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पुस्तक अंश-स.ही. वात्स्यायन अज्ञेय- रमेशचंद्र शाह

पुस्तक अंश

स.ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

रमेशचंद्र शाह














स.ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (जीवन और लेखन)- रमेशचंद्र शाह
प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड, नई दिल्ली 110 002
मूल्यः 150.00 रुपये



अज्ञेय : पत्रकार-कर्म

डॉ. लोहिया की एक प्रसिद्ध उक्ति- 'धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म.' अब यूँ तो हर सुक्ति तराशी हुई उक्ति होने के कारण सूक्ति कहलाती है और इस तराश की प्रक्रिया में कुछ-न-कुछ काट-छाँट अवश्यंभावी है-सघनीकरण के साथ सरलीकरण भी वांछित प्रभाव उत्पन्न करने के लिए अनिवार्य हो उठता है। तो भी अभ्यस्त जानकारी या विचार का बासीपन झाड़ने के लिए, अर्थ की नई चमक पैदा करने के लिए ऐसा करना ठीक ही माना जाता है. अज्ञेय की पत्रकारिता पर कुछ कहने चलते ही हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास का एक तथ्य साहित्य-रचना कर्म और पत्रकार-कर्म के नजदीकी संबंध का तथ्य कुछ इस तरह हमारे सिर पर चढ़कर बोलने लगता है कि हमें लगता है कि दो कर्मक्षेत्र भले ही एक दूसरे से स्पष्टतया विविक्त और विशिष्ट हों, हिंदी के संदर्भ में वे कुछ इस तरह जुड़े प्रतीत होते हैं कि हमें लोहिया की उक्त सूक्ति की तर्ज पर ही एक दूसरी सूक्ति सूझने लगती है, यह कि 'साहित्य दीर्घकालीन पत्रकारिता है और पत्रकारिता अल्पकालीन साहित्य . '

जिस पत्रकारिता का आरंभ ही बालमुकुंद गुप्त सरीखे लेखकों से हुआ हो, जो हिंदी निबंध-विधा के उन्नायकों में अग्रगण्य हैं, जिसमें निराला सरीखे कई सारे कवियों और प्रेमचंद सरीखे जन्मजात कथाकारों का योगदान भी खासी जगह घेरता जान पड़ता है, वह अगर ऐसी सूक्ति उछालने को प्रेरित करता है, तो जाहिर है महज चौंकाने के लिए नहीं.

अज्ञेय का पत्रकार-कर्म इसी परंपरा के अंतर्गत-बेशक एक युगांतर-सूचक गुणात्मक परिवर्तन के साथ- ऐसी ही एक और विशिष्ट भूमिका के निर्वाह का उपक्रम है.

निस्संदेह अज्ञेय मूलत: साहित्य-सृष्टा थे, पत्रकार नहीं. उन्होंने कहा भी है एक जगह, ''साहित्यकार रूप-सृष्टा है, उपदेशक नहीं. उसके सिरजे रूप से अगर समाज की संवेदना का संस्कार होता है या कोई नया आयाम खुलता है, तो वही उसकी उपलब्धि होती है. '' उन्होंने यह भी स्पष्ट कहा है और उनका यह कथन उनके मूलत: साहित्य-सृष्टा ही होने का सूचक है कि - ' मैं अपने प्रति उत्तरदायित्व को प्राथमिक और समाज के प्रति दायित्व को उसी से उपपन्न मानता हूँ.' किंतु यह 'अपने प्रति उत्तरदायित्व' वाली बात समाज के प्रति दायित्व की बात को काटनेवाली बात कदापि नहीं है, बल्कि दोनों के गहरे संबंध की सूचक है, यह स्वयं उनके साहित्य और पत्रकार-कर्म दोनों से प्रमाणित होता है।

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना द्वारा लिये गए एक साक्षात्कार का हवाला देना यहाँ प्रासंगिक होगा. उस साक्षात्कार में अज्ञेय कहते हैं कि- '' इसमें मैं लेखक का बहैसियत लेखक के, एक अतिरिक्त निजी उत्तरदायित्व भी मानता हूं और एक अतिरिक्त सामाजिक उत्तरदायित्व भी. ''

... कलाकार की एकांत साधना को अत्यधिक महत्व देता हुआ भी मैं समझता रहा हूं कि समय-समय पर उसे महत्वपूर्ण सामाजिक समस्याओं पर अपना अभिमत प्रकट करना चाहिए, किंतु अपने साहित्यिक व्यक्तित्व का ऐसा सामाजिक उपयोग होने देने में उसे दलबंदी से बचाना चाहिए क्योंकि बिना इसके वह अपने निजी दायित्व से स्खलित हो जाता है. ''

यह सावधानी कितनी आवश्यक है और एक सर्जक प्रतिभा के लिए वह कितनी सहज स्वाभाविक भी होनी चाहिए-कहने की आवश्यकता नहीं; किंतु हमारे सामने अनेक उदाहरण हैं, जो उक्त सावधानी का नहीं, बल्कि सरासर अवहेलना का दृश्य ही उपस्थित करते हैं. तिस पर विडंबना यह कि ऐसे लेखक अपनी दलबंदी को अपने निजी दायित्व से स्खलन भी नहीं मानते, बल्कि उसके औचित्य को लेकर लगता ही नहीं कि उन्हें कभी किसी तरह की कोई शंका भी व्यापती होगी.

इसके दूसरे छोर पर वे लेखक हैं जो सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं पर कभी अपना अभिमत प्रगट नहीं करते, बल्कि वैसी चिंता को बहैसियत साहित्यकार कोई महत्त्व ही नहीं देते. उसे अनावश्यक मानते हैं. अज्ञेय निश्चय ही ऐसी शुद्धता के कायल नहीं थे. एक जगह वे स्पष्ट कहते भी हैं. '' मैं अपने साहित्यिक व्यक्तित्व से हिंदी के औसत लेखक की अपेक्षा अधिक ही मांगता रहा हूँ. अपने को अधिक उत्तरदायी समझता रहा हूं.''
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