पुस्तक अंश | संयुक्ता | सीखना दिल से
पुस्तक अंश
सीखना दिल से
संयुक्ता
प्रकाशकः एकलब्य, ई-10 बीडीए कॉलोनी, शंकर नगर, शिवाजी नगर, भोपाल 462 016
www.eklavya.in
मूल्यः 80.00 रुपये
एक यात्रा की शुरुआत
हर शुरुआत वास्तव में शुरुआत नहीं होती. पूर्व के अनुभव भविष्य के पथ-प्रदर्शक बन
जाते हैं. जो कुछ हम कर रहे होते हैं वह बहुत हद तक पूर्व में प्राप्त हुए किसी
अनुभव के कारण होता है. मेरे मामले में भी यह एक महत्वपूर्ण कारक था.
कलाक्षेत्र की याद
मेरे माता-पिता, दोनों समाजशास्त्र में प्रशिक्षित थे. पिता नरेन्द्रनाथ, दिल्ली
में बैंक की नौकरी छोड़ देने के बाद, मेरी माँ उमाशंकरी और मेरे साथ दादा-दादी के घर
हैदराबाद आ गए. मेरे पिता ने लोकायन और आन्ध्र प्रदेश नागरिक स्वातंत्र्य समिति (एपीसीएलसी)
आदि संगठनों से जुड़कर सामाजिक कार्यों में भाग लेना शुरु कर दिया. जबकि मेरी माँ ने
लोक उद्यमिता संस्थान, उस्मानिया विश्वविद्यालय में काम किया.
हैदराबाद में छह साल रहने के बाद मेरे माता-पिता के मन में अपनी सामाजिक गतिविधियों
को किसी गाँव में आधारित करने और ज़मीनी स्तर पर काम करने का विचार आया. किसान बनने
और सामाजिक क्षेत्र में काम करने के लिए वे मेरे दादाजी, छोटी बहन लक्ष्मी और मुझे
साथ लेकर आन्ध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले में स्थित हमारे पुश्तैनी गाँव
वेंकटरामपुरम् आ गए. तब से मेरे माता-पिता ने विभिन्न उद्देश्यों के लिए कई क्षेत्रों
में काम किया है, जिनमें प्रमुख हैं कृषि, जल प्रबन्धन, दलितों के भूमि अधिकार, और
छुआछूत का मुद्दा. पिछले पन्द्रह सालों के दौरान हम अपनी अधिकांश भूमि पर जैविक खेती
करने में सफल हो गए हैं. अब हम नियमित जैविक आम, धान, गन्ना, मूंगफली, नारियल और
मौसमी सब्ज़ियाँ उगाते हैं.
मेरे माता-पिता के गाँव आ जाने के थोड़े ही समय बाद मैंने चेन्नई के बेसेन्ट
अरुन्डेल सीनियर सेकेण्डरी स्कूल (बीएएसएस) में रहवासी विद्यार्थी के तौर पर दाखिला
लिया. यह स्कूल, भरतनाट्यम (भारतीय शास्त्रीय नृत्य) के प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान,
कलाक्षेत्र फाउण्डेशन से सम्बद्ध है. कलाक्षेत्र प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना
श्रीमति रुक्मिणी देवी अरुन्डेल द्वारा स्थापित किया गया था. उन्होंने भरतनाट्यम की
अनोखी शैली विकसित की और कलाक्षेत्र शास्त्रीय नर्तकों और संगीतकारों के लिए आश्रय
बन गया. रुक्मिणी अत्ताई बच्चों को प्रेम करती थीं और उन्होंने सीखने के लिए
तनाव-मुक्त व दोस्ताना माहौल पर तथा ऐसी शिक्षा पर ज़ोर दिया जो भारतीय संस्कृति के
सद्गुणों और मूल्यों पर केन्द्रित हो. वास्तव में, उस जगह का वातावरण मुझे उन
प्राचीन भारतीय आवासीय विद्यालयों-गुरुकुलों- की याद दिलाता था, जिनके बारे में हमने
पढ़ा है. मैंने कलाक्षेत्र में रहवासी विद्यार्थी के तौर पर आठ साल (1989-1996)
बिताए.
कलाक्षेत्र अलग तरह का स्कूल था. दिन की शुरुआत प्रात:काल की प्रार्थना से होती थी
जो सिल्लियों से पटी और पेड़ों से घिरी हुई एक गोलाकार खुली जगह में होती थी. इस जगह
को तपोवन कहा जाता था, ताकि जंगलों में तप करते साधुओं के जैसे वातावरण का आह्वान
किया जा सके. रोचक बात यह थी कि तपोवन विभिन्न धर्मों की प्रार्थनाओं से भर जाता
था- शमनो मित्र: शम वरुण:, बिस्मिल्लाहिर्रह्मनिर्रहीम, और ओ हिडन लाइफ.
हम फूस के छप्पर वाली कक्षाओं में ज़मीन पर पालथी मारकर या कभी-कभी पेड़ों के नीचे
बैठते थे. कक्षाओं को प्राकृतिक वायु-संचार को ध्यान में रखकर बनाया गया था जिससे
हमें चेन्नई की उमस वाली गर्मियों में भी पर्याप्त राहत मिलती थी. कलाक्षेत्र ठीक
समुद्र किनारे स्थित है और वहाँ लगातार समीर बहती रहती है और साथ में होती है लहरों
की आवाज़. जब हमने शुरुआत की थी तब हम पूरी स्कर्ट और ब्लाउज़ पहनते थे, और केवल आठवीं
के बाद ही हम पावाड़ै-दावणि (आधी साड़ी) पहनने के “हकदार” बने जो तमिलनाडु की
पारम्परिक पोशाक है. लड़के कुर्ता-पायजामा पहनते थे. शिक्षक बेहद मित्रवत और स्नेही
थे; तथा शारीरिक दण्ड की अनुमति नहीं थी. विद्यार्थी विभिन्न संस्कृतियों, परम्पराओं
और पृष्ठभूमियों से आए थे, पर वे सभी बिना किसी झिझक और पूर्वाग्रह के एक-दूसरे के
साथ दोस्ताना तरीके से मिलते-जुलते थे.
हालाँकि बेसेन्ट अरुन्डेल एक नियमित सीबीएसई (सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सेकेन्डरी एजुकेशन)
स्कूल था, पर वहाँ नृत्य व संगीत पर बहुत ज़ोर दिया जाता था. अधिकांश छात्र स्कूल
के बाद एक घण्टे के लिए कलाक्षेत्र फाइन आर्ट्स कॉलेज जाकर वहाँ उपलब्ध कई ललित कला
पाठ्यक्रमों- चित्रकला, गायन, मृदंग, बाँसुरी, वायलिन या वीणा वादन -- में से किसी
में भाग लेते थे. मैंने भरतनाट्यम में पाँच वर्षीय प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम पूरा किया
और दो साल तक शास्त्रीय गायन सीखा.
