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बोलेरो क्लास

पुस्तक अंश

 

बोलेरो क्लास

प्रभात रंजन

कहानी संग्रह
प्रकाशकः प्रतिलिपि बुक्स, 182, जगराम मार्ग, बापूनगर, जयपुर
मूल्यः 150.00 रुपये

 

इंटरनेट, सोनाली और सुबिमल मास्टर की कहानी

बोलेरो क्लास

 

मुजफ्फरपुर वाले दिवाकर भईया का ईमेल आया था. लिखा था- पिछले कुछ समय से मुझे तरह-तरह के ईमेल आने लगे हैं. कई मेल अलग-अलग विदेश संस्थाओं के नाम से आए जिनमें यह सुखद सूचना होती है कि मेरे ईमेल पते को लकी ड्रा के आधार पर अलां या फलां पुरस्कार के लिए चुना गया है. पुरस्कार की राशि लाखों डॉलर या पाउंड में होती है.

पिछले महीने एक मेल आया, जिसमें लंदन के पते वाली एक संस्था ने मुझे सूचित किया कि उनकी पुरस्कार समिति ने मुझे पाँच मिलियन पौंड की पुरस्कार राशि के लिए चुना है. लिखा था कि पुरस्कार प्राप्त करने के लिए मुझे कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी. पहली औपचारिकता के तौर पर बायोडाटा, पत्र व्यवहार का पता, फोन नंबर आदि की मांग की गई थी. मैंने ईमेल से वह औपचारिकता पूरी कर दी. अगला मेल आया कि इतनी बड़ी पुरस्कार राशि विदेश में आपके पास भेजने के लिए कुछ कागज़ात बनवाने पड़ेंगे, पुरस्कार की राशि चूँकि आपको चेकस्वरूप दी जा रही है, इसलिए कागज़ात आदि बनवाने का खर्च आपको वहन करना पड़ेगा. यह खर्च नकद में करना होगा इसलिए भारत में आप हमारे निम्न बैंक के खाते में पचास हजार रुपए जमा करवा दें. पंद्रह दिनों के भीतर पुरस्कार राशि का चेक आपके द्वारा बताए पते पर कूरियर से प्राप्त हो जाएगा.

तुम तो जानते हो एलआईसी की नौकरी में इतना पैसा बचता कहाँ है कि नकद भिजवा सकूं. तभी मैंने दिल्ली के ‘टाइम्स ऑव इंडिया’ में समाचार पढ़ा कि इंटरनेट के माध्यम से दिल्ली से सटे गुड़गांव में छह महीने के दौरान करीब दर्जन भर लोग ठगे जा चुके हैं. समाचार पढ़कर मुझे लगा, हो न हो यह वैसा ही मामला हो. मैंने उस मेल का अब तक कोई जवाब नहीं दिया है… वैसे उनकी ओर से तकाज़े आते जा रहे हैं.

अभी मैं पांच मिलियन पौंड के पुरस्कार वाले इस ईमेल से जूझ ही रहा था कि पिछले सप्ताह एक और ईमेल आया जिससे मैं बड़ा परेशान हुआ. मेल करने वाले ने लिखा कि वह नाइजीरिया के एक निर्वासित राजकुमार का एटार्नी है. लिखा है- मेरे बारे में अच्छी तरह पता करने के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मैं उस निर्वासित राजकुमार की करोड़ों की संपत्ति की उचित देखभाल करने के लिए योग्य व्यक्ति हूँ. इस मेल में भी लिखा है कि इससे पहले कि उनकी संपत्ति मेरे नाम हस्तांतरित हो जाए, मुझे कुछ कागज़ी कार्रवाइयों की औपचारिकताओं से गुजरना पड़ेगा.

मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ. बैंक खाते में भले धन का अभाव रहता हो मेरे ईमेल खाते में इस तरह से आभासी रूप में करोड़ों रुपए जमा होते जा रहे हैं. मेरे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है… पत्नी सलाह देती रहती है कि ईमेल का कनेक्शन कटवा दीजिए नहीं तो किसी दिन किसी चाल में फंस जाइएगा… तुम ही कुछ सलाह दो… क्या करना चाहिए?

