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लुभाता इतिहास-पुकारती कला

पुस्तक अंश

लुभाता इतिहास-पुकारती कला

देव प्रकाश चौधरी

प्रकाशकः मेधा बुक्स,एक्स-11, नवीन शाहदरा,दिल्ली-32

मूल्य-100 रुपए

देव प्रकाश


कौन सुनाए, कौन सुनेगा-कथा मंजूषा की?

बूढ़ा आकाश कैलेंडर पर भरोसा नहीं करता. उसे लगता है, कल की बात है. सदियों से बह रही गंगा कुछ पल के लिए ही सही, यहां आकर ठहर जाती है. अंधेपन का एक से एक चेहरा देख चुके इस जनपद को आज भले ही अपने बीते कल में दिलचस्पी न रह गई हो, लेकिन इतिहास कविता बनकर अब भी गूंजता है यहां. अब भी बूढ़ी महिलाएं गाती हैं-
मंजोसा लिखबे रे मलिया धरम कत्तारे रे.
मंजोसा लिखबे रे मलिया तैंतीस कोट देव रे॥

तैंतीस करोड़ देवी-देवता! मंजोसा यानी मंजूषा. किसी गुणी आदमी से पूछिए, वह कहेंगे-ये उस जनपद का गीत है, जहां आस्था की नदी बहती रही है और उस नदी में जितने बूंद- उतने देवी-देवता. बात यहीं खत्म नहीं होती. मंजोसा की भी कथा है. कथा तो होगी ही. इस जनपद के बीते कल की. इस जनपद में बह रही गंगा की. इस जनपद में आकर अक्सर ठिठक जाने वाले बूढ़े आकाश की. यहां के लोगों की. सदियों पुरानी एक कलात्मक गाथा को लय और आकार देने की. लेकिन आज यहां किसे फुरसत है, जो रूक कर कथा सुने? फिर भी किसी न किसी घर से कोई न कोई आवाज बाहर निकलती ही है- बिषहर हर-हर बिषहरी माय.

कथा अंतहीन है. लोगों को यकीन न हो यह भी संभव है. लेकिन लोक में कुछ भी संभव है. यह लोक की ताकत है, जिसे हम और आप भी जानते हैं और यह जनपद भी. इसकी कथा जब शुरू हुई थी तो कुछ और थी, अब कुछ और है और आगे कुछ और हो जाएगी. फिर भी कथा है और इसे सुनाने वाले की यही इच्छा रहती है कि सुनने वाले धार्मिक विश्वास की, लौकिक आस्था की, वैज्ञानिक व्याख्या न करे. तो सुनिये कथा इस जनपद की....

कथा इस जनपद की यानी अंग जनपद की. किससे शुरु करें...यहां तक गंगा में बहकर आने वाले सूर्यपुत्र कर्ण से? गंगा में बहकर आने वाले अंधे, कामुक और विलक्षण कवि दीर्घतमा से, जिसे इतिहास ने महात्मा भी माना है? या फिर गंगा के रास्ते अपने पति की जिंदगी मांगने स्वर्ग गई सती बिहुला से? किससे शुरु होती है अंग जनपद की कथा, क्योंकि यहां समय की हथेली पर एक से एक जटिल रेखाएं हैं...और पता नहीं अंग को यह जटिलता अपना ऐतिहासिक सौंदर्य लगता है या फिर इतिहास की साजिश?

अंग! अब तक भव्य संबोधनों और विशेषणों के टीले पर खड़ा कर इतिहास हमेशा अंग से उसका हक छीनता आया है-महारथी सूर्यपुत्र कर्ण की नगरी अंग! सूर्य के अराधक कवि दीर्घतमा को आश्रय देने वाला देश अंग! सती बिहुला का ससुराल अंग! आगे बढ़ें तो रेशमी नगर अंग! महान स्वतंत्रता सेनानी तिलकामांझी के आंदोलन का साक्षी अंग!महान साहित्यकार शरतचंद की पसंदीदा जगह अंग! महानगायक किशोर के बचपन का जनपद अंग. गौरव के विशेषणों की कमी नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि आज भी अंग को खुद पर गर्व करने के बहाने ढूंढने पड़ते हैं.