कलाक्षेत्र में हर साल एक कला उत्सव (कई अन्य उत्सवों के अलावा) आयोजित किया जाता
था, जिसके दौरान प्रसिद्ध नर्तक और संगीतकार कलाक्षेत्र के भव्य सभागृह में अपनी
प्रस्तुति देते थे. खासतौर पर यादगार होते थे कलाक्षेत्र नृत्यनाटक जो खुद श्रीमती
रुक्मिणी देवी द्वारा रचे जाते थे और संस्थान के प्रशिक्षित नर्तकों और संगीतकारों
द्वारा प्रस्तुत किए जाते थे. कलाक्षेत्र में कलाओं पर ज़ोर दिए जाने से हमारे भीतर
भारत की कलाओं और शिल्पों के प्रति एक गहरा और स्थाई आदर का भाव विकसित हुआ. मैंने
सच में उस मौलिक भारतीय सौन्दर्यबोध को सराहना सीखा जो सौन्दर्य और सहजता का मिश्रण
है. इस सब के तथा और बहुत कुछ के लिए भी मैं कलाक्षेत्र की ऋणी हूँ.
स्कूल की पढ़ाई पूरी होना
बारहवीं के अन्त समय में, जब मेरे दोस्त इंजीनियरिंग और चिकित्सा के क्षेत्र में
जाने के लिए आवेदन भरने में व्यस्त थे, तब मैं हमारे होस्टल परिसर में स्थित एक
विशाल फैले हुए वृक्ष के नीचे खयालों में खोई हुई बैठी थी.
“मुझे क्या करना चाहिए?”
“मैं क्या करना चाहती हूँ?”
पर एक बात के बारे में मैं बिलकुल आश्वस्त थी कि न तो मुझे इंजीनियरिंग करना था, न
ही कम्प्यूटर के क्षेत्र में जाना था. ये सब तो बहुत उबाऊ थे....
मुझे जीव विज्ञान तो बहुत प्रिय था (उसके हमारे शिक्षक बहुत अच्छे थे), पर खून देखना
नहीं. अत: चिकित्सा-विज्ञान भी मेरे लिए नहीं था.
इसके आगे कुछ साफ तय कर पाना आसान नहीं था क्योंकि मुझे कई सारी चीज़ों में रुचि
थी.
शायद जीवविज्ञान में बीएससी?
“पर तीन साल के लम्बे समय तक कौन बैठकर पढ़ेगा? और बीएससी का मैं क्या करूँगी?” मुझे
हस्तकलाएँ पसन्द थीं और अपने हाथों (और पैरों) से कुछ भी करने में मज़ा आता था!
“संगीत, नृत्य, चित्रकला?”
“और रंगमंच? हाँ!!”
पर क्या मैं उसमें अच्छी थी?
“शायद मुझे वकील बनना चाहिए...”
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मेरे विचार एक व्यवसाय से दूसरे व्यवसाय की ओर छलाँग लगा रहे थे. “मैं किसमें अच्छी
हूँ? क्या है जिसमें मुझे सचमुच गम्भीरतापूर्वक जुटना चाहिए? किस व्यवसाय से अच्छा
पैसा मिलेगा? बढ़िया भविष्य कहाँ है? पर सबसे खास बात, मुझे वास्तव में क्या करना
अच्छा लगेगा?”
पेड़ के नीचे बैठे, मेरी ऐसी इच्छा हो रही थी कि स्वर्ग से कुछ पत्तियाँ दैवीय रूप
से आकर मेरे हाथ में गिरें, जिनपर मेरे सभी प्रश्नों के उत्तर लिखे हों. और फिर मैं
बस उठ खड़ी होऊँ, अपने कपड़ों से धूल झटकाकर दौड़ पड़ूँ कि “यूरेका!! मुझे हल मिल गया!!”
परन्तु ऐसा नहीं हुआ, और इससे भी बुरा यह कि यह तो बस शुरुआत थी, बर्फ की चट्टान का
सिर्फ ऊपरी सिरा. इस बात से मदद मिली कि कई दूसरे स्कूलों के रवैये के विपरीत, मेरे
भीतर यह बात नहीं बिठाई गई थी कि परीक्षाओं में बहुत ऊँचे अंक लाना और फिर दर्जनों
प्रवेश-परीक्षाओं में बैठना ही मेरा एकमात्र और सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए.
मेरे माता-पिता ने दुविधाओं के इस दौर में मेरी बातें सुनीं और हमारे बीच एक तरफ हर
व्यवसाय के अच्छे-बुरे पहलुओं और दूसरी तरफ मेरी इच्छाओं को लेकर बहुत सारी चर्चाएँ
हुईं. आखिरकार, उन्होंने सुझाया कि मैं एक साल की छुट्टी लूँ, घूमूँ और विकल्पों को
अच्छे से देखूँ. “आस-पास देखने” की प्रक्रिया के दौरान मैं अपनी रुचि के कुछ
क्षेत्रों में थोड़ा-बहुत वास्तविक कार्य भी कर सकती थी. इसके बाद मैं यह चुनाव कर
सकती थी कि अपना अन्नम और पप्पू (दाल-भात का रोज़मर्रा का भोजन) कमाने के लिए मैं
क्या करना चाहूँगी.
शानदार विचार था. इसी दिमागी अवस्था में मैंने राहुल एल्वैरेस द्वारा लिखी गई किताब
“फ्री फ्रॉम स्कूल” पढ़ी. राहुल भी दसवीं के बाद एक साल के लिए शैक्षिक पढ़ाई से
“छुट्टी” लेकर ऐसी गतिविधियों में सक्रिय रूप से जुट गया था जिनमें उसकी बहुत रुचि
थी. उसे जानवरों की दुनिया और सरीसृप परिवार- खासतौर पर साँपों से बहुत प्यार था.
सरीसृपों का व्यावहारिक और प्रायोगिक ज्ञान हासिल करने में हुए उसके सभी अनुभव इस
छोटी-सी किताब में बताए गए हैं. इस किताब से मुझे और भी प्रोत्साहन मिला और वह
“शुरुआती धक्का” मिला जिसकी मुझे बेहद ज़रूरत थी.
तो कोई शुरुआत कैसे करे? खिलाड़ी की तरह इधर-उधर का जायज़ा लिया जाए? मैंने ठीक यही
किया.
खेल-खेल में
तो जहाँ मेरी उम्र के दूसरे युवा लोगों ने कर्तव्यपूर्वक कॉलेजों और कक्षाओं में
दाखिला लिया वहीं मेरी पहली मंज़िल- जहाँ मेरी माँ मेरे साथ थी- अहमदाबाद थी.
