पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >माओवादी या आदिवासी Print | Share This  

माओवादी या आदिवासी

पुस्तक अंश

 

माओवादी या आदिवासी

माओवादी या आदिवासी

संपादकः महाश्वेता देवी | अरुण कुमार त्रिपाठी

प्रकाशकः वाणी प्रकाशन 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली 110002

मूल्यः 295.00 रुपये


बस्तर का दर्द तो समझो

इरा झा
 

सरकार के पास नक्सलियों और आदिवासियों की पहचान का कोई फार्मूला है ही नहीं। जब अर्धसैनिक बलों के जवान गोली चलाते हैं तो वह गारंटी कैसे देगी कि मरने वाला आदिवासी नहीं, नक्सली है।

आठवें दशक की बात है। शायद 1972 की। जगदलपुर शहर के लोगों में अजीब सा खौफ था। महिलाएं फुसफुसातीं अचानक आ जाएं तो क्या करेंगे? क्या तकिए के नीचे मिर्च का पैकेट दबाकर सोएं या चाकू रखकर? बच्चे आंखें फाड़े बड़ों की इस बातचीत से दहलकर दुबक जाते या बैठे-बैठे उन अजनबियों के आने की कल्पना करते। दरअसल यह नक्सलियों के बस्तर में आने की सुगबुगाहट थी। जगदलपुर उस समय देश के इस सबसे बड़े और क्षेत्र के मामले में आस्ट्रिया समेत कई देशों से बड़े इस जिले का मुख्यालय था। बस्तर तब भी दुनिया की सबसे बड़ी आदिवासी बसाहट थी और आज भी है। हां, तो उन दिनों कोई ठीक-ठीक नहीं जानता था कि ये कौन लोग हैं? इसीलिए लोगों ने अपने-अपने हिसाब से उनके नाम गढ लिए थे। बस्तर के लोगों को 1981 के आसपास यह पता लगा कि जिनके बारे में वे किंवदंतियां सुनते आए हैं, वे किसी मकसद के लिए लड़ रहे हैं और आदिवासियों के शोषण की दास्तान जानकर उन्होंने बस्तर को अपना ठिकाना बनाया है। पर तब भी उन्हें नक्सलवादियों के नाम से कोई नहीं जानता था। गांव के लोग इन्हें दादा कहते थे, इसलिए शहरी लोगों ने भी यह शब्द अपना लिया। दादा शब्द आदिवासियों में सम्मान का सूचक है। जो उन्हें समझे,प्यार करे और उनके हितों की रक्षा करे वह दादा। इन नक्सलवादियों को तब दादा कहने के पीछे यही भाव रहा होगा। आम तौर पर आदिवासी यह मानते थे कि पुलिस वाले इन दादा लोगों से डरते हैं। दादाओं के कारण उनके जंगल के हक सुरक्षित हैं और सरकारी कर्मचारी अब उन्हें परेशान करते हिचकिचाते हैं कि न जाने कब कौन दादा आ धमके। तब तक छिटपुट हिंसा का दौर शुरू हो गया था। फिर भी नक्सली या नक्सलवाद शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ था।

