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माओवादी या आदिवासी

पुस्तक अंश

 

माओवादी या आदिवासी

माओवादी या आदिवासी

संपादकः महाश्वेता देवी | अरुण कुमार त्रिपाठी

प्रकाशकः वाणी प्रकाशन 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली 110002

मूल्यः 295.00 रुपये


बस्तर का दर्द तो समझो

इरा झा
 

सरकार के पास नक्सलियों और आदिवासियों की पहचान का कोई फार्मूला है ही नहीं। जब अर्धसैनिक बलों के जवान गोली चलाते हैं तो वह गारंटी कैसे देगी कि मरने वाला आदिवासी नहीं, नक्सली है।

आठवें दशक की बात है। शायद 1972 की। जगदलपुर शहर के लोगों में अजीब सा खौफ था। महिलाएं फुसफुसातीं अचानक आ जाएं तो क्या करेंगे? क्या तकिए के नीचे मिर्च का पैकेट दबाकर सोएं या चाकू रखकर? बच्चे आंखें फाड़े बड़ों की इस बातचीत से दहलकर दुबक जाते या बैठे-बैठे उन अजनबियों के आने की कल्पना करते। दरअसल यह नक्सलियों के बस्तर में आने की सुगबुगाहट थी। जगदलपुर उस समय देश के इस सबसे बड़े और क्षेत्र के मामले में आस्ट्रिया समेत कई देशों से बड़े इस जिले का मुख्यालय था। बस्तर तब भी दुनिया की सबसे बड़ी आदिवासी बसाहट थी और आज भी है। हां, तो उन दिनों कोई ठीक-ठीक नहीं जानता था कि ये कौन लोग हैं? इसीलिए लोगों ने अपने-अपने हिसाब से उनके नाम गढ लिए थे। बस्तर के लोगों को 1981 के आसपास यह पता लगा कि जिनके बारे में वे किंवदंतियां सुनते आए हैं, वे किसी मकसद के लिए लड़ रहे हैं और आदिवासियों के शोषण की दास्तान जानकर उन्होंने बस्तर को अपना ठिकाना बनाया है। पर तब भी उन्हें नक्सलवादियों के नाम से कोई नहीं जानता था। गांव के लोग इन्हें दादा कहते थे, इसलिए शहरी लोगों ने भी यह शब्द अपना लिया। दादा शब्द आदिवासियों में सम्मान का सूचक है। जो उन्हें समझे,प्यार करे और उनके हितों की रक्षा करे वह दादा। इन नक्सलवादियों को तब दादा कहने के पीछे यही भाव रहा होगा। आम तौर पर आदिवासी यह मानते थे कि पुलिस वाले इन दादा लोगों से डरते हैं। दादाओं के कारण उनके जंगल के हक सुरक्षित हैं और सरकारी कर्मचारी अब उन्हें परेशान करते हिचकिचाते हैं कि न जाने कब कौन दादा आ धमके। तब तक छिटपुट हिंसा का दौर शुरू हो गया था। फिर भी नक्सली या नक्सलवाद शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ था।