कभी अंग प्राचीन भारत के 16 महा जनपदों में से एक था. इसका पहला उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है. बौद्ध ग्रंथो में भी अंग का नाम दर्ज है. महाभारत के अनुसार बिहार में आज के भागलपुर, मुंगेर,झारखंड के संथाल परगना का कुछ क्षेत्र और पश्चिम बंगाल का कुछ हिस्सा अंग प्रदेश के क्षेत्र थे. इस प्रदेश की राजधानी चंपा थी. बाद में महावीर कर्ण अंग के राजा बने. इतिहास के पास अंग के नाम और भी कई अध्याय हैं....साथ ही अंग से पूछने के लिए कई असुविधाजनक सवाल भी. सदियों से एक सवाल उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है- अंग! तुम सच-सच बतलाना छठी शताब्दी के पहले बिहुला और विषहरी के बीच चली लड़ाई में किसकी जीत और किसकी हार हुई थी? सब कहते हैं बिहुला अपने पति के प्राण वापस कर विषहरी से जीत गई थी. यह बात सच है तो तो फिर ये बताओ आज भी तुम्हारे यहां एक हारी हुई देवी विषहरी को क्यों पूजते हैं लोग? अंग की क्यों दुलारी है विषहरी?

विषहरी बड़ दुलरी!
कहां सोभे बाजू बंद-कहां टिकुली?
विषहरी बड़ दुलरी!
टूटी गैले बाजूबंद,गिरल टिकुली
फाटी गैले विषहरी माय के घघरी
विषहरी बड़ दुलरी!
जोड़ी देबै बाजूबंद,साटब टिकुली
सिबी देबै विषहरी माय के लाल घघरी!

कथा को सीने और सहेजने बैठेंगे, तो एक साथ कई कथाएं मिलेंगी, कई उपकथा और कई परिकथा भी. इन्हीं कथाओं में से कला की पगडंडी भी निकलती है. कथा के विस्तार से कला की पगडंडी पर पहला पड़ाव आता है-मंजूषा कला. लोक का लय कैसे रंगों से खेलता है, लोक की आस्था कैसे आकार पाती है और कैसे बच्चों की तुतलाहट और बुढ़ापे का अनुभव संसार एक साथ उल्लास की लहरें बनाती हैं, इसे जानना हो तो मंजूषा कला की लय से, रंग से और आकार से आपको दोस्ती करनी होगी. आपको यह जानकर भी सुखद आश्चर्य होगा कि अंग जनपद की इस कला की परिधि के बीच भी बैठी हैं विषहरी. लोक देवी विषहरी! यानी विष को हरण करनेवाली देवी-
विष होरे कल्याण कोरे ताई नाम विषेहोरी
(बांग्ला लोकोक्ति)

कहते हैं, शिव की मानस पुत्री है विषहरी. पांच बहनों में सबसे बड़ी है विषहरी, फिर मैना, दिति, जया और पद्मा. भगवान शिव की जटा से इनका जन्म होने की वजह से ही लोक में ये पांच देवियां शिव की मानस कन्या यानी मनसा के नाम से पुकारी जाती हैं-

पांचो बहिन कुमारी हे विषहरी!
खेले चार चौमास हे विषहरी!
वहां से चली भेली हे विषहरी!
कनुआ घर आवास हे विषहरी!
कनुआ के बेटा उत्पाती हे विषहरी!
लावा छिटी पड़ैंलकों हे विषहरी!
वहां से चली भेली हे विषहरी!
मलिया घर आवास हे विषहरी!
मलिया के बेटा उत्पाती हे विषहरी!
फूल छिटीं पड़ैलकों हे विषहरी!

(हे विषहरी देवी, विष को हरनेवाली मां! हमेशा खेल में व्यस्त रहनेवाली पांच कुमारी बहनों वाली देवी...आपका आवास किस घर में है? किसका बेटा शरारती है? किसने आपको भोग लगनेवाला लावा बिखेर दिया? आपका ठिकाना तो माली के घऱ में है. माली का बेटा तो बड़ा शरारती है. उसी ने आपका फूल बिखेर दिया?)
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ravindra vyas (ravindra.vyas@naidunia.com) indore

 
 इस किताब को पढ़ना ही होगा।  
   
 

Ashok Priyadarshi (ashok1001@hotmail.com) New Delhi

 
 देव प्रकाश जी की किताब लुभाता इतिहास: पुकारती कला के अंश को पढकर ऐसा लगा मानो आंखों के सामने कोई चलचित्र चल रहा हो. किताब में मंजूषा कला की कहानी इतनी सरल भाषा में आगे बढ़ती है कि पढ़ते हुए लगता है इससे सालों पुराना परिचय हो, जबकि यह मेरे लिए नई है. हमारे देश में कई ऐसी लोक कलायें है, जिसके बारे में कम लोग जानते हैं. मंजूषा ऐसी ही लोककला है. 
   