नक्सलवादी पुलिस पर हमला नहीं करते थे। एकाध निहायत निजी किस्म की घटनाओं को छोड दें तो पुलिस ने भी कभी इन्हें गंभीरता से नहीं लिया था। पुलिस पर हमलों का दौर 1991 के बाद शुरू हुआ। नक्सलियों ने इसी वर्ष यह तय किया कि अब पुलिस को निशाना बनाया जाएगा। आज के अतिसंवेदशील समझे जाने वाले नारायणपुर इलाके के ताड़बायली गांव में 19 अक्तूबर 1991 को पुलिस ने नक्सल नेता गणपति को मुठभेड़ में मार डालने का दावा किया था। नक्सलियों का कहना था कि पुलिस ने उनके साथी को मुठभेड़ में नहीं बल्कि तब मारा है, जब वह सो रहा था। नक्सलियों ने पहली बार बाकायदा विज्ञप्ति जारी कर यह बात जनता तक पहुंचाई और कहा कि अब पुलिस पार्टी को निशाना बनाएंगे। इसके साथ ही पुलिस पर हमलों का दौर शुरू हो गया। नक्सलियों को जब लगता कि पुलिस का फलां वारदात में हाथ है तो वह पुलिस पार्टी पर हमला बोल देते। पुलिस पर पहला बड़ा हमला 8 अक्तूबर 1998 को बीजापुर इलाके के तर्रेम गांव में हुआ। इस वारदात में पहली बार बारूदी सुरंग का इस्तेमाल हुआ था। इसमें 17 लोग मारे गए थे। 1985 से अचानक नक्सल वारदात में तेजी आ गई। इस बीच लोगों ने कोंडापल्ली सीतारम्मैया नाम सुना। लोगों ने जाना कि इस गुट के लोग आदिवासियों को उनका हक दिलाने के लिए काम करते हैं। शहरी लोगों को नक्सलवाद का लब्बो-लुबाब समझ में आने लगा। उधर 1985 से 1991 के बीच नक्सली और नक्सलवाद शब्द भी प्रचलित हो गए। लोगों की जानकारी में इजाफा हुआ। जैसे नक्सलवाद वामपंथ का ही सशस्त्र क्रांति की वकालत करने वाला समूह है। ये लोग पश्चिम बंगाल की नक्सलबाडी के नष्ट होने के बाद बस्तर के जंगली इलाके को महफूज पाकर यहां आए हैं। इससे भी बड़ी बात यह थी कि आदिवासी हर कदम पर छला जा रहा था। सरकारी कर्मचारी, व्यापारी, जंगल के ठेकेदार, बस्तर की नायाब सागौन और साल लकड़ी के सौदागर।

बस्तर में आदिवासी का शोषण चरम सीमा पर था। आदिवासी-नक्सल संबंध को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि उत्तर भारत की सूखी बंजर जमीन से हरे-भरे चरागाह की तलाश में जो लोग कटोरा लेकर छत्तीसगढ़ आए थे, वो आज अरबपति हैं और जंगल के सदियों से मालिक रहे आदिवासियों के हाथ में कटोरा है। ये लोग आदिवासियों को दुधारू गाय समझते थे। बस्तर पर तो प्रकृति मेहरबान है। प्राकृतिक वैभव आज के मुकाबले तब सौ गुना नहीं तो पचास गुना तो जरूर रहा होगा। घनेरे जंगल,कल-कल बहते झरने, आंखों को सुकून देने वाली हरियाली और धान के इस अकूत भंडार (अंग्रेज धान का कटोरा जो भीख का प्रतीक है, कहकर खिलवाड़ कर गए) बिना किसी मेहनत के खुशबूदार चावल का सोना उगलने वाले खेत, जमीन पर खडे नायाब साल के बेशकीमती पेड़ जिनमें से एक-एक की बाजारी कीमत तब भी हजारों में थी और आदिवासी इनका मोल नहीं जानते थे। लकड़ी के सौदागर इन पर घात लगाए बैठे रहते थे। इसीलिए जमीन की खरीदी के नाम पर पेड़ हड़पने का दौर शुरू हुआ। अचानक आयतू, हिडमा, लखमा जैसे आदिवासी जमीन खरीदारों की बाढ आ गई्र। इसके दो कारण थे, पहला यह कि तब भी आदिवासी की जमीन गैर आदिवासी नहीं खरीद सकता था। दूसरे इन जमीनों पर इमारती लकड़ी के जो पेड़ थे, उनकी कीमत, जमीन की कीमत से सौ गुना से भी ज्यादा थी। यह तो 1995 के आस-पास लोगों को पता लगा कि यह गड़बड़झाला असल में मालिक मकबूजा नाम का बड़ा कांड था।
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

SANjay VARMA [svsunjay581@gmal. com] RAIPUR - 2011-06-21 09:56:20

 
  YOU HAVE INKED THE MYSTERIOUS LIFE OF TRIBE.THEIR LIFE IS CURSED AND CRASHED BY RICH MEN.  
   
