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राष्ट्रीयता का यक्ष प्रश्न ?

पुस्तक अंश

 

राष्ट्रीयता का यक्ष प्रश्न ? शत्रु संपत्ति पर साम्प्रदायिक राजनीति

मनमोहन शर्मा|ओंकारेश्वर पांडेय

शोध आलेख
प्रकाशकः भारत नीति प्रतिष्ठान, डी-51, हौज खास, नई दिल्ली 110 016
मूल्यः 35.00 रुपये

 

यह संपत्ति किसकी है ?

राष्ट्रीयता का यक्ष प्रश्न

 

पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना जीवन पर्यन्त मुंबई स्थित अपना पॉश बंगला पाने के लिए संघर्ष करते रहे. इस बंगले को जिन्ना हाउस के रूप में जाना जाता है. उनकी बेटी दीना वाडिया भी इस संपत्ति को पाने में सफल नहीं हो सकी. लेकिन महमूदाबाद के राजा आमिर अली खान के बेटे और मुस्लिम लीग के कोषाध्यक्ष मोहम्मद आमिर मोहम्मद खान उर्फ सुलेमान खान, जो जिन्ना के करीबी थे, उन्होंने अपने पिता की संपत्ति को सुप्रीम कोर्ट में 32 वर्ष की कानूनी लड़ाई के बाद हासिल कर लिया, जिसे भारत ने शत्रु संपत्ति घोषित कर रखा था. सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2005 में खान के पक्ष में फैसला दिया. इसके बाद से ही भारत में शत्रु संपत्ति के मुद्दे पर नया विवाद शुरू हो गया. राजा महमूदाबाद की 50 हजार करोड़ से अधिक की संपत्ति है. दरअसल, इसी तरह हजारों करोड़ रुपये मूल्य की अन्य शत्रु संपत्तियां भी भारत में है.

एक दिलचस्प मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में आया था, जिसमें एक व्यक्ति ने आगरा शहर के एक तिहाई हिस्से और साथ ही ताजमहल पर हक का दावा करते हुए कुछ दस्तावेज भी पेश किया था. हालांकि 300 वर्ष पुरानी संपत्ति का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने इस केस को खारिज कर दिया. पर याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया है. इसी तरह शाहजहां पुर के कुदरत हुसैन, राजा सादात अली (बहराइच), अमीरुद्दीन और इलाहाबाद के राजा डॉ. मोहम्मद ने भी अपनी संपत्ति पर दावा ठोका है. प्राप्त सूचना के अनुसार फिलहाल ये सभी पाकिस्तान में हैं. लेकिन इस संपत्ति को पाने के लिए उनके द्वारा उत्तर प्रदेश के विभिन्न निचली अदालतों में दावे किये गये हैं. शत्रु संपत्ति कानून 1968, के अंतर्गत केंद्र सरकार ने सभी शत्रु संपत्ति की देखरेख के लिए कस्टोडियन की नियुक्ति की है.

यह मामला संसद के पिछले मानसून और शीतकालीन सत्रों के दौरान 2010 में चर्चा में आया, जब यूपीए सरकार का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने शत्रु संपत्ति (संशोधन एवं पुनर्पुष्टिकरण) विधेयक 2010 लोकसभा के मानसून सत्र में पेश किया. इस विधेयक का विभिन्न राजनीतिक दलों के मुस्लिम सांसदों ने विरोध किया, जिसका समाजवादी पार्टी, राजद, लोजपा और वाम दलों ने समर्थन किया. लेकिन इसकी उम्मीद नहीं की जा रही थी कि यूपीए सरकार मुस्लिम सांसदों के दबाव में तुरंत यू-टर्न ले लेगी. शीतकालीन सत्र में यूपीए सरकार ने मुस्लिम सांसदों की मांगों के अनुरूप मूल विधेयक में संशोधन कर नया शत्रु संपत्ति (संशोधन एवं पुनर्पुष्टिकरण) विधेयक द्वितीय 2010 किया. हालांकि 2जी घोटाले के कारण विपक्ष के भारी दबावों में घिरी संप्रग सरकार सदन में कामकाज नहीं हो पाने के कारण शीतकालीन सत्र 2010 में इस पर चर्चा नहीं करा पायी. पर इस विधेयक का देश की एक लाख करोड़ की संपत्ति पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा.

इस विधेयक के बारे में मुस्लिम सांसदों एवं बुद्धिजीवियों द्वारा गत कई महीनों से राजनैतिक गलियारों एवं मीडिया में अभियान चलाये जाने की वजह से केंद्र सरकार को 2 जुलाई 2010 को राष्ट्रपति द्वारा जारी शत्रु संपत्ति अध्यादेश को निष्प्रभावी बनाने पर विवश होना पड़ा. 2 अगस्त 2010 को लोकसभा में गृहमंत्री द्वारा प्रस्तुत शत्रु संपत्ति (संशोधन) विधेयक का सदन में खासा विरोध हुआ. लेकिन इस पर पूरी चर्चा से पहले ही सत्र समाप्त हो गया और सरकार ने भी चुपचाप इसे वापस ले लिया. इस संदर्भ में दैनिक एशियन एज ने 31 अगस्त 2010 के अंक में एक समाचार ‘Government will redraw enemy property bill’ शीर्षक से प्रकाशित किया था, इस समाचार के अनुसार जब 2 अगस्त को सदन में शत्रु संपत्ति विधेयक पेश किया गया तो उसका विरोध समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव और राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने करते हुए इसे मुस्लिम विरोधी बताया था और उसमें संशोधन की मांग की थी. इस पर गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने सदन में आश्वासन दिया था कि सदस्यों की भावनाओं का सम्मान करते हुए नया संशोधित विधेयक संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया जाएगा.

शत्रु संपत्ति कानून 1968, की जगह केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विचार विमर्श के बाद शत्रु संपत्ति (संशोधन एवं पुनर्पुष्टिकरण) विधेयक 2010 का नया प्रारूप सदन में विचारार्थ पेश किया था.

इस नए विधेयक के प्रारूप एवं पुराने अध्यादेश एवं विधेयक में काफी अंतर है. राष्ट्रपति ने जो अध्यादेश जारी किया, उसमें यह प्रावधान था कि 1968 में जारी मूल शत्रु आधिनियम कानून को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी. जबकि वर्तमान संशोधन विधेयक में यह प्रावधान किया गया कि 2 जुलाई 2010 के बाद से अदालतों को इस विधेयक के तहत कस्टोडियन द्वारा अपने नियंत्रण में ली गई संपत्तियों को मूल मालिकों के उत्तराधिकारियों को वापस करने के बारे में विचार करने का अधिकार नहीं होगा.
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