मैं सलाह क्या देता मुझे तो सुबिमल मास्टर की कहानी याद आने लगी है…

जिस दिन सुबिमल भगत मास्टर साहब ने इंटरनेट साइट इंडियन टीवी डॉटकॉम पर पर समाचार पढ़ा, समझिए उसी दिन से उनके जीवन की नई कहानी शुरू हो गई – कुसुमाकर ने किसी सधे हुए किस्सागो की तरह बताया. उस दिन सुबिमल भगत ने अपने सहकर्मी से एक और बात कही – अब मेरे सपने जल्दी ही पूरे हो जाएंगे. लैंसडाउन के माउंट कैलाश कान्वेंट स्कूल में हिंदी पढ़ाने वाले कुसुमाकर जी भी उस खबर को ध्यान से पढ़ने लगे.

इससे पहले कि कहानी आगे बढ़े, मैं इस कहानी की छोटी-सी कहानी भी आपको बता देना चाहता हूँ. कुसुमाकर तिवारी मेरा सहपाठी था. मुजफ्फरपुर के एस. आर. ओरिएंटल स्कूल से हमने मैट्रिक की परीक्षा साथ ही पास की थी. बरसों बाद एक दिन ट्रेन में उनसे भेंट हो गई. मैं मुंबई जा रहा था वह भी उसी ट्रेन में था… ट्रेन में ही नहीं मेरी ही बोगी में भी.

संयोगवश ऐसा भी हो जाता है…

अरे, आर. एस. तुम कहां जा रहे हो? इतने दिनों से तुम्हारी कोई खबर ही नहीं. दिल्ली क्या गए हमें भूल ही गए… मिलते ही एक साँस में बोलने लगा. वैसे बड़े दिनों बाद किसी ने रविशंकर की जगह स्कूल के उस पुराने नाम आर. एस. से बुलाया था, मैं पुराने दिनों खोने में लगा.

दिल्ली में रहते हो, कभी लैंसडाउन आओ घूमने. अरे, मैंने तो बताया ही नहीं बीएड करने के बाद वहीं माउंट कैलाश स्कूल में हिंदी टीचर का विज्ञापन आया, मैंने अप्लाई कर दिया और मेरा सलेक्शन हो गया. पाँच साल हो गए तब से वहीं हूँ. प्रकृति के इतने पास रहकर काम करने का मौका कहाँ मिलता है – मैंने ध्यान दिया कि वह पहले की ही तरह जल्दी-जल्दी बोलता है. क्या इंसान की आदतें कभी नहीं बदलतीं…

आजकल तुम क्या कर रहे हो?

एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक में कुछ साल काम करने के बाद नौकरी छोड़कर मुंबई जा रहा हूँ टेलीविजन धारावाहिक लिखने के चक्कर में…

नौकरी क्यों छोड दी? उसे जैसे विश्वास नहीं हो पा रहा था.

वैसे ही, संपादक कहता था रोज खाने-पीने की नई से नई जग़हों के बारे में जानकारी जुटाकर लाओ… फिल्मी सितारों के जीवन के बारे में ऐसे-ऐसे गॉसिप लिखो जैसे किसी ने सुने तक न हों…फैशन के बारे में पता रखो… एक दिन मैंने संपादक से कह दिया कि मनोरंजन के बारे में लिखने से अच्छा मुझे यह लगता है कि मनोरंजन की दुनिया में ही लेखक बनने की कोशिश की जाए. टेलीविजन सीरियल लिखा जाए. संपादक ने छूटते ही कहा आप इस्तीफ़ा दे दें और आराम से अपना यह शौक़ पूरा करने जा सकते हैं. मेरे लिए उसने कोई ऑप्शन ही नहीं छोड़ा. वैसे मेरे कुछ दोस्त हैं वहाँ उनसे मैंने बता दिया है. जा रहा हूँ तो काम भी उम्मीद है मिल ही जाएगा.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

navneet pandey [poet_india@yahoo.co.in] bikaner - 2011-05-15 14:32:01

 
  आज की दोहरी और मलिन, हीन मानसिकता व किसी व्यक्ति के व्यक्तित्त्व के विद्रूपता पूर्वक छिद्रान्वेषण का कच्चा चिट्ठा खोलती अच्छी कहानी 
   
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