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पुस्तक अंश | अभिज्ञात | तीसरी बीवी

पुस्तक अंश

 

तीसरी बीवी

अभिज्ञात

 

तीसरी बीवी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशकः शिल्पायन, 10295, लेन नंबर 1, वेस्ट गोरखपुर, शाहदरा, दिल्ली-110032

मूल्यः 150.00 रुपये

 

 

सर्पदंश
शिखा पाण्डेय के लिए इंटर्नशिप एक चुनौती बन गयी थी. उसने सोचा भी न था कि डॉक्टरी का यह करियर उसे उस मुकाम पर पहुंचा देगा जहां उसे कठिन विकल्पों में से ही एक को चुनना होगा. कहां तो उसने सोचा था कि वह साइंस की तरक्की का लाभ इस देश के लोगों को पहुंचा सकेगी. खास तौर पर वह गांवों में उन लोगों को राहत देना चाहती थी जो चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में असमय ही दुनिया से कूच कर जाते हैं अथवा उपयुक्त इलाज न हो पाने के कारण छोटी मोटी बीमारियों से भी बरसों जूझते रह जाते हैं और वह बीमारी देखते देखते ही तिल से ताड़ बन जाती है.

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से वह बीएससी कर रही थी कि उसके सपनों को पंख मिल गये और वह प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गयी और कोलकाता के एक मेडिकल कॉलेज में उसका दाखिला हो गया. चार वर्ष का पाठयक्रम उसने पूरा कर लिया था अब छह माह का इंटर्नशिप उसे पास करना था जिसके बाद वह स्वतंत्र थी मेडिकल प्रेक्टिस के लिए. इस बीच उसके घर की हालत सोचनीय होती चली गयी थी. पिता ने ज़मीन बंधक रख दी थी. छोटी दो बहनें कुंवारी थीं और पिता को उम्मीद थी कि डॉक्टर बेटी अपनी कमायी से उन्हें पार लगायेगी. आखिर बेटी का भी तो कुछ कर्तव्य बनता है ऐसे पिता के प्रति जितने लोगों के तमाम भड़कावे के बावजूद उसे इतनी ऊंची तालीम हासिल करने दी.

शिखा की उम्र भी निकली जा रही थी किन्तु उन्होंने उस पर विवाह के लिए जोर नहीं डाला और उसके बाद वाली बेटी निशा का ब्याह दो साल पहले ही कर दिया और हाथ खड़े कर दिये कि अब किसी और बेटी को ब्याहने की उनकी स्थिति नहीं है शिखा ही अपनी नौका खुद पार लगाये और अपनी दो अन्य छोटी बहनों के लिए भी वक्त आने पर घर-बार खोजे.

लोग उन्हें समझाते थे बेटियां दूसरे के घर जाने वाली होतीं हैं. उनसे उम्मीद नहीं पाली जानी चाहिए. बहुत होगा तो वह इतना करेगी कि अपने लिए कोई डॉक्टर वर खोज लेगी लेकिन अन्य कोई उम्मीद करना बेकार है. लेकिन पिता को अपनी आस्था के लिए एक ठौर मिल गया था और वह थी उनकी बेटी शिखा. ईश्वर और शिखा उनके जीवन के दो ध्रुव बन गये थे जिसके बीच उनका जीवन परिक्रमा करता रहता था. इसमें भी शिखा की मुख्य भूमिका होती और ईश्वर उसके सहायक. उनकी चर्चा शिखा से शुरू होती और शिखा पर ख़त्म.

कभी शिखा छुट्टिओं में बनारस से कुछ किमी दूर स्थित अपने गांव लाखी जाती तो पिता की अपने से लगायी गयी उम्मीदों से सहम जाती. यदि वह उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी तो जाने क्या होगा....