 

Dr. Deo Shankar Navin (deoshankar@hotmail.com) IGNOU, New Delhi

 
 मेधा बुक्स द्वारा प्रकाशित देव प्रकाश चैधरी की पुस्तक लुभाता इतिहास: पुकारती कला का एक छोटा अंश कौन सुनाए, कौन सुनेगा कथा मंजूषा की कई अर्थों में उच्च महत्त्व की लग रही है। इस सन्दर्भ में रविवार डॉट कॉम के सम्पादक और मेधा बुक्स के स्वामी का हिन्दी पाठक कृतज्ञ होगा कि उन्होंने लोक साहित्य एवं संस्कृति के भूले-बिसरे प्रसंगों से आज के पाठकों का सम्बन्ध जोड़ा।

इस पुस्तक का यह अंश रोचक एवं स्पष्ट तरीके से प्रस्तुत किया गया गया है। बहुत छोटी-सी जगह में बड़े वृत्तान्त की छाया यहाँ दिखाई देती है। वैसे तो इस पुस्तक का विषय एवं प्रस्तुति स्वयं में परिपूर्ण है, फिर भी पाँच वाक्यों की सम्पादकीय टिप्पणी इसके साथ दी गई होती तो यह प्रस्तुति कुछ और पाठक समुदाय को आकर्षित कर पाती। कृपया ध्यान देंगे कि यह महज सलाह है, निन्दा नहीं!

अतीत, विरासत, परम्परा, लोक, सम्वेदना आदि प्रसंगों से जुड़े इस तरह के विषयों पर आज के तंग-मिजाज समाज में पुस्तकों की बड़ी जरूरत है। मैं इस पुस्तक के लेखक, रविवार डॉट कॉम के सम्पादक और मेधा बुक्स के स्वामी के प्रति हिन्दी पाठक की ओर से कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ और इस पत्रिका के सौजन्य से पूरी पुस्तक पढ़ने की इच्छा व्यक्त करता हूँ।

देवशंकर नवीन, निदेशक - अनुवाद अध्ययन एवं प्रशिक्षण विद्यापीठ
इग्नू, नई दिल्ली 0.9868110994(मोबा.)
 
   
 

Sanjib Kumar Singh (kumarsinghsanjib@yahoo.co.in) National Museum,New Delhi

 
 After a long gap a beautiful creation on folk art came in the market. Deo Prakash is a dedicated researcher and creator himself.So his expression is not emotional but realistic.He has minutely detailed the art and folk lore and mind set of people of Anga region. I congratulate him for bringing such a nice publication before the audience.It will be a gift to creative mind. 
   
 

आनंद भारती (anandbharti@rediffmail.com) मुंबई

 
 इतिहास अपनी मूल प्रकृति में कभी उबाऊ नहीं होता । अगर उसे भाषा के रस में बांध दिया जाए तो वह कहानी उपन्यास की तरह मजा देने लगेगा। यह काम देव प्रकाश जी ने अपनी इस किताब में करके दिखा दिया। उन्होंने इतिहास और कला को कहानी की तरह बांधकर पाठकों के सामने रखा। बिहुला-विषहरी की कथा और मंजूषा कला के बारे में दुनिया पूरी तरह परिचित नहीं है, लोग इस किताब के माध्यम से जान जाएंगे। मैंने साठ के दशक में यानी स्कूल के दिनों में बिहुला-विषहरी नाच की अनगिनत रातें देखी हैं। वह ग्रुप मेरे गांव का ही था, जो बिहार-बंगाल और नेपाल में जाकर शो करता था। आज उसका कोई नामलेवा नहीं है, मगर देव प्रकाश जी ने अपनी किताब के माध्यम से एक बार फिर उन सारे दिनों, दृश्यों और अनुभवों की याद दिला दी...। 
   
 

ravindra tripathy (tripathi.ravindra@gmail.com) delhi

 
 हमारे देश में कई ऐसे लोक कलायें है, जिसके बारे में कम लोग जानते हैं. मंजूषा ऐसी ही लोककला है. देवप्रकाश जी की किताब इस कला के बारे में लोगों को जानकारी देनेवाली लगती है. 
   
 

गौतम मिश्रा बांका (बिहार)

 
 बेशक नई जानकरी.मंजूषा कला की कुछ तस्वीरें भी होती,तो अच्छा रहता.अफसोस कि बांका या भागलपुर में ये किताब नहीं मिल पाएगी..। 
   
 

नीरज पांडेय noida

 
 इतनी सरल और सरस भाषा में कला की कहानी आगे बढ़ती है कि पढ़ते हुए लगता है मंजूषा कला से सालों पुराना परिचय हो, जबकि ये कला मेरे लिए नई है. धन्यवाद. 
   
 

विकास मिश्र (vikas.anirudha@gmail.com) दिल्ली

 
 मंजूषा कला के बारे में देव प्रकाश जी की किताब किसी मील के पत्थर से कम नहीं है. किताब के अंश को पढकर ऐसा लगा मानो आंखों के सामने कोई चलचित्र चल रहा हो. अब तो बहुत जल्द इसे खरीदना भी पड़ेगा. पूरी किताब को पढने का लोभ संवरन नहीं कर पा रहा हूं. 
   

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