नक्सलवादी पुलिस पर हमला नहीं करते थे। एकाध निहायत निजी किस्म की घटनाओं को छोड दें तो पुलिस ने भी कभी इन्हें गंभीरता से नहीं लिया था। पुलिस पर हमलों का दौर 1991 के बाद शुरू हुआ। नक्सलियों ने इसी वर्ष यह तय किया कि अब पुलिस को निशाना बनाया जाएगा। आज के अतिसंवेदशील समझे जाने वाले नारायणपुर इलाके के ताड़बायली गांव में 19 अक्तूबर 1991 को पुलिस ने नक्सल नेता गणपति को मुठभेड़ में मार डालने का दावा किया था। नक्सलियों का कहना था कि पुलिस ने उनके साथी को मुठभेड़ में नहीं बल्कि तब मारा है, जब वह सो रहा था। नक्सलियों ने पहली बार बाकायदा विज्ञप्ति जारी कर यह बात जनता तक पहुंचाई और कहा कि अब पुलिस पार्टी को निशाना बनाएंगे। इसके साथ ही पुलिस पर हमलों का दौर शुरू हो गया। नक्सलियों को जब लगता कि पुलिस का फलां वारदात में हाथ है तो वह पुलिस पार्टी पर हमला बोल देते। पुलिस पर पहला बड़ा हमला 8 अक्तूबर 1998 को बीजापुर इलाके के तर्रेम गांव में हुआ। इस वारदात में पहली बार बारूदी सुरंग का इस्तेमाल हुआ था। इसमें 17 लोग मारे गए थे। 1985 से अचानक नक्सल वारदात में तेजी आ गई। इस बीच लोगों ने कोंडापल्ली सीतारम्मैया नाम सुना। लोगों ने जाना कि इस गुट के लोग आदिवासियों को उनका हक दिलाने के लिए काम करते हैं। शहरी लोगों को नक्सलवाद का लब्बो-लुबाब समझ में आने लगा। उधर 1985 से 1991 के बीच नक्सली और नक्सलवाद शब्द भी प्रचलित हो गए। लोगों की जानकारी में इजाफा हुआ। जैसे नक्सलवाद वामपंथ का ही सशस्त्र क्रांति की वकालत करने वाला समूह है। ये लोग पश्चिम बंगाल की नक्सलबाडी के नष्ट होने के बाद बस्तर के जंगली इलाके को महफूज पाकर यहां आए हैं। इससे भी बड़ी बात यह थी कि आदिवासी हर कदम पर छला जा रहा था। सरकारी कर्मचारी, व्यापारी, जंगल के ठेकेदार, बस्तर की नायाब सागौन और साल लकड़ी के सौदागर।

बस्तर में आदिवासी का शोषण चरम सीमा पर था। आदिवासी-नक्सल संबंध को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि उत्तर भारत की सूखी बंजर जमीन से हरे-भरे चरागाह की तलाश में जो लोग कटोरा लेकर छत्तीसगढ़ आए थे, वो आज अरबपति हैं और जंगल के सदियों से मालिक रहे आदिवासियों के हाथ में कटोरा है। ये लोग आदिवासियों को दुधारू गाय समझते थे। बस्तर पर तो प्रकृति मेहरबान है। प्राकृतिक वैभव आज के मुकाबले तब सौ गुना नहीं तो पचास गुना तो जरूर रहा होगा। घनेरे जंगल,कल-कल बहते झरने, आंखों को सुकून देने वाली हरियाली और धान के इस अकूत भंडार (अंग्रेज धान का कटोरा जो भीख का प्रतीक है, कहकर खिलवाड़ कर गए) बिना किसी मेहनत के खुशबूदार चावल का सोना उगलने वाले खेत, जमीन पर खडे नायाब साल के बेशकीमती पेड़ जिनमें से एक-एक की बाजारी कीमत तब भी हजारों में थी और आदिवासी इनका मोल नहीं जानते थे। लकड़ी के सौदागर इन पर घात लगाए बैठे रहते थे। इसीलिए जमीन की खरीदी के नाम पर पेड़ हड़पने का दौर शुरू हुआ। अचानक आयतू, हिडमा, लखमा जैसे आदिवासी जमीन खरीदारों की बाढ आ गई्र। इसके दो कारण थे, पहला यह कि तब भी आदिवासी की जमीन गैर आदिवासी नहीं खरीद सकता था। दूसरे इन जमीनों पर इमारती लकड़ी के जो पेड़ थे, उनकी कीमत, जमीन की कीमत से सौ गुना से भी ज्यादा थी। यह तो 1995 के आस-पास लोगों को पता लगा कि यह गड़बड़झाला असल में मालिक मकबूजा नाम का बड़ा कांड था।
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