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पुस्तक अंश | संयुक्ता | सीखना दिल से

पुस्तक अंश

 

सीखना दिल से

संयुक्ता

 

सीखना दिल से

प्रकाशकः एकलब्य, ई-10 बीडीए कॉलोनी, शंकर नगर, शिवाजी नगर, भोपाल 462 016

www.eklavya.in

मूल्यः 80.00 रुपये

 

एक यात्रा की शुरुआत
हर शुरुआत वास्तव में शुरुआत नहीं होती. पूर्व के अनुभव भविष्य के पथ-प्रदर्शक बन जाते हैं. जो कुछ हम कर रहे होते हैं वह बहुत हद तक पूर्व में प्राप्त हुए किसी अनुभव के कारण होता है. मेरे मामले में भी यह एक महत्वपूर्ण कारक था.

कलाक्षेत्र की याद
मेरे माता-पिता, दोनों समाजशास्त्र में प्रशिक्षित थे. पिता नरेन्द्रनाथ, दिल्ली में बैंक की नौकरी छोड़ देने के बाद, मेरी माँ उमाशंकरी और मेरे साथ दादा-दादी के घर हैदराबाद आ गए. मेरे पिता ने लोकायन और आन्ध्र प्रदेश नागरिक स्वातंत्र्य समिति (एपीसीएलसी) आदि संगठनों से जुड़कर सामाजिक कार्यों में भाग लेना शुरु कर दिया. जबकि मेरी माँ ने लोक उद्यमिता संस्थान, उस्मानिया विश्वविद्यालय में काम किया.

हैदराबाद में छह साल रहने के बाद मेरे माता-पिता के मन में अपनी सामाजिक गतिविधियों को किसी गाँव में आधारित करने और ज़मीनी स्तर पर काम करने का विचार आया. किसान बनने और सामाजिक क्षेत्र में काम करने के लिए वे मेरे दादाजी, छोटी बहन लक्ष्मी और मुझे साथ लेकर आन्ध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले में स्थित हमारे पुश्तैनी गाँव वेंकटरामपुरम् आ गए. तब से मेरे माता-पिता ने विभिन्न उद्देश्यों के लिए कई क्षेत्रों में काम किया है, जिनमें प्रमुख हैं कृषि, जल प्रबन्धन, दलितों के भूमि अधिकार, और छुआछूत का मुद्दा. पिछले पन्द्रह सालों के दौरान हम अपनी अधिकांश भूमि पर जैविक खेती करने में सफल हो गए हैं. अब हम नियमित जैविक आम, धान, गन्ना, मूंगफली, नारियल और मौसमी सब्ज़ियाँ उगाते हैं.

मेरे माता-पिता के गाँव आ जाने के थोड़े ही समय बाद मैंने चेन्नई के बेसेन्ट अरुन्डेल सीनियर सेकेण्डरी स्कूल (बीएएसएस) में रहवासी विद्यार्थी के तौर पर दाखिला लिया. यह स्कूल, भरतनाट्यम (भारतीय शास्त्रीय नृत्य) के प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान, कलाक्षेत्र फाउण्डेशन से सम्बद्ध है. कलाक्षेत्र प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना श्रीमति रुक्मिणी देवी अरुन्डेल द्वारा स्थापित किया गया था. उन्होंने भरतनाट्यम की अनोखी शैली विकसित की और कलाक्षेत्र शास्त्रीय नर्तकों और संगीतकारों के लिए आश्रय बन गया. रुक्मिणी अत्ताई बच्चों को प्रेम करती थीं और उन्होंने सीखने के लिए तनाव-मुक्त व दोस्ताना माहौल पर तथा ऐसी शिक्षा पर ज़ोर दिया जो भारतीय संस्कृति के सद्गुणों और मूल्यों पर केन्द्रित हो. वास्तव में, उस जगह का वातावरण मुझे उन प्राचीन भारतीय आवासीय विद्यालयों-गुरुकुलों- की याद दिलाता था, जिनके बारे में हमने पढ़ा है. मैंने कलाक्षेत्र में रहवासी विद्यार्थी के तौर पर आठ साल (1989-1996) बिताए.

कलाक्षेत्र अलग तरह का स्कूल था. दिन की शुरुआत प्रात:काल की प्रार्थना से होती थी जो सिल्लियों से पटी और पेड़ों से घिरी हुई एक गोलाकार खुली जगह में होती थी. इस जगह को तपोवन कहा जाता था, ताकि जंगलों में तप करते साधुओं के जैसे वातावरण का आह्वान किया जा सके. रोचक बात यह थी कि तपोवन विभिन्न धर्मों की प्रार्थनाओं से भर जाता था- शमनो मित्र: शम वरुण:, बिस्मिल्लाहिर्रह्मनिर्रहीम, और ओ हिडन लाइफ.

