथ बैठकर बातचीत करना बिल्कुल स्वीकार्य था. हमारे पिताजी के पास बहुत लड़के आया करते थे. वे स्वतंत्रता आंदोलन में रहे थे और समाज में उनका कुछ ऐसा रसूख था कि लोग उनसे राय-मशविरा करने आया करते थे. उस वक्त हम बाबर रोड पर रहा करते थे. पिताजी बौद्धिक शख्शियत थे और सामाजिक-राजनीतिक मसलों में खूब दिलचस्पी लेते थे. तो हमारे घर बहुत सारे हमउम्र लड़के आते थे और हम उनसे राजनीति पर, साहित्य पर खुलकर चर्चा करते थे.

ऐसा नहीं होता था कि चार लड़के आए तो हमसे भीतर जाने को कहा जाए. हम पिताजी, उन लड़कों से बहस करते थे और अपनी असहमतियों को ठोक-बजाकर उनके सामने रखते थे. हमारी मां भी अक्सर इन बहसों में शिरकत करती थी. यह तो जब मेरी शादी हुई और मैं डालमिया नगर गई तो वहां मैंने यह फर्क महसूस किया. बैठक में दस-बीस लोग बैठे हैं, राजनीति पर चर्चा चल रही है और वहां मैंने कुछ बोल दिया तो सब चुप हो जाते थे. वहां कोई औरत मर्दों के बीच बोलती नहीं थी. यह बात मुझे बहुत बाद में समझ आई, मगर तब तक तो देर हो चुकी थी.

जहां तक स्त्री की नैतिकता का सवाल है विवाह से पहले यौन संबंध अनैतिक माना जाता था, आज भी कुछ हद तक माना जाता है. मगर यह पुरुषों के लिए भी अनैतिक माना जाता है. यह अलग बात है कि पुरुष इसकी परवाह नहीं करते. विवाहेत्तर संबंध अनैतिक माना जाता था, मगर उस जमाने में भी पुरुषों के ही नहीं, स्त्रियों के भी विवाहेत्तर संबंध होते थे. स्त्रियों के संबंध ज्यादातर परिवार के अंदर ही बन जाते थे. जब सन 1975 में मेरा पहला उपन्यास 'उसके हिस्से की धूप' छपा तो मध्यवर्गीय औरतों के ढेरों पत्र मेरे पास आए कि यह तो मेरी कहानी है, मगर मैं इसे लिख नहीं पाई.

मगर मैं अपने अनुभव से इतर नैतिकता के सवाल पर बात करना चाहती हूं. एक सहजात नैतिकता होती है जो अंत: प्रज्ञा से आती है. कहावत है कि नैतिकता का पता तब लगता है जब किसी बहुमंजिला इमारत के बीच की मंजिल में आग लग जाए. वहां जो लोग होते हैं उसमें से ज्यादातर खुद को बचाने के लिए नीचे भागते हैं, कुछ लोग ऊपर भागते हैं, दूसरों को बचाने के लिए. उस वक्त व्यक्ति की सहजात नैतिकता सामने आती है.

जाहिर है जो ऊपर लोगों को बचाने के लिए भागता है उसे ही आप नैतिक मानेंगे, क्योंकि आपके भीतर भी कहीं-न-कहीं वही नैतिक स्रोत है. यह एक नैतिकता बोध है जो जन्मजात है, उसका संबंध किसी समाज, सभ्यता या संस्कृति से नहीं. चूंकि औरत बच्चे को जन्म देती है तो जाहिर है कि वह सहजात नैतिकता बोध उसमें होगा. इस सहजात नैतिकता लें तो पुरुष और स्त्री में कोई अंतर नहीं होता. आप किसी की हत्या नहीं कर सकते क्योंकि यह आपकी सहजात नैतिकता नहीं, पशु भी हत्या तब करते हैं जब उन्हें अपना पेट भरना होता है. मगर जब सभ्यता आती है तो उसके साथ कुछ अन्य मूल्य आ जाते हैं.

जैसे युद्ध में देश को बचाना है तो आप हत्या कर सकते हैं. तो युद्ध में आप जो हत्या करते हैं वह हत्या नहीं मानी जाती. यह सहजात मूल्य नहीं है. इस तरह नैतिकता का एक दूसरा स्वरूप हमारे सामने आता है. और जब नैतिकता का यह स्वरूप हमारे सामने आता है तो समाज खुद को बचाए और बनाए रखने के लिए कई सारे मूल्य निर्मित करता है जो व्यक्ति की सहजता नैतिकता से मेल नहीं खाती. मगर जब आप समाज में रहते हैं, उन मूल्यों को आप स्वीकार करते जाते हैं तो वे आपके लिए संस्कार का रूप धारण कर लेते हैं. फिर स्वभाव और संस्कार में अंतर करना बड़ा कठिन हो जाता है. फिर अपने संस्कारों को आप स्वभाव के रूप में पहचानने लगते हैं. मगर जो स्वभावगत नैतिक मूल्य हैं वे हमेशा बने रहते हैं. और इस बिंदू पर स्त्री और पुरुष में इतना ही फर्क होता है कि स्त्री मातृत्व की वजह से बच्चों के प्रति, परिवार के प्रति ज्यादा उत्तरदायित्व महसूस करती है.