यूं तो शिखा ने सारी बाधाएं पार कर ली थी. घर- परिवार व जीवन के अन्य उतार चढ़ाव की बाधाएं को अपने दिलो दिमाग से निकाल कर अपने करियर के बारे में सोचती और ध्येय को पाने में जुटी रहती. अब मंज़िल करीब थी. वह जल्द से जल्द मेडिकल प्रेक्टिस शुरू कर अपने परिवार की आर्थिक बाधाओं को दूर करना चाहती थी. मिट्टी का घर भी अब गिरने गिरने को था. पिछली बरसात वह झेल गया था जैसे तैसे लेकिन इस बार की वर्षा वह निकाल पायेगा इसमें संदेह था.

शिखा को इंटर्नशिप के लिए बंगाल दक्षिण 24 परगना जिले के एक ग्रामांचल के सरकारी अस्पताल दिया गया था जहां उसे छह महीने चिकित्सा करनी थी. उसे अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टरों के दिशा-निर्देश में काम करना था. कोलकाता से दो घंटे के बस के सफर के बाद वह अस्पताल पहुंचती और काम के बाद वापस लौटती. अस्पताल के हालत उसके लिए विस्मयकारी थे. किताबों से बाहर निकल कर व्यवाहरिक दुनिया में प्रवेश उसके लिए नया अनुभव था. उसने सोचा भी न था कि उसके ख्वाबों की हक़ीकत ऐसी होगी और उसके आदर्श धरे के धरे रह जायेंगे. मेडिकल सांइस की तरक्की को यहां की व्यवस्था मुंह चिढ़ा रही थी. अस्पताल में कुछ आठ दवाएं थी जिनसे उसे लोगों की तमाम बीमारियों का इलाज करना था. ऊपर से तुर्रा ये कि किसी भी मरीज को यह नहीं बताना था कि अमुक दवा नहीं है. दवा न भी हो तो मरीज के इलाज का नाटक जारी रखना था क्योंकि ऐसा न करने पर लोगों की नाराजगी का अस्पताल निशाना बनेगा और सरकार भी. व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लग जायेगा. मामला विधानसभा में उठ सकता है. मीडिया तो यूं भी फुटेज के चक्कर में तिल को ताड़ बनाता रहता है. विपक्ष को बैठे बिठाये वामपंथी सरकार के खिलाफ़ मुद्दा मिल जायेगा. अधिक से अधिक उन्हें आज़ादी थी मामले को कोलकाता के किसी अन्य अस्पताल को रेफर कर दिया जाये. किन्तु ऐसे मामलों में भी कैफियत देनी पड़ेगी. शिखा ने गांव के किसी अस्पताल में प्रेक्टिस का विचार सिरे से खारिज कर दिया. ना वह बिना दवा के इलाज का स्वांग नहीं करेगी.

शिखा को अभी कुल चार दिन ही हुए थे और वह यहां की व्यवस्था से परिचित हो चली थी. परिचित ही नहीं हुई थी बल्कि वह इस व्यवस्था का हिस्सा बनने का मन बना चुकी थी. उसके पास कोई विकल्प नहीं था. इंटर्नशिप उसे पूरी करनी थी. मन कड़ा कर लिया था और वह व्यवस्था का कोई असर दिलो दिमाग पर न पड़े इसकी पूरी कोशिश में लगी थी. वह अपने मन को विचलित नहीं करना चाहती थी. वह लक्ष्य पर निगाह गड़ाये हुए थी. उसकी आंखों के सामने पिता थे. उनके सपने थे. बहनें थी उनकी जिम्मेदारियां थीं. गांव के लोग थे जिनकी वह शान व पहचान थी. गांव की पहली डॉक्टर वह बनेगी.