 

kewalkrishna [kewalkrishna70@gmail.com] - 2011-05-14 00:36:04

 
  महत्वपूर्ण आलेख लेकिन कुछ तथ्यों को ठीक करने की जरुरत है. 
   
 

राजीव रंजन प्रसाद [rajeevnhpc102@gmail.com] बचेली, बस्तर - 2011-05-10 16:29:54

 
  नंदिनी सुन्दर की पुस्तक \\गुंडाधुर की तलाश में\\ के बाद बस्तर पर लिखी गयी यह दूसरी किताब है जिसपर केवल सिर ही धुना जा सकता है। तथ्यात्मक रूप से तो गलत है ही भ्रामक भी है और खेदजनक भी। बस्तर को गैरजिम्मेदार लेखकों नें वैसे भी अंधों का हाथी है....इसका शीर्षक जरूर अपील करता है \\बस्तर का दर्द तो समझो\\।  
   
 

Himanshu [himanshujournalist@gmail.com] dilli - 2011-04-26 14:45:53

 
  अच्छा लेख. हकीकत में इस लेख को पढ़ कर आदिवासी इलाको में नक्सली पैठ पर महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है. 
   
 

Bharat malhotra [bharatmalhotra83@gmail.com] new delhi - 2011-04-22 06:59:00

 
  बस्‍तर की स्थिति और आदिवासियों के दर्द की जानकारी बयां हो रहा है. रोचक शैली में काफी महत्‍वपूर्ण बातें कही गई हैं. 
   
 

आर्या तिवारी [] नोयडा - 2011-04-21 10:24:59

 
  इरा जी का यह आलेख उन पत्रकारों के लिये बहुत काम का है, जिनकी दिलचस्पी खोजी पत्रकारिता में है. लेखिका ने इतने तथ्य इस आलेख में दिये हैं कि वह बस्तर को जानने के लिये पर्याप्त है. 
   
 

इरा झा [irajha2@gmail.com] नई दिल्ली - 2011-04-21 09:07:44

 
  @मुकेश कुमार, अब इस का क्या जवाब दूं, ...जाकि रही भावना जैसी .......... 
   
 

