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हारिल-उपन्यास-हितेंद्र पटेल

पुस्तक अंश

 

हारिल

हितेन्द्र पटेल

 

हारिल

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हारिल (उपन्यास)- हितेन्द्र पटेल

प्रकाशकः अंतिका प्रकाशन, सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)

मूल्यः पेपरबैक 100.00 रुपये

 

 

यहां से मेरी यात्रा की असली कहानी शुरु हुई. बहुत पहले पढ़ा था कि हर आदमी के आसपास ही उसकी पूरी दुनिया होती है. कहने को तो वह ऐसे देश या शहर में रहता है, जिसकी आबादी करोड़ों में होती है पर वह जीता 20-25 लोगों की दुनिया में ही है जिससे उसका सम्पर्क होता है.

पहले दो-तीन दिन तो मैं एक प्रकृति-प्रेमी भावुक व्यक्ति की तरह गेस्ट हाउस में रहा. सुबह उठते ही मुझे चाय मिल जाती. चाय पीकर मैं तैयार होता और 6 बजे के करीब नीचे घाटी में उतर जाता. मुझे यह अजीब लगा कि जिस जगह को मैं एकदम अनजानी और बगैर आबादी का क्षेत्र समझ रहा था, वहां बहुत सारे परिवार रहते थे. रात के अंधकार में जलती हुई बत्तियों को गिनकर यह बताया जा सकता है कि थोड़ी-थोड़ी दूरी पर करीब 18-20 घर बने हुए हैं. ये सब घर एक दूसरे से सौ दो सौ मीटर की दूरी पर बने थे. सड़क से ये घर इसलिए नहीं दिखलाई पड़ते थे क्योंकि ये सभी घर या तो पेड़ों से छुप गये थे या घाटी में नीचे की तरफ बने हुए थे.

दो-तीन दिनों में पांच-छः चेहरों से मेरा चेहरा-परिचय हो गया था, जिसे देखकर मैं प्रसन्नता पूर्व नमस्ते कहता और वे भी बहुत आनन्दित होकर उत्तर देते. उन्हीं मे से एक लड़के के यहां चाय बनती थी जिसे पीने मैं कभी-कभी चला जाता था. उस समय वहां जितने लोग होते, उनको मैं चाय पिलाता. एक बहुत नाटे से सज्जन ने मुझे उस इलाके के बारे में बहुत कुछ बतलाया. पता चला कि यह इलाका अब धीरे-धीरे टूरिस्ट मैप पर आ रहा है और धीरे-धीरे सरकार का ध्यान इस ओर आ गया है. लोग यहां आकर घर बनाना चाहते हैं. यहां जमीन का भाव पिछले दो सालों में बहुत बढ़ गया है. हलद्वानी के बड़े लोग यहां आकर किसी भी प्रकार से जमीन खरीदने आते हैं. वे यहां के लोगों को बहला फुसलाकर जमीन अपने नाम करवा लेते हैं.

चाय दुकान पर बैठे-बैठे मैं पास के दो घरों को ध्यान से देखता रहता. वहां दो-तीन औरतें रहती थीं जो हमेशा काम करती हुई दिखलायी पड़तीं. कभी लकड़ी लाती, कभी बैल-गाय को खाना खिलाती, कभी घास लाती, कभी पानी लाती तो कभी सफाई करती. यूं तो यहां कोई भी व्यक्ति- औरत और मर्द मोटा नहीं था पर औरतें खास तौर पर दुबली थीं.

एक दिन मेरी इच्छा हुई कि इन औरतों के बारे में कुछ जानूं. मैंने चाय वाले से पूछा भी. उसने कुछ खास नहीं बताया पर कुमाऊंनी में जो उसने बतलाया, उससे यह तो मुझे समझ में आ ही
गया कि वह कोई अच्छी बात नहीं बता रहा था. मेरी जिज्ञासा और बढ़ गयी.

एक दिन हिम्मत करके मैं खुद उस घर की ओर बढ़ गया. औरत ने मुझे आते हुए देख लिया था. उसने मुझे नमस्ते कहा. मैंने उसे नमस्ते कहते हुए पूछा - ''यह आपका घर है?''

''नहीं यह मेरी समधन का है.'' उसकी आवाज साफ थी.

''समधन?'' मैं थोड़ा चौंका. औरत की उम्र इतनी अधिक नहीं दिखलायी पड़ रही थी.

मैं खड़े-खड़े उससे बात कर रहा था. मैंने देखा उसकी आवाज सुनकर एक और औरत निकलकर घर के बाहर आ गयी थी.उसने पहले मुझे और फिर उस औरत को देखा. दूसरी औरत भी उसी उम्र की थी पर उससे बड़ी लग रही थी. मैंने उसे भी नमस्ते किया. उसने मुझे पास पड़े एक पटरे पर बैठने का संकेत किया. मैं वहीं बैठ गया. धूप अभी भी खिली हुई थी. मुझे मौसम अच्छा लग रहा था.

''कहां से आये हो?'' पहली स्त्री ने पूछा.

''कलकत्ता'' मैंने कहा फिर सोचकर कि शायद उसे कलकत्ता का मतलब न मालूम हो – “जो बहुत दूर है -बड़ा शहर है.''

''हां! जानती हूं. वहां बंगाली लोग रहते हैं.”

मैंने देखा ध्यान से देखने पर यह पहाड़ी औरत कुछ समझदार मालूम पड़ती थी.

मैं लगभग आधे घंटे तक उनसे बातें करता रहा. जिस औरत से मैंने पहले बात की थी, वह 51 वर्ष की थी. जब वह 21 वर्ष की थी तभी उसका पति पहाड़ी नदी में बह गया था. अपने दो छोटे बच्चों के साथ वह मायके चली गयी थी. वहीं रहकर अपने दोनों बच्चियों को पाला पोसा. बाद में उसके मां-बाप मर गये. तब उसने बड़ी मेहनत करके कुछ रुपये इकट्ठा किए और दोनों बच्चियों की शादी कर दी. उन्हीं दोनों में से एक के घर आकर 'बुढ़ापे' में वह रहती थी.

मैंने अपनी कल्पना शक्ति से यह समझने की कोशिश की कि इस औरत ने जो पिछले 30 वर्षों से विधवा के रूप में जी रही है कितने दुःख देखे होंगे, कितना कुछ सहा होगा. इतना तो मैं अब तक समझ ही चुका था कि पहाड़ का जीवन मैदानी जीवन से बहुत ज्यादा भिन्न नहीं होता. वहां भी औरतों के लिए लगभग उतनी ही वर्जनाएं थीं, जितनी मैदानी इलाकों में.

उसकी समधन कम बोलती थी लेकिन उसके व्यवहार और बातचीत से यह प्रतीत होता था कि वह अपनी समधन से बहुत बहनापा रखती है. उसने हमें चाय भी पिलायी. चाय का स्वाद कुछ अलग लगा लेकिन बहुत अच्छा था. उन लोगों ने मुझे फिर आने को कहा, जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया.

वहां से लौटते हुए मैं चाय की दुकान पर गया. चाय वाले ने कहा कि – “सर! आप इन लोगों के पास ज्यादा मत जाइये. ये लोग ठीक नहीं हैं. आपको दिक्कत होगी.”

मैंने पूछना चाहा लेकिन एक और व्यक्ति चाय पीने आ गया और जिस तरह से सकपकाकर चाय वाले ने बात खत्म की उससे मुझे यह अंदाजा हो गया कि आगंतुक के सामने इस प्रसंग को छेड़ना उचित नहीं होगा.
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