सुदर्शन खन्ना अहमदाबाद में स्थित राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान (एनआईडी) में औद्योगिक
डिज़ाइन के प्राध्यापक हैं. पढ़ाते तो वे हैं ही, पर कुछ और करने के लिए भी समय निकाल
लेते हैं... वे बहुत बढ़िया खिलौने बनाते हैं! सुदर्शन जी ने खिलौने बनाने की
पारम्परिक भारतीय कला पर व्यापक तरीके से शोध किया है और भारत में तथा बाहर भी बच्चों
के लिए स्कूलों में कई कार्यशालाएँ संचालित की हैं. उन्होंने अन्ना विश्वविद्यालय,
चेन्नई में हुए पारम्परिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी सम्मेलन के दौरान भी खिलौने बनाने
की स्वदेशी कला पर एक कार्यशाला आयोजित की थी. उसी सिलसिले में मेरी माँ को उनके
बारे में पता चला था. माँ ने उनको पत्र लिखा और वे मुझे सिखाने को तैयार हो गए कि
खिलौने कैसे बनते हैं.
हम सुदर्शन जी के साथ लगभग दो हफ्ते तक रहे, और मैंने विभिन्न पदार्थों जैसे कागज़,
मिट्टी, नली, धातु आदि से विभिन्न प्रकार के भारतीय खिलौने बनाना सीखा. ये सरल दिखते
और प्रतीत होते हैं, पर इनको बनाने बैठिए तब आपको पता चलेगा कि “सरल” वास्तव में
कितना कठिन है. ये खिलौने अपने अनोखे दृश्य और ध्वनि प्रभाव तभी पैदा करते हैं जब
आप उन्हें एकदम सही ढंग से बनाएँ. इनको बनाने से विज्ञान की कुछ बुनियादी धारणाएँ
समझने में आपको मदद मिलती है. बनाने वाले की ज़रा-सी लापरवाही हुई नहीं, कि खिलौने
काम नहीं करेंगे. मैं उन्हें कहती हूँ -- सीधे-सरल पर ज़िद्दी खिलौने. ज़रा-सा ज्यादा
बड़ा छेद, केन्द्र से ज़रा-सा दूर हुआ छेद, ज़रूरत से ज़्यादा पतला या मोटा कागज़, ज़रा
ज़्यादा ही गीली मिट्टी- और आप मान लें कि आपके हाथ निराशा ही लगेगी. खिलौना अपना
करतब दिखाने से इन्कार कर देगा.
जब आप इन ज़िद्दी प्राणियों के मिज़ाज को समझना शुरु कर देते हैं तो आप खिलौने के उस
कारीगर की वाकई सराहना करते हैं जिसने यह समझ लिया होता है कि इन “नटखट बच्चों” से
कैसे काम करवाना है. इस तरह के अधिकांश खिलौने ग्रामीण भारत में खुद बच्चों द्वारा
सड़कों पर पड़े रद्दी माल और प्राकृतिक तौर पर सुलभ अन्य पदार्थों से बनाए जाते हैं.
विज्ञान की इस तरह की सहज समझ उन्हें किसने दी? क्या उन लोगों को इसका इल्म भी है
कि उनके पास ऐसी समझ है?
सुदर्शन जी की दो लड़कियाँ, सुरभि और गिरिजा (तब लगभग 12 और 10 साल की) तब से ही
खिलौने बनाने में उस्ताद थीं और वे मेरी शिक्षिका भी बन गईं. अक्सर, जब मैं
आश्चर्यचकित हो सोच रही होती थी कि मेरे बनाए हुए खिलौने ने काम क्यों नहीं किया,
सुरभि की तरफ से तुरन्त जवाब आता था, “यह बहुत मोटा हो गया दीदी!” कभी-कभी हम दोनों
ही किसी “पक्षी” से हरकत करवाने में असफल हो जाते, और तब हमें विशेषज्ञ की सलाह के
लिए सुदर्शन जी के पास जाना पड़ता. तब से हर साल नववर्ष पर खन्ना परिवार मेरे लिए
शुभकामना सन्देश के रूप में एक खिलौना भेजता आ रहा है!
अहमदाबाद प्रवास के दौरान हम प्रसिद्ध कैलिको वस्त्र संग्रहालय गए. यह संस्थान जीरा
साराभाई के दिमाग की उपज है, और यहाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बनाए जाने वाले
कपड़े की किस्मों का अतिउत्तम और दुर्लभ संग्रह उपलब्ध है, जिनमें से कुछ तो सत्रहवीं
शताब्दी जितनी पुरानी हैं. हमने मार्गदर्शक की मदद से उसका भ्रमण किया और वहाँ रखे
कपड़ों ने अपनी जटिल कारीगरी, रंगों और सुन्दरता से हमें मंत्रमुग्ध किया.
एक शाम हम गाँधीजी के साबरमती आश्रम गए जो आज एक गन्दे नाले की तरह बहने वाली
साबरमती नदी के किनारे स्थित है. आश्रम के शान्त वातावरण और गेट के बाहर स्थित सड़क
के कोलाहल में एकदम महसूस होने वाली विषमता है, जैसे वे दो अलग-अलग दुनिया हों,
एक-दूसरे से बेपरवाह. सन् 1915 में बना यह आश्रम भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के
दौरान कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है. नंगे पैरों के नीचे ठण्डे फर्श को महसूस
करना भर ही विनम्र बनाने वाला अनुभव था. हमने ऐसी कई वस्तुएँ भी देखीं जो तब दैनिक
उपयोग में आती थीं जब गाँधी जी आश्रम में रहते थे जैसे -- लिखने की मेज़, गद्दे,
बरतन और इनके साथ ही गाँधी जी की कुछ पाण्डुलिपियाँ, तस्वीरें और पत्र भी. मेरी आँखें
एक छोटे, बहुत ही प्यारे नीले रंग के मखमली बटुए पर पड़ी जिस पर एक फूल कढ़ा हुआ था.
यह गाँधी जी ने कस्तूरबा को भेंट किया था.
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अहमदाबाद से हम बड़ौदा आ गए जहाँ हम आनन्द कुमार के साथ रुके. आनन्द अंकल मेरी माँ
सहित कई लोगों के लिए एक मित्र-चिन्तक-मार्गदर्शक की तरह हैं और इसलिए मेरी माँ ने
सोचा कि अच्छा होगा यदि उनकी सूझबूझ का भी कुछ लाभ उठाया जाए. हमेशा बेदाग स्वच्छ,
इस्त्री किया हुआ कुर्ता पहनने वाले आनन्द उन सर्वाधिक खुशमिज़ाज लोगों में से एक
हैं जिनसे मैं मिली हूँ. मेरी कैरियर योजनाओं के बारे में हमारी उनसे लम्बी बातचीत
होती रही. ऐसी ही एक बातचीत की मुझे जीवन्त याद है. हम बैठे हुए चाय पी रहे थे, वे
बोले, “यदि आप दो गिलास लें, एक पानी से भरा और एक खाली.....तथा मान लें कि एक पूरे
साल तक आप छह घण्टे रोज़ाना एक गिलास से दूसरे गिलास में पानी डालते रहेंगे. यह आसान
बात है. पर आप वह सब जान जाएँगे जो आपके, गिलास के, पानी के और एक गिलास से दूसरे
में पानी डालने की क्रिया के बीच घटित होता है. हो सकता है कि आप इस ज्ञान को शब्दों
में न व्यक्त कर पाएँ, पर तब तक आप बहुत कुछ सीख चुके होंगे. अत: आप कोई भी कार्य
करें, उसे पूरी तरह से और समग्रता में समझने के लिए आपको एक निश्चित अवधि और
व्यवस्थित प्रयास की ज़रूरत होती है. फिर आप तय कर सकते हैं कि वह काम जारी रखना है
या बन्द कर देना है.” यह बहुत महत्वपूर्ण सलाह थी और तब से मैंने इसे प्रयोग में
लाने की कोशिश की है.