मुकेश कुमार [mukesh.kumar1197@gmail.com ] Raipur - 2011-04-21 09:06:07

 
  लगता है, अपने बस्तर में पैदा होने को भुनाने की इरा जी को कुछ ज्यादा ही हड़बड़ी है। उन्होंने इस आलेख में इतने झूठ लिखे हैं कि उन्हें पढ़ कर गुस्सा भी आता है और उनकी समझ पर तरस भी। मैं पूरे आलेख के बजाये केवल उनके दो-तीन दावे और झूठ को यहां रखना जरुरी समझता हूं।
इरा जी ने पृष्ठ 5 पर दूसरे पैरा के अंतिम हिस्से में 2003 के चुनाव का जिक्र करते हुये लिखा है-“उन दिनों नक्सली आम तौर पर पत्रकारों से नहीं मिलते थे।“
इस झूठ पर हिंदी पत्रकारिता भी शरमा जाये। इरा झा जी, आप किस युग में रहती हैं? छत्तीसगढ़ और बस्तर के पत्रकार लगातार नक्सलियों से मिलते रहे हैं, 1990 से लेकर 2011 तक लगातार। उनका इंटरव्यू करते रहे हैं। छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग ने तो 1996-97 में नक्सलियों के साथ सात-सात दिन बिताकर शानदार रिपोर्टिंग की है। स्वामी अग्निवेश आज मध्यस्थता कर रहे हैं, तब के अविभाजित म.प्र. के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक तौर पर रुचिर गर्ग को सरकार और नक्सलियों ने मध्यस्थता का अनुरोध किया था। जिस पर रुचिर गर्ग ने संभवतः यह कहते हुये मना किया था कि न नक्सली मेरी बात मानेंगे न सरकार, मैं मध्यस्थ कैसे बन सकता हूं। 2003 में तो चुनाव के समह लगभग हर पखवाड़े किसी ने किसी पत्रकार ने छत्तीसगढ़ के नक्सलियों से बात की है। फिर इरा जी, किस इरा की बात कर रही हैं ?
इरा झा जी के झूठ का सिलसिला आगे भी जारी है। वे लिखती हैं- “किसी महिला पत्रकार ने तो कभी उन्हें इंटरव्यू किया ही नहीं था।“
इरा झा जी को अपना सामान्य ज्ञान बढ़ा लेना चाहिये। रुचिर गर्ग जब 96-97 में नक्सलियों के साथ दंडकारण्य के जंगलों में कई दिन बीता कर लौटे थे, उसी के आस पास कलकत्ता टेलीग्राफ की पत्रकार राजश्री दासगुप्ता भी वहां पहुंची थीं। बस्तर से लौट कर उन्होंने कई वरिष्ठ नक्सली नेताओं के इंटरव्यू छापे। उसके बाद से आज तक जाने कितनी महिला पत्रकारों ने नक्सलियों के इंटरव्यू बस्तर में किये। लेकिन इरा झा जाने कैसे ऐसा लिख गयीं और अपनी पीठ खुद ही थपथपा गईं।
बात यहीं खत्म नहीं होती। इरा झा जी ने इससे भी बड़ा झूठ लिखते हुये इसी पन्ने पर लिखा है- “सलवा जुडूम की रिपोर्टिंग करने वाली मैं करीब डेढ वर्ष तक इकलौती पत्रकार थी।”
इरा जी, आपकी जानकारी के लिये केवल इतना बता दूं कि 5 जून 2005 को जब से सलवा जुड़ूम शुरु हुआ, उसके अगले दिन से ही इतनी खबरें लगातार छपती रही हैं कि उनकी कतरनें टनों में हैं।
इरा झा जी, आपके लिखे की जितनी निंदा की जाये, वह कम है। आपको पत्रकारिता से सन्यास ले लेना चाहिये।
 
   
 

सुजय घोष [ghosh.sujay@gmail.com] अंबिकापुर, छत्तीसगढ़ - 2011-04-20 10:15:51

 
  तथ्य बहुत गड्ड-मड्ड हैं. पता ही नहीं चलता कि लेखिका कब इतिहास में हैं, कब वर्तमान में. दूसरा ये भी कि लेखिका 2005 को और 1965 को इतिहास के एक हिस्से की तरह ट्रीट करती हैं. इससे बचना चाहिये. 
   
 

Sanjeev [] Raipur -

 
  लेखिका को लगता है, बस्तर का इतिहास एक बार फिर से पढ़ना पड़ेगा. 
   
 

shahroz [shahroz_wr@yahoo.com] ranchi -

 
  बेहद प्रभावी. काश, सुनने वाले सुन पाते इस आवाज़ को. 
   
 

pravin soni [] bilaspur -

 
  आदिवासियों के जीवन की परतें तो जरुर खुली हैं. 
   
 

deepak pandey [deepakpandey985@gmail.com] bilaspur (Chhattisgarh) -

 
  काफी महत्वपूर्ण और रोचक जानकारियां एकत्र की गई हैं, जो आम जनता को जागरुक करने में उपयोगी साबित होगी और लोग सच्चाई से रुबरु हो सकेंगे. 
   
 

Vikas Chandrakar [vikash.chandrakar@gmail.com] Bastar -

 
  पूरी तरह से झुठी रिपोर्टिंग है. तथ्य गलत-सलत हैं. यह निंदाजनक है. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in