अस्पताल में उस दिन जैसे ही वह पहुंची तो पाया कि सर्पदंश का मामला आया हुआ है. बाईस साल का युवक था जिसे गांव वाले चारपाई पर लिटाकर ले आये थे. विधवा मां, दो कुंवारी बहनें धाड़ें मार-मार के रो रही थीं. और गांव के लोग थे जो उन्हें दिलासा दे रहे थे कि वह ठीक हो जायेगा. लो डॉक्टर आ गयी.... लोगों के चेहरे का तनाव थोड़ा कम हुआ. अस्पताल में फिलवक्त कोई और डॉक्टर था सो जिम्मेदारी उस पर थी. उसने पता किया सर्पदंश से निजात का कोई इंजेक्शन अस्पताल में नहीं था. उसे इलाज का अभिनय भर करना था. उसके समक्ष एक चुनौती थी और उसके इम्तहान की घड़ी. उसने मन कड़ा कर लिया. उसने पढ़ा था ज्यादातर सांप विषैले नहीं होते किन्तु कई लोग दहशत से मर जाते हैं. उसका अभिनय काम आ सकता था. इलाज के अभिनय से प्रभावित व्यक्ति का मनोबल ऊंचा उठ सकता था उम्मीद थी वह ठीक हो जायेगा. दवा से नहीं अपने-आप. उसने भगवान से मनाया कि जिस सांप ने काटा है वह विषैला न हो. किन्तु उसका कामनाएं फलीभूत होती नज़र नहीं आ रही थी.

इसी बीच एक और घटना घटी जिसने उसे झकझोर कर रख दिया. युवक की हमउम्र एक युवकी रोती बिलखती अस्पताल पहुंची. उसने अपने पास सिंदूर की डिबिया रखी थी. लगभग बेसुध होते युवक के समक्ष वह फूट पड़ी-‘मैं नहीं जानता तुम बचोगे कि नहीं. लेकिन तुम जान लो कि मैं तुम्हारी हूं. मैं तुम्हारी विधवा बन कर जी लूंगी मगर दूसरे से हरगिज़ शादी नहीं करूंगी. मैंने बहुत कोशिश की कि गांव वालों से अपना प्रेम छिपा लूं. मैं जानती हूं कि मेरे पिता इस शादी के लिए कभी राजी नहीं होंगे फिर भी मैं कोशिश में थी कि कभी न कभी उन्हें मना लूंगी. मगर अब वक्त नहीं बचा है. पता नहीं क्या होगा. तुम नहीं भी बचोगे तो यह जानकर जाओ कि मैं तुम्हारी हूं.’

और उसने अस्पताल में गांव वालों के सामने युवक से सिन्दूर अपनी मांग में भरवा ली. शिखा दहल गयी. उसकी आंखों से सब्र आंसू बन कर बह निकला. इस बीच युवक अचेत हो गया था. शिखा ने मन कठोर कर लिया और युवती से पूछा-'क्या तुम्हारे पास गाड़ी है?'

युवती के हां कहने पर उसने कहा-‘मैं जान गयी हूं इसे किस सांप ने काटा है. वह बहुत जहरीला है. उसका इलाज आसान नहीं. तुम इसे लेकर जल्द से जल्द कोलकाता मेडिकल कालेज चली जाओ. यहां उसका इलाज नहीं हो पायेगा.’

युवती ने लोगों की मदद से फौरन युवक को कार में बिठाया और गाड़ी चल पड़ी. लोगों को जैसे ही पता चला कि अस्पताल में इलाज संभव नहीं गुस्सा फूट पड़ा. अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टरों के लिए गालियां दागी जाने लगीं. इधर गांव के लोगों ने अस्पताल में तोड़फोड़ शुरू कर दी थी. शीशे की खिड़की को तोड़ता हुआ एक सनसनाता पत्थर उसके सिर पर लगा था और वह अचेत हो गयी.

उसे जब होश आया तो पाया कि वह अस्पताल के एक बेड पर पड़ी है और भारी संख्या में पुलिस बल अस्पताल में तैनात है. उसके कमरे के बाहर भी पुलिस थी. उसे सिर पर लगी चोट का भी अहसास हुआ किन्तु मन में संतोष का भी अनुभव किया कि सब कुछ के बावजूद वह एक युवक की जान बचाने में सफल रही. इस बीच उसका बयान लिया गया. वहां उसके सीनियर डॉक्टर्स भी थे. पता चला कि सर्पदंश से युवक की मौत हो गयी है. लोग अस्पताल के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं. एहतियात के तौर पर पुलिस बुलायी गयी है.

13.08.2010, 06.26 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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