जिस दिन मैं बड़ौदा के एम.एस. विश्वविद्यालय जा रही थी, मेरी माँ ने मुझे गेट पर ही
छोड़ दिया और कहा कि मैं सारी ज़रूरी जानकारी लेकर घर वापस आ जाऊँ. अब मैं एकदम अकेली
थी और किसी को नहीं जानती थी. एक रहवासी स्कूल के संरक्षित वातावरण में बड़े होने के
बाद यह पहला मौका था जब किसी बड़े के साथ के बगैर एक नई जगह में कदम रखना था.
मैं एक कमरे में गई जो दफ्तर जैसा दिख रहा था. मैंने अपना परिचय देते हुए बताया कि
मैं संस्थान का परिसर देखना चाहती हूँ और उपलब्ध पाठ्यक्रमों के बारे में जानना
चाहती हूँ. फिर मैं एक विभाग से दूसरे विभाग में गई.
कुम्हारी, मूर्तिकला, ललित कला, दृश्य संचार आदि; छात्रों और शिक्षकों से मिली जो
कक्षाओं में काम कर रहे थे (चूँकि वह अवकाश का समय था, अत: उनके पास थोड़ा खाली समय
था) और कुछ विवरणिकाएँ तथा पाठ्यक्रम विवरण-पत्र इकट्ठे किए. मैं अपने दिन भर के
काम से खुश थी और घर वापस पहुँचने पर मैंने माँ को हर बात का सविस्तार ब्यौरा दिया.
दो दिन बाद हम बड़ौदा से मुम्बई के लिए निकले. चूँकि मैं मुम्बई में एक महीने रुकने
की योजना बना रही थी, अत: मेरी माँ ने मुझे उनकी मित्र रजनी बख्शी के घर छोड़कर गाँव
लौटने का निर्णय किया. रजनी आंटी एक स्वतंत्र पत्रकार हैं. वे द हिन्दु के लिए
“क्रियेटिव क्वैस्ट” स्तम्भ लिखती थीं. वे बापू कुटी की लेखिका भी हैं जो युवा
सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच एक लोकप्रिय किताब है. मेरे मुम्बई में कुछ समय रुकने
का उद्देश्य था अलग-अलग व्यवसायों के लोगों से परिचित होना और समझना कि वे अपना
जीवन कैसे जीते हैं. इस तरह के कार्यक्रम के लिए मुम्बई से बढ़िया और कौन-सा स्थान
हो सकता है- भारत का सबसे विविध और सर्वदेशीय नगर.
रजनी आंटी के साथ रुकना विशुद्ध आनन्द था. उनके बारे में सबसे अच्छी बात है उनकी यह
क्षमता कि वे अपने आप को पूरी तरह रूपान्तरित कर किसी के भी साथ उसके स्तर पर
पहुँचकर सम्बन्ध स्थापित कर लेती हैं. एक पल वे किसी खिलखिलाते बच्चे को दुलार रही
होंगी तो अगले ही पल किसी दोस्त के साथ स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं पर एक गहरी
बौद्धिक चर्चा में मशगूल हो जाएँगी. बहुत अच्छी अभिनेत्री होने के कारण वे हमेशा
आपको जमकर हँसाती रहती हैं. मुम्बई में जहाँ भी मैं गई, उसकी व्यवस्था करने में
उन्होंने मदद की.
हम कर्नाटक संगीत की प्रसिद्ध गायिका अरुणा साईराम से मिले. मेरी माँ ने उन्हें
नर्तिका-नृत्यनिर्देशिका चन्द्रलेखा की रचना “भिन्न प्रवाह” में प्रस्तुति देते देखा
था. माँ ने कहा कि वे उनकी प्रस्तुति से इतनी भावुक हो गईं कि उनके पास जाकर उनको
गले लगा लिया. अम्मा की बड़ी इच्छा थी कि मैं अपने मुम्बई प्रवास के दौरान उनसे मिलूँ.
मेरे खुद को अलग ढंग से शिक्षित करने के इस पूरे विचार से अरुणा जी उत्साहित थीं और
उन्होंने अपनी नित्यचर्या तथा रियाज़, जो गम्भीर शास्त्रीय संगीतज्ञों के लिए ज़रूरी
कड़ा अभ्यास है, के बारे में मुझसे बात की. उन्हें हर प्रकार का संगीत पसन्द था --
पॉप, रॉक, पश्चिमी शास्त्रीय संगीत, फिल्म संगीत, जैज़ सभी! वे स्वर संवर्धन के लिए
प्रशिक्षण लेने जर्मनी जा चुकी थीं. उनके पास एक समृद्ध और गहरी आवाज़ है और अपनी एक
मिश्र-संगीत (फ्यूज़न) प्रस्तुति में उन्होंने जर्मन संगीतकारों के साथ काम भी किया
है.
अपने स्वर संवर्धन प्रशिक्षण को समझाते हुए वे बोलीं, “बाथरूम के भीतर गाते समय जो
आत्मविश्वास मुझमें होता था, वैसा कभी श्रोताओं के सामने गाते समय नहीं होता था.”
क्या गायक वाकई मानते हैं कि बाथरूम में उनका गाना बेहतर होता है? मैं सोचती थी कि
यह आमतौर पर गैर गायकों द्वारा कही जाने वाली बात है!
“मैं अपनी आवाज़ में वह आत्मविश्वास पैदा करना चाहती थी,” उन्होंने आगे कहा.
उन्होंने मुझसे गाने को कहा. प्रसिद्ध गायिका अरुणा साईराम मुझसे गाने को कह रही
थीं!
“मैं क्या गाऊँ?” पर मेरा हृदय पहले ही अपनी ताल देने लगा था.
“कुछ भी-जो भी तुम्हें ठीक लगे,” वे बोलीं.
“शास्त्रीय, अर्धशास्त्रीय, फिल्मी.....?”
“प्रत्येक का एक गीत सुनाओ,” कहते हुए वे हँस दीं.
