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बीता लौटता है

पुस्तक अंश

बीता लौटता है

मनोज शर्मा

प्रकाशकः आधार प्रकाशन, एससीएफ 267, सेक्टर-16, पंचकूला-134 113 हरियाणा

मूल्य-125 रुपए

मनोज शर्मा


बचे-खुचे का वजूद
इतनी सारी जंग लगी रातों में
यह रात है एक और
जुड़ा हुआ है सात जन का जमावड़ा

इस अलग दुनिया में
एक उदाहरण स्थल पर
सबसे चुप्पा अधेड़ ने सुनाईं
दो सतरें तलत की
ये उसे पिछले तीस वर्षों से याद थीं
उस छोकरे का तरन्नुम सुनें
इतना महफूज है उसके पास किशोर कुमार
कि, ‘ विरासत में हमें मिली है उम्मीद’ वाला जुमला
बरबस याद हो आया है

सभी पकड़े हैं
अपने-अपने कालखंड की छांव
सभी के कंठ से टपक रहा है
बेहद निजी उल्लास
गाढ़ा हो रहा है मजा
और सामूहिकता ऐसी घनी कि
टूटकर बार-बार भी
संतुष्ट बनी हुई है धुन

ऐसे समय में
जब दीवारों पे फड़फड़ाते कैलेंडर तक
गाहक-गाहक चिल्लाते, उकताए लटके हैं
रोशनी और अंधकार के मध्य

जब लोगों के समीप
अपनी पसंद का कहने को कुछ नहीं बचा
मैं, उन लोगों के इकट्ठ में हूं
जिनके पास हैं
महान स्मृतियां उलीकते गीत

गर्क होती रातों में
जो हेमंत को सुनाकर चौंकाने का
या रफी को हूबहू नकल करने का
दुस्साहस संभाले हुए हैं।


गुल्लक
पता नहीं कैसे
बची रह गई थी मेरे बचपन की
वह गुल्लक
अर्से से छेड़ी जाती कोख लिए
घर के अंधेरे कबाड़ में पड़ी थी चुपचाप
टूटी नहीं थी आज तक यही आश्चर्य है
भरे पड़े हैं घोर आश्चर्य
इस घिस-घिस जाती दुनिया में

अब लें उस दिन बेटे की टिन की गुल्लक देख
मुझे याद आई अपनी गुल्लक
जो ढूंढी तो मिल भी गई तपाक से-
सोचा कि मुक्त करूं इसे, और
जैसे पिछले साल कंचे दिए थे बेटे को
सिक्के भी दूं, यूं ही

फटी-फटी आंखों से निहारता सिक्के
किसी दूसरी दुनिया का लगा बेटा
थूक से उठाया उसने फिर
इक पैसे का सिक्का
माथे के बीचोबीच बिंदिया-सा चिपका लिया
लगा रहा दो-पैसे, तीन-पैसे के कई-कई
गुलीवरी अजूबों से
इस सदी में सहेज तो लेगा वह भी
अपनी टिन की गुल्लक जरूर
और इसकी संतान भी यूं ही चिपकाएगी कभी
कोई ऐसा ही, मूल्य खो चुका सिक्का।


नींद में तुम
मेरी नींद में हो तुम
अपनी निद्रा लेते
जन-जन की कसम
तुम कुछ इसी तरह मुझमें महकती हो

मेरे गांव के पास
जहां लगभग शांत होने लगता है
दरिया व्यास
मुर्गाबियां उतरती हैं जहां
जैसे सफेद चद्दर उछालती हवा
बहुतेरे करीब हैं ऐसे
और अथाह नींद में तुम

टीले के डेरे पे
पौ फटने से पहले
ठीक अभी
बूढ़े गूजर ने हुक्के के अलसाए तम्बाकू पर
धरा होगा, बचाया अंगारा
पंचकल्याणी भैंस की अकडऩ
छनकती हुई, अभी टूटी होगी
और निश्चल नींद में तुम

किसी पढ़ाकू की तरह
हर नींद में निज को फिर से दोहराती हुई
कंठस्थ हो
किसी अच्छी कविता की तरह ।

04.09.2010, 00.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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Pawan Nishant (pawannishant@yahoo.com) Mathura (UP)

 
 बड़ी प्यारी कविता है. तन-मन झनझना उठा. शव्दों का निश्छल प्रयोग बहते दरिया की तरह. गजब. साधुवाद. 
   

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