हम फूस के छप्पर वाली कक्षाओं में ज़मीन पर पालथी मारकर या कभी-कभी पेड़ों के नीचे बैठते थे. कक्षाओं को प्राकृतिक वायु-संचार को ध्यान में रखकर बनाया गया था जिससे हमें चेन्नई की उमस वाली गर्मियों में भी पर्याप्त राहत मिलती थी. कलाक्षेत्र ठीक समुद्र किनारे स्थित है और वहाँ लगातार समीर बहती रहती है और साथ में होती है लहरों की आवाज़. जब हमने शुरुआत की थी तब हम पूरी स्कर्ट और ब्लाउज़ पहनते थे, और केवल आठवीं के बाद ही हम पावाड़ै-दावणि (आधी साड़ी) पहनने के “हकदार” बने जो तमिलनाडु की पारम्परिक पोशाक है. लड़के कुर्ता-पायजामा पहनते थे. शिक्षक बेहद मित्रवत और स्नेही थे; तथा शारीरिक दण्ड की अनुमति नहीं थी. विद्यार्थी विभिन्न संस्कृतियों, परम्पराओं और पृष्ठभूमियों से आए थे, पर वे सभी बिना किसी झिझक और पूर्वाग्रह के एक-दूसरे के साथ दोस्ताना तरीके से मिलते-जुलते थे.

हालाँकि बेसेन्ट अरुन्डेल एक नियमित सीबीएसई (सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सेकेन्डरी एजुकेशन) स्कूल था, पर वहाँ नृत्य व संगीत पर बहुत ज़ोर दिया जाता था. अधिकांश छात्र स्कूल के बाद एक घण्टे के लिए कलाक्षेत्र फाइन आर्ट्स कॉलेज जाकर वहाँ उपलब्ध कई ललित कला पाठ्यक्रमों- चित्रकला, गायन, मृदंग, बाँसुरी, वायलिन या वीणा वादन -- में से किसी में भाग लेते थे. मैंने भरतनाट्यम में पाँच वर्षीय प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम पूरा किया और दो साल तक शास्त्रीय गायन सीखा.

कलाक्षेत्र में हर साल एक कला उत्सव (कई अन्य उत्सवों के अलावा) आयोजित किया जाता था, जिसके दौरान प्रसिद्ध नर्तक और संगीतकार कलाक्षेत्र के भव्य सभागृह में अपनी प्रस्तुति देते थे. खासतौर पर यादगार होते थे कलाक्षेत्र नृत्यनाटक जो खुद श्रीमती रुक्मिणी देवी द्वारा रचे जाते थे और संस्थान के प्रशिक्षित नर्तकों और संगीतकारों द्वारा प्रस्तुत किए जाते थे. कलाक्षेत्र में कलाओं पर ज़ोर दिए जाने से हमारे भीतर भारत की कलाओं और शिल्पों के प्रति एक गहरा और स्थाई आदर का भाव विकसित हुआ. मैंने सच में उस मौलिक भारतीय सौन्दर्यबोध को सराहना सीखा जो सौन्दर्य और सहजता का मिश्रण है. इस सब के तथा और बहुत कुछ के लिए भी मैं कलाक्षेत्र की ऋणी हूँ.

स्कूल की पढ़ाई पूरी होना
बारहवीं के अन्त समय में, जब मेरे दोस्त इंजीनियरिंग और चिकित्सा के क्षेत्र में जाने के लिए आवेदन भरने में व्यस्त थे, तब मैं हमारे होस्टल परिसर में स्थित एक विशाल फैले हुए वृक्ष के नीचे खयालों में खोई हुई बैठी थी.

“मुझे क्या करना चाहिए?”

“मैं क्या करना चाहती हूँ?”

पर एक बात के बारे में मैं बिलकुल आश्वस्त थी कि न तो मुझे इंजीनियरिंग करना था, न ही कम्प्यूटर के क्षेत्र में जाना था. ये सब तो बहुत उबाऊ थे....

मुझे जीव विज्ञान तो बहुत प्रिय था (उसके हमारे शिक्षक बहुत अच्छे थे), पर खून देखना नहीं. अत: चिकित्सा-विज्ञान भी मेरे लिए नहीं था.

इसके आगे कुछ साफ तय कर पाना आसान नहीं था क्योंकि मुझे कई सारी चीज़ों में रुचि थी.

शायद जीवविज्ञान में बीएससी?

“पर तीन साल के लम्बे समय तक कौन बैठकर पढ़ेगा? और बीएससी का मैं क्या करूँगी?” मुझे हस्तकलाएँ पसन्द थीं और अपने हाथों (और पैरों) से कुछ भी करने में मज़ा आता था!

“संगीत, नृत्य, चित्रकला?”

“और रंगमंच? हाँ!!”

पर क्या मैं उसमें अच्छी थी?

“शायद मुझे वकील बनना चाहिए...”
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Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) , Noida

 
 आपने इस किताब का अंश प्रकाशित करके हम महानगर में रहने वालों पर बड़ा उपकार किया है. हम सब जानवरों की तरह एक परंपरा में पिसते जाने के लिये बाध्य हो गये हैं. ऐसे में संयुक्ता की यह किताब आश्वसत करने वाली है कि रास्ते अभी बंद नहीं हुये हैं. 
   

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