मैंने कल्याणी राग में एक त्यागराज कृति गाई, एक साईं भजन गाया और “दिल है कि मानता
नहीं” फिल्म का शीर्षक गीत गाया. जब उन्होंने यह कहा कि उन्हें “दिल है कि मानता नहीं”
सबसे अच्छा लगा तो कह नहीं सकती कि मैंने खुद को रोमांचित अधिक महसूस किया या
शर्मिन्दा! तब से वे मुझे चेन्नई में अपनी सभी संगीत सभाओं के लिए निमंत्रण भेजती आ
रही हैं.
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चित्रकारी एक ऐसा शौक था जिसमें मुझे हमेशा मज़ा आया. मैं देखना चाहती थी कि एक
चित्रकार की ज़िंदगी कैसी होती है. मैं एक युवा व्यावसायिक चित्रकार प्रीति कन्नन
से मिली, जिनकी उम्र तीस के करीब थी. इतनी कम उम्र में ही वे भारत में और विदेश में
अपनी प्रदर्शनियाँ लगा चुकी थीं. हालाँकि हम पहली बार मिल रहे थे पर हम लोगों में
खूब जमी और मैंने उनके साथ दो दिन बिताए. वे बहुत ही ऊर्जावान हैं और उनकी रुचियों
में खाना बनाने से लेकर शरीर को चुस्त रखना और पढ़ना शामिल है. उनके पति रामगोपाल
वर्मा प्रोडक्शन के लिए काम कर रहे थे और कुछ काम से बाहर गए हुए थे. हम लोगों ने
बड़े मज़े में नई हिट फिल्म “रंगीला” के बारे में गपशप की.
वे अपने चित्रों पर काम कर रही थीं जो जल्द ही अमेरिका की एक कलादीर्घा में
प्रदर्शित होने वाले थे. चित्रों की इस श्रृंखला में कोई छवियाँ नहीं थीं. उनमें
ब्रश के स्पर्श से रचा गया रंगों का ऐसा तालमेल था जो गहराई का भ्रम पैदा करता था.
जब मुझे भी उनके कैन्वस के छोटे-से हिस्से को चित्रित करने का मौका मिला मैं तो
रोमांचित हो गई. उन्होंने मुझसे रंगों के बारे में बात की और दिखाया कि कैसे कुछ
खास रंग “भीतर जाते” प्रतीत होते हैं और कुछ “बाहर निकलते” से लगते हैं. उन्होंने
मुझे भारत और पश्चिम के कला-परिदृश्य पर अपने विचार बताए और यह समझाया कि एक शौकिया
कलाकार की तरह “संघर्ष” करने का क्या मतलब होता है.
“अमेरिका में हुई एक प्रदर्शनी में मैंने एक चित्र देखा. एक विशाल कैन्वस जो बस एक
छोटे-से सफेद तारे के अलावा पूरी तरह से काला पुता था, और उसे शीर्षक दिया गया था,
“एकाकी तारा”. और....... क्या तुम अनुमान लगा सकती हो कि उस पर कितनी कीमत की चिट
लगी होगी? 30,000 अमरीकी डॉलर! क्या तुम कल्पना कर सकती हो!” वे विस्मित स्वर में
बोल पड़ीं.
उन्होंने कहा कि यदि मुझे सचमुच में वह कला सीखने में दिलचस्पी हो तो वे चेन्नई के
अपने एक कलाकार मित्र से मेरा सम्पर्क करा देंगी और उन्होंने मुझे उस मित्र का फोन
नम्बर भी दिया.
किसी भी युवा की भाँति मुझे भी सितारों की दुनिया गुदगुदाती थी और मुम्बई उस दुनिया
की केन्द्र-स्थली थी. इसे मैं बिना देखे कैसे छोड़ सकती थी? तो हम निम्बस प्रोडक्शन
द्वारा निर्मित किए जा रहे किसी हिन्दी सीरियल की शूटिंग देखने के लिए एक स्टूडियो
गए. रजनी आंटी निर्माता को जानती थीं. जिस सेट पर सीरियल की शूटिंग चल रही थी उसमें
एक बाथरूम था, एक बैठक थी, एक पुलिस-स्टेशन था और एक जेल भी थी. सभी एक ही छत के
नीचे और साथ में घूमने वाली दीवारें थीं जो कुछ पलों में ही शयनकक्ष को जेल में बदल
सकती थीं. जो दृश्य उस दिन फिल्माया जा रहा था वह जेल के सेट पर था. निर्देशक अपने
तीन सहायकों के साथ एक अन्य कमरे में तीन कम्प्यूटरों के सामने बैठे थे. प्रत्येक
कम्प्यूटर ने अभिनेता को अलग-अलग कोणों से दिखाया और मुझे बताया गया कि दृश्य को
फिल्माने के बाद वे उस कोण को चुनेंगे जो सबसे बेहतर निकलकर आएगा. शॉट (दृश्य) के
हर पक्ष की लगातार निगरानी हो रही थी और अभिनेता हर पुनरावृत्ति (रीटेक) के साथ अपना
सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश कर रहा था. कभी वह अपने मनोभावों को समुचित रूप से नहीं
दर्शा पाता था और कभी अपने संवाद ही भूल जाता और कहता, “क्षमा करें, सर. एक और बार
सर.”
फिल्म पाकीज़ा का ट्रेन वाला दृश्य तथा मुगले आज़म के कुछ दृश्य इसी स्टूडियो में
फिल्माए गए थे. नकली ट्रेनें और नकली गाँव, वहाँ सब थे. बॉलीवुड के कई प्रसिद्ध
फिल्मी दृश्यों और अभिनेताओं के मूक गवाह. फिल्म को फिल्माना बड़ा भारी कार्य है
जिसमें प्रत्येक व्यक्ति -स्पॉट बॉय से लेकर मुख्य कलाकार- सही समय और स्थान पर अपना
योगदान देता है. यह विडम्बना है कि इतने कड़े श्रम के बाद आज के समय में निर्मित होने
वाली अधिकांश फिल्में बिलकुल घटिया स्तर की होती हैं. और हाँ, टिकिट खिड़की (बॉक्स
ऑॅफिस) पर फिल्म के असफल हो जाने का जोखिम तो सदा रहता ही है. हमने इस अनुभव के लिए
निर्माता को धन्यवाद दिया और वापस रवाना हो गए.
“क्या मैं तुम्हारे लिए आमिर खान के साथ मिलने का समय तय कर दूँ?” फोन हाथ में उठाए
हुए रजनी आंटी ने पूछा जैसे अगले ही पल आमिर खान लाइन पर होगा!
मैं इतनी ज़्यादा रोमांचित और चिन्तित थी कि मैं कुछ कह ही नहीं पाई. “हे भगवान! मैं
क्या करूँगी? मैं उससे क्या कहूँगी?”
“दुर्भाग्य! वह विदेश गया हुआ है,” ज़ोर से फोन नीचे रखते हुए आंटी बोलीं.