दूसरी बात यह कि नैतिक मूल्य समय के साथ बदलते रहते हैं. मसलन सहवास से अनचाहे गर्भ निर्धारण का डर रहता था. इसलिए नैतिक मूल्य समाज ने बनाए कि विवाह पूर्व सहवास जायज नहीं. मगर जब विज्ञान ने तरक्की की और गर्भनिरोध का हथियार आपके पास आया तो संभोग और गर्भनिर्धारण का रिश्ता टूट गया. यही वजह है कि फिर पश्चिम में विवाह पूर्व संभोग जायज माना जाने लगा, क्योंकि गर्भधारण का डर नहीं रहा. इसी तरह गर्भपात अनैतिक था, क्योंकि गर्भपात में कई तरह की कठिनाइयां आती थीं इसलिए कानून इसकी इजाजत नहीं देता था. मगर जब कानून ने गर्भपात की इजाजत दे दी तो स्त्रियां इसे अपना अधिकार मानने लगी. मगर गर्भपात करवाना है या नहीं करवाना है, नैतिक मूल्य के रूप में इसका संबंध 'जीवन लेना है या नहीं लेना है' से है जो नैतिकता पर निर्भर करता है. आप इनमें से किसको चुनते हैं वह आपकी सहजात प्रज्ञा पर निर्भर करता है.

जब तक कोई चीज डर से जुड़ी होती है आप कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि आप उसके खिलाफ नहीं जा सकते, आप उसे नैतिकता का लबादा ओढ़ा देते हैं. समाज में होता यह है कि जो भी हानिकारक चीजें हैं समाज के लिए उसे अनैतिक घोषित कर दिया जाता है, ताकि व्यवस्था बिगड़े नहीं. अब चूंकि स्त्री मां बनती थी उस पर परिवार की जिम्मेवारी थी और परिवार में कोई हारी-बीमारी हो तो स्त्री पर ही सारी जिम्मेवारी आती थी कि वही उनकी देखभाल करे. इसलिए जितने भी नैतिक मानदंड थे वे स्त्री पर ही लागू होने लगे. सवाल यह था कि स्त्री अगर घर छोड़कर चली जाए तो बच्चे कहां जाएंगे? पुरुष अगर घर छोड़कर चला जाए तो स्त्री बच्चे पाल लेती है, मगर स्त्री अगर दो महीने के बच्चे को छोड़कर चली जाए तो वह कैसे पालेगा? चूंकि समाज अपनी सुरक्षा चाहता था इसलिए जितने भी नैतिक मूल्य थे, वह स्त्री पर ही ज्यादा थोपे गए.

वैसे भी नैतिकता का यह सारा प्रपंच मध्यवर्ग की स्त्रियों पर ही ज्यादा लागू होता है-निम्न या उच्च वर्ग की स्त्रियों पर नहीं. मगर मध्यवर्ग में भी अब बदलाव की बयार बह रही है. अब औरतें बच्चों को गोद ले रही हैं, पाल रही हैं, महानगरों में अकेली रह रही हैं, अपनी मर्जी से संबंध बना रही हैं.

एक बात और. विवाहेत्तर संबंध चाहें स्त्री के हों या पुरुष का, उसे बरदाश्त भले कोई कर ले, नैतिक मूल्य के तौर पर स्थापित नहीं करता. स्त्री हो या पुरुष-आक्षेप दोनों पर लगते हैं. स्त्री पर बंधन कुछ ज्यादा इसलिए है कि उसके बगैर काम नहीं चल सकता. पुरुष की अनुपस्थिति में स्त्री घर चला लेती है, मगर स्त्री नहीं होती तो घर-परिवार टूट जाता है.

03.03.2010, 22.00(GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

kulish (kulishin@gmail.com) bikaner

 
 नैतिकता का दायित्व सामान रूप से स्त्री-पुरूष पर है. किन्तु ये टूटते आए हैं तो अधिकांश अटूट ही रहे हैं. तथापि स्त्री पर उसके वैसिस्त्य के कारण ही अधिक दायित्व रहे हैं उसका मात्तृ स्वरुप सदैव सम्माननीय है. स्वतंत्रता के नाम पर स्त्री का अधिकतर पथभ्रष्ट होना पाया गया, जो उसके साथ-साथ परिवार और पुरूष पर भी प्रभाव डालता है. अनैतिकता से बचने की कोशिश करने वाले पुरूष ऐसी स्त्री क पाश में बंधते आए हैं अतः केवल स्त्री को नागपाश में कहकर पुरूष को "त्रियापाश" से मुक्त नहीं देखा जा सकता. 
   
 

ASHOK GUPTA (ashok267@gmail.com) B 11/45 Sector 18 Rohini DELHI 110089

 
 मृदुला गर्ग का यह आलेख एक बहुत बड़े सामाजिक सरोकार की ओर सार्थक सोच का रास्ता खोलता है. नैतिकता के पुरुष और स्त्री के लिए गढ़े गये मूल्य - मापदंड और उनके निर्वाह को देखने परखने की समाज कि दृष्टि, यह कुल मृदुला गर्ग का सरोकार बहुत शुरू से रहा है. यहाँ भी उन्होंने अपना सार्थक विचार सामने रखा है. इसे एक महत्वपूर्ण अग्रगामी परिवर्तन माना जा सकता है. 'चित्तकोबरा' छपने पर 'सारिका' में जो बवाल सूर्यबाला नें उठाया था, उस से उलट गीताश्री नें इसे विमर्श की मुख्य धारा में ला कर रख दिया है.

करीब तीन दशक बाद स्त्री के नागपाश में होने के सच को उजाले में लाया गया है. यह एक सकारात्मक बदलाव है.

अशोक गुप्ता : मोबाइल 9871187875
 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in