“वाकई? दुर्भाग्य है,” मैंने कहा, हालाँकि मैंने राहत की साँस ली.
इस घटना के कई दिन बाद तक मैं कल्पना करते हुए अपने मन में अपने स्वप्न-नायक से
मिलने के दृश्य का अभिनय करती रही.
एक दिन रजनी आंटी ने अपना “प्राचीन” टाइपराइटर निकाला और मुझे एक किताब दी-टाइपराइटर
सीखें. और इस तरह नियमित रूप से रोज़ एक घण्टा पाठों का अभ्यास करके मैं खुद से टाइप
करना सीखने लगी. वह बुनियादी कौशल, जिसकी विचारपूर्ण शुरुआत आंटी ने कराई, बहुत ही
उपयोगी रहा है.
मुम्बई ने मुझे कई बातों को पहली बार अनुभव करने का मौका दिया. मैंने दो नाटक देखे.
अँग्रेज़ी में “हैमलेट” जो प्रसिद्ध पृथ्वी थियेटर में खेला गया था (मुझे यकीन था कि
इस बन्दे हैमलेट का दिमाग कतई ठीक नहीं था!) और हिन्दी का एक हास्य नाटक जो नादिरा
बब्बर द्वारा निर्देशित किया गया था. मैं हिन्दुस्तानी संगीत की अनेक सभाओं में भी
गई और सभी में मुझे मज़ा आया. मुम्बई में ही मैंने पहली बार मैक्सिकन और चाइनीज़ खाना
खाया और हाँ बेहद गर्म बटाटा (न कि आलू) वड़ा तो खाया ही!
नसरीन फज़लभॉय, जो मुम्बई विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका हैं और दिल्ली
विश्वविद्यालय से मेरी माँ की मित्र हैं, ने मुझे अपने फार्म-हाउस आने के लिए
निमंत्रित किया, जो मुम्बई के निकट स्थित पर्वत स्थल लोणावला में है. यह बहुत ही
प्यारा अनुभव था. जब हम वहाँ छुट्टी मना रहे थे तो नसरीन आंटी ने मुझे मैक्रामे
(गाँठधार धागे का काम) के पहले पाठ पढ़ाए. उन्होंने मुझे कुछ विधियाँ सिखाईं, और
मैंने रजनी आंटी को उपहार के तौर पर देने के लिए दीवार पर टाँगने की एक छोटी-सी
कलाकृति बनाई.
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लोणावला से लौटने के बाद हमने सोचा कि मुम्बई संग्रहालय जाकर मुम्बई के इतिहास के
बारे में जानना अच्छा रहेगा. हमने कई अन्य चीज़ों के साथ ही कुछ तस्वीरें, पुरानी
मुम्बई की रेखाकृतियाँ तथा कुछ अन्य शिल्पकृतियाँ देखीं. मैं यह जानकर सच में
आश्चर्यचकित हुई कि आज की मुम्बई वास्तव में ऐसे द्वीपों का समूह है जो आपस में जुड़
गए और एक भूपिण्ड बन गया- मुम्बई शहर.
मुझे अपने मुम्बई प्रवास का हर क्षण प्यारा लगा.
महीने के अन्त में मेरे पिता आ गए और हम घर वापस आने के लिए चल दिए. हम एक सभा में
शामिल होने के लिए डहाणु में रुके जो महाराष्ट्र का एक छोटा-सा कस्बा है.
हर्षमन्दर, जो तब भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अफसर हुआ करते थे, ने एक छोटे
से आदिवासी गाँव में यह सभा बुलाई थी. मेरे पिता सहित विभिन्न क्षेत्रों के
“सामाजिक रूप से सजग” हर्षमन्दर के कई मित्रों और कुछ अन्य आईएएस अधिकारियों ने सभा
में भाग लिया. चर्चा का मुख्य विषय था- सूचना का अधिकार. अरुणा रॉय और निखिल डे, जो
मज़दूर किसान शक्ति संगठन के अगुआ हैं, ने ब्यौरेवार और बड़ा ही रोचक विवरण दिया कि
किस तरह वे पहली बार गाँवों में गए और गाँव वालों को यह जानने के अधिकार की माँग
करने के लिए लामबन्द किया कि गाँवों के सामाजिक कल्याण के लिए आबंटित की जा रही
सारी राशि और संसाधन कहाँ गायब हो जा रहे हैं. उन्होंने जन सुनवाइयों के किस्से भी
सुनाए जिनमें सम्बन्धित सरकारी अधिकारियों को उत्तरदाई ठहराया गया और उन्हें गाँव
वालों के सवाल झेलने पड़े.
डहाणु खुद भी एक क्रान्ति का केन्द्र रहा है. यहाँ प्रदीप प्रभु और शिराज़ बलसारा की
अगुआई में काश्तकारी संगठन दो दशकों से भी ज़्यादा समय से लगातार काम कर रहा है ताकि
इस क्षेत्र के आदिवासी अपने वन संसाधनों पर नियंत्रण पा सकें.
सभा में इसी तरह के संगठनों से आए कुछ व्यक्तियों ने भी अपने अनुभव बाँटे. सभा की
अध्यक्षता श्री एस.आर. शंकरन ने की जो बड़े ही विनीत सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और
कार्यकर्ता हैं. उन्होंने कई दशकों तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के
सशक्तीकरण के लिए काम किया था. इतने निस्वार्थ और पूरी तरह से समर्पित लोगों के बीच
बैठकर उनको देखना अपने आप में मेरे लिए एक अद्भुत मौका था. हर व्यक्ति अपने-अपने
कार्यक्रमों की योजना बनाकर अपने ढंग से काम कर रहा था, लेकिन सभी एक दूसरे से
प्रेरणा लेते रहते थे.
“क्या तुम मेरे साथ चलोगी? मुझे कुछ मदद चाहिए,” तेज़ी से आगे बढ़ते हुए शिराज़ आंटी
ने पूछा.
जब हम गाँव की एक झोंपड़ी पर पहुँचे, उन्होंने मुझे बताया कि उसमें अस्सी पार उम्र
का एक वृद्ध आदमी रहता था जिसकी ट्रेन में चढ़ते समय गिरने से हड्डी टूट गई थी. उसे
पास के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था और उन्हें उसकी पिछली चिकित्सकीय
रिपोर्टों की ज़रूरत थी. हमें उस छोटी-सी झोंपड़ी में उन रिपोर्टों को ढूंढना था.
जैसे ही हमने वह कमज़ोर दरवाज़ा खोला, तो हम एक दूसरी ही दुनिया में पहुँच गए. ऐसा
लगता था कि यह वृद्ध आदमी बहुत ज़्यादा सक्रिय था और हमेशा कुछ न कुछ करता रहता था.
निश्चित ही यह हड्डी टूटने वाला प्रसंग भी इस बात का सबूत था. उसका कमरा बहुत साफ
और व्यवस्थित था. वहाँ एक खटिया थी और एक दीवार पर मढ़ी हुई उसकी एक पुरानी
श्वेत-श्याम तस्वीर टँगी थी. इतना ही नहीं, उसने कैलेण्डरों में से काटकर गाँधीजी,
इन्दिरा गाँधी, राधाकृष्णन, ईसा और आधे चाँद व सितारे के साथ बने एक मकबरे की
तस्वीरें भी मढ़वाई हुई थीं.
हम जोश के साथ उन रिपोर्टों की खोज में लग गए. हमने उसकी पेटी बाहर निकाली और उसके
कपड़ों व किताबों के नीचे देखा. उसकी पेटी में रखी हुई ढेर सारी पुरानी किताबों को
देखकर लगा कि वह काफी पढ़ाकू किस्म का व्यक्ति है. आधा घण्टे के बाद, हम तलाश छोड़ने
ही वाले थे क्योंकि हम तब तक भी रिपोर्टों का पता नहीं लगा पाए थे. यह व्यक्ति तो
इतना व्यवस्थित प्रतीत होता है! क्या उसने अपनी रिपोर्टें सम्हालकर नहीं रखी होंगी?
और शिराज़ आंटी को वे मिल गईं. एक खाली “फ्रूटी” का पिचका हुआ डिब्बा. उसके अन्दर,
सफाई से मुड़ी हुई, चिकित्सकीय रिपोर्टें रखी हुई थीं.
डहाणु से मैं हमारे गाँव वापस आ गई और साथ में मेरे सिर पर मँडराता हुआ “आगे क्या”
का बड़ा-सा बादल था.
द स्कूल- केएफआई
जैसा कि नाम से पता चलता है “द स्कूल” का सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान बनने का इरादा
है. “द स्कूल” एक गैर आवासीय संस्था है और यह चेन्नई में अड्यार के विस्तृत
थियोसॉफिकल सोसायटी परिसर के सामने स्थित है. “द स्कूल” बीसवीं सदी के प्रसिद्ध
दार्शनिक और चिन्तक जे. कृष्णमूर्ति द्वारा स्थापित इस तरह की कई संस्थाओं में से
एक है. इन स्कूलों में शिक्षण और पढ़ाई जे. कृष्णमूर्ति के शिक्षा सम्बन्धी विचारों
पर आधारित है तथा इनका ज़ोर व्यक्तित्व के विकास पर है.
जेके, जैसा कि अभी भी चर्चाओं में लोकप्रिय अन्दाज़ में कृष्णमूर्ति को कहा जाता है,
मानते थे कि शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए बच्चों में स्वतंत्र सोच की क्षमता जगाना
और उन्हें इस तरह तैयार करना कि वे दुनिया की चुनौतियों का संवेदनशीलता,
बुद्धिमत्ता और मानवोचित ढंग से सामना कर सकें. कृष्णमूर्ति शिक्षण केन्द्रों में
एक ऐसा परिवेश बनाने पर ज़ोर दिया जाता है जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी दोनों लगातार
संवाद, जाँच-पड़ताल और चर्चा द्वारा एक साथ मिलकर सीखने की प्रक्रिया से गुज़रते हैं.
इसलिए विद्यार्थियों को आत्मविश्लेषण करने तथा निडरता से प्रश्न पूछने के लिए
प्रोत्साहित किया जाता है. शिक्षण के तरीके बहुत सृजनात्मक हैं और शिक्षक लगातार
नए-नए तरीके विकसित करते रहते हैं ताकि विद्यार्थियों को रोज़मर्रा के विषय रोचक
लगें.
स्कूल के एक शिक्षक, अनन्त पद्मनाभन का मेरी माँ से मिलना हुआ और उन्होंने माँ को
एक उच्च शिक्षा कार्यक्रम (प्रोग्राम फॉर हायर एजुकेशन- पीएचई) के बारे में बताया
जो वे लोग शुरु करने की योजना बना रहे थे. और मेरे माता-पिता के इस सुझाव पर ही कि
मुझे इस कार्यक्रम के बारे में और पता लगाना चाहिए, मैं जून 1996 में “द स्कूल” आई.
दफ्तर अँग्रेज़ों के ज़माने के बड़े-से भवन में था. एक कमरे में प्राध्यापक गौतम बैठे
थे, जो दुबली-पतली काया के गोरे व्यक्ति थे. उनके सिर पर बाल नहीं थे तथा चेहरे पर
एक मित्रवत मुस्कान थी. उनके दफ्तर के दरवाजे़ खुले हुए थे ताकि प्राकृतिक रोशनी
भीतर आ सके और हवा का संचार हो सके, पर उनके खुले होने से तुरन्त ही मुझे यह
अनुभूति मिली कि मेरा वहाँ स्वागत है. हमने पीएचई कार्यक्रम के बारे में लम्बी
बातचीत की. “वाह! यह सब काफी रोचक है”, श्री गौतम के सारा विवरण समझा चुकने के बाद
मैंने सोचा.
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श्री गौतम के अनुसार पीएचई, “आत्मनिर्भर” विद्यार्थियों के लिए बारहवीं के बाद खुद
को शिक्षित करने का एक मौका था. स्कूल के द्वारा तैयार किए गए एक विवरण-पत्र में
कार्यक्रम के विस्तृत क्षेत्रों को समझाया गया है:
क्षेत्र 1: दार्शनिक- कृष्णमूर्ति की शिक्षाओं की रोशनी में यह समझ विकसित करना कि
मनुष्य होने का क्या मतलब है. बातचीत और अध्ययन से तथा कृष्णमूर्ति की वार्ताओं व
संवादों की वीडियो रिकॉर्डिंगों को देखकर व सुनकर इस क्षेत्र की विस्तृत जानकारी
हासिल की जाती है. धार्मिक और दार्शनिक सामग्री के पूरक अध्ययन को भी प्रोत्साहित
किया जाता है.
क्षेत्र 2: वैयक्तिक और समकालीन महत्व के क्षेत्रों में काम करना- विद्यार्थी को
उचित साधनों जैसे अध्ययन, प्रशिक्षण, भ्रमण और प्रदर्शन द्वारा अपनी रुचि के चार या
पाँच अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ना होगा और काम करना होगा. इन रुचियों को विस्तार से
देखने का तरीका विषय पर तथा उस गहराई पर निर्भर करता है जहाँ तक विद्यार्थी जाने की
इच्छा रखता है. अध्ययन के इस मार्ग का मकसद है कि छात्र अपनी गहरी रुचियों और
अनुकूल कार्यक्षेत्रों के मार्ग पहचाने तथा सिर्फ जीविका कमाने तक सीमित न रहकर
उससे आगे जाने की प्रेरणा हासिल करे.
क्षेत्र 3: छात्र को पत्राचार (दूरस्थ शिक्षा) द्वारा अपनी पसन्द के विषय में
स्नातक डिग्री पूरी करना होगी- यह पढ़ाई छात्रों को स्वयं खोजे गए साधनों द्वारा
पूरी करना होगी जिसके लिए स्कूल द्वारा सुझाव दिए जाएँगे. पर स्कूल शैक्षिक योगदान
की कोई सीधी ज़िम्मेदारी नहीं लेता.
रोचक... पर तीन साल के लिए? मैं स्कूल में रहते हुए इतने लम्बे समय तक क्या करूँगी?
चूँकि मैंने प्रारम्भिक तौर पर “एक साल की छूट” का कार्यक्रम तय किया था, मुझे दो
बार सोचना पड़ा. हालाँकि यह नया पाठ्यक्रम बहुत कुछ उसी तर्ज़ पर था जैसा कि मैं करना
चाहती थी. पर समयावधि की समस्या थी. प्राचार्य ने मुझे इस बारे में सोचने को और दो
हफ्ते बाद अपना निर्णय बताने को कहा.
पीएचई की जिस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा खींचा वह यह कि स्कूल में पढ़ाए जा रहे मेरी
रुचि के क्षेत्रों जैसे चित्रकला, बुनाई और कुम्हारी में मुझे शिक्षकों से
प्रशिक्षण पाने का मौका था. क्या मैं तीन साल के कार्यक्रम के लिए प्रतिबद्ध न होते
हुए सिर्फ एक साल के लिए इस मौके का उपयोग कर सकती हूँ? गौतम ने कहा था कि यह सम्भव
है, पर तब इस तरह से “वे मेरे लिए ज़िम्मेदार नहीं होंगे.” ऐसा प्रतीत हुआ कि जब तक
मैं पीएचई कार्यक्रम में शामिल नहीं होती, स्कूल मुझे सक्रिय मार्गदर्शन प्रदान
करने के लिए वचनबद्ध नहीं होगा.
“मुझे दाखिला लेना चाहिए या नहीं?”
यह शब्दों में बताना सम्भव ही नहीं है कि उस समय यह एक निर्णय लेने में और सिर्फ इस
एक प्रश्न का उत्तर देने में मुझे कैसा महसूस हो रहा था. हालत यह थी कि “एक साल की
छुट्टी” का निर्णय पहले ही धारा के विपरीत तैरने जैसे था. पर तीन सालों तक इस ढंग
से चलना?
“मैं तीन साल करूँगी क्या? क्या मेरे पास करने को पर्याप्त होगा? क्या मैं वाकई कुछ
काम की चीज़ सीखूँगी?”
अन्दर गहरे में डर और असुरक्षा थी. इस अनजान, अकेली सड़क पर यात्रा करने का डर और इस
बात की असुरक्षा कि इस यात्रा के अन्त में क्या होगा. यदि मैं पीएचई में सम्मिलित
हुई, तो इसका मतलब था उसके प्रति प्रतिबद्धता, और डर तथा असुरक्षा से सीधे भिड़ना.
हर छात्र के लिए कैरियर बनाने हेतु ये कुछ सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक साल होते
हैं. क्या मैं इन सालों का जोखिम उठाने के लिए तैयार थी?
“क्या यह सही निर्णय है? क्या यह मेरे लिए अच्छा होगा?”
यह एक भयावह दशा थी. मैंने अपने माता-पिता और उनके कुछ मित्रों के साथ लगभग पन्द्रह
दिनों तक चर्चाएँ कीं. मैंने बहुत प्रार्थनाएँ कीं और एक-दो बार रो भी पड़ी क्योंकि
मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकती थी. अन्तत: दिया गया समय भी शेष होने को था, जब मुझे
श्री गौतम के पास जाकर उन्हें अपने निर्णय के बारे में बताना था. मैं उस रात सो
नहीं सकी. जब मैं अपने पलंग पर लेटी सोच रही थी, तभी मुझे अचानक हलकापन लगा और अपने
गालों पर ढलकते गर्म आँसुओं का एहसास हुआ. मैं मन ही मन मुस्कुराई. निर्णय हो गया
था. मैं दाखिला लूँगी.
जब छाछ को मथा जाता है, तो गाढ़ापन बिलकुल प्रारम्भ में ही शुरु हो सकता है, पर
मक्खन अचानक सामने आता है. मैं समझती हूँ कि कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ. मेरे विचारों
का मंथन इतने लम्बे समय से चल रहा था कि “मक्खन” अचानक सामने आ गया, और फिर मैंने
पीछे मुड़कर नहीं देखा.
मैंने चित्रकारी, नृत्य, बुनाई, इतिहास और भौतिकी से शुरुआत करने का निर्णय लिया और
इसके साथ ही इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) से जीव विज्ञान
(चूँकि मुझे जीव विज्ञान पसन्द था) में स्नातक डिग्री प्राप्त करना भी तय किया. मैं
अपने पुराने स्कूल बेसेन्ट अरुन्डेल गई, ताकि अपने शिक्षकों को इस निर्णय के बारे
में बता सकूँ. जो सबसे अच्छी प्रतिक्रिया मुझे मिली वह थी, “बढ़िया है...यह कुछ हटके
है. हमारी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं.” मेरे कुछ शिक्षक पत्राचार से डिग्री
प्राप्त करने के मेरे निर्णय से बहुत खुश नहीं थे क्योंकि मैंने स्कूल में हमेशा
अच्छे अंक हासिल किए थे, पर उन्होंने मेरे इस निर्णय के लिए मुझ पर भरोसा जताया.
परन्तु 12वीं कक्षा की मेरी शिक्षिका श्रीमती मालती अच्युत्तन ने मेरा बहुत समर्थन
किया. जब भी मैं अपने शिक्षकों से मिलने स्कूल जाया करती थी, तो वे हमेशा पूछती थीं
कि मेरा क्या चल रहा है. वे अक्सर मुझसे कहती थीं कि मैंने कुछ अलग चुनकर बहुत
अच्छा किया और वे कैरियर विकल्प व चयन के बारे में अपने विद्यार्थियों से बात करते
हुए उन्हें हमेशा मेरा उदाहरण (!) देतीं. उन्होंने यह भी कहा, “संयुक्ता मुझे ऐसा
लग रहा है कि एक दिन मैं तुम्हें टीवी पर देखूँगी या अखबार में तुम्हारे बारे में
पढ़ूँगी.”
14.06.2010, 16.37 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित
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| | Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) , Noida | |
| | आपने इस किताब का अंश प्रकाशित करके हम महानगर में रहने वालों पर बड़ा उपकार किया है. हम सब जानवरों की तरह एक परंपरा में पिसते जाने के लिये बाध्य हो गये हैं. ऐसे में संयुक्ता की यह किताब आश्वसत करने वाली है कि रास्ते अभी बंद नहीं हुये हैं. | |
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