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जल क्षेत्र में जन-निजी भागीदारी भागीदारी या निजीकरण

पुस्तक अंश

 

जल क्षेत्र में जन-निजी भागीदारी भागीदारी या निजीकरण

गौरव द्विवेदी

पानी के निजीकरण पर शोध आलेख
प्रकाशकः मंथन अध्ययन केंद्र, दशहरा मैदान रोड, बड़वानी, मध्यप्रदेश 451 551
मूल्यः 75.00 रुपये

 

पीपीपी क्यों?

पानी का निजीकरण

 

विश्व बैंक सीएएस 2009.12 ने ‘‘निजीकरण को सार्वजनिक क्षेत्र की सभी बीमारियों की रामबाण दवा’’ के रूप में उल्लेखित किया है। वैसे ही पानी, ऊर्जा, यातायात, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि क्षेत्रों की सार्वजनिक सेवाओं की सभी समस्याओं का निदान करने और इन सेवाओं को कुशलतापूर्वक और आर्थिक सक्षमता के साथ प्रदान करने के लिए निजीकरण को प्रोत्साहित किया था। अब डेढ़ दशक से अधिक समय से यह धारणा व्यापक रूप में स्वीकार की गई है कि निजीकरण ही सार्वजनिक सेवाओं में सुधारों जैसे निवेश, कार्यक्षमता, सेवाप्रदाय, जवाबदेही आदि के लिए एकमात्र समाधान है।

1990 के दशक में-एक अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (आईएफसी) दस्तावेज का निष्कर्ष था, जो उस समय शायद बहुत जल्दीबाजी में लिया गया था, ‘‘निजीकरण शब्द जो कि एक दशक पूर्व लगभग अनजाना था अब वह यहीं रहेगा या तो पूर्ववर्ती समाजवादी देशों में प्रतिस्पर्धी बाजार अर्थव्यवस्था की लम्बी राह के आवश्यक प्रथम चरण के रूप में या लातिनी अमेरिका, एशिया और अन्यत्र निजी क्षेत्र की अगुआई में वृद्धि पाने की कुंजी के रूप में आईएफसी का उद्देश्य विकासशील विश्व में उत्पादक निजी उपक्रमों की वृद्धि को बढ़ावा देकर आर्थिक विकास को बढ़ाना है और एक दशक से निजीकरण हमारी प्राथमिकताओं में से एक है। रूस और भूतपूर्व सोवियत संघ के अन्य गणराज्यों के उद्यमों को निजी स्वामित्व में हस्तांतरित करने में हमने मुख्य भूमिका निभाई है, और अब हम रूस के बड़े राजकीय कृषि फार्मों के निजीकरण में वही भूमिका निभा रहे हैं’’। (मूल दस्तावेज में जोर दिया गया है) इसी दस्तावेज में निजीकरण किस तरह कार्य करता है, कौन से कारक इसमें शामिल है और इससे लोगों को किस प्रकार के लाभ मिलते हैं, इस बाबत एक सुंदर कहानी भी है। बॉक्स-1 देखिए –

 

बॉक्स -1
निजीकरण दो घोड़ों की एक गाड़ी है
आईएफसी के एक अधिकारी ने कहा-‘‘निजीकरण करना दो घोड़ों की एक गाड़ी चलाना है। इसमें गाड़ी उपक्रम है। एक घोड़ा राजनीतिक लक्ष्य है जो बड़ा चंचल और उड़ान भरने वाला है, दूसरा अर्थव्यवस्था है जो स्थिर व मंद गति है। निजीकरण की उबड़-खाबड़ और पथरीली राह पर इन दोनों को ही गाड़ी को खींचना है। पूरी गाड़ी में पुरानी उत्कृष्ट अंगूरी शराब के बक्से भरे हैं और इन घोड़ों के कारण यह दुर्भाग्यपूर्ण है जो गाड़ी को ज्यादातर अलग-अलग दिशाओं में खींच रहे हैं। शराब की इन बोतलों, जिन पर बेहतर कुशलता, उच्च विक्रय मूल्य, प्रभावी निगमीय प्रशासन, आर्थिक निवेश आदि लेबल चस्पा है, का मजा तब ही लिया जा सकता है जब गाड़ी अपने लक्ष्य स्थान तक पहुंचे।’’

‘‘केवल श्रेष्ठतम सारथी ही इस राह पर आगे बढ़ सकता है-निहित स्वार्थों की पहाड़ी चढ़ाई पर ;कुछ बक्सों को यहाँ उतारना पड़ सकता है और कुछ घोड़े भी इतने मजबूत नहीं जो इन सबको लेकर चढ़ सकें। विदेशी विद्वेश की नदी को पार करने में एक या दो बक्से पीछे गिर सकते हैं कुछ गाड़ियाँ इतनी कमजोर होती हैं कि वे निजीकरण तक पहुंचने से पहले ही टूट जाती है। कभी-कभी बुद्धिमानी इसमें है कि राह में बक्सों के बाद बक्सों को गिराते हुए तेज उड़ने वाले घोडे़ को राह पर सीधे दौड़ा दिया जाए। कभी-कभी उसे अपने स्थिर साथी के साथ-साथ चलने के लिए कोड़े से काबू में भी लाना संभव है। अनेक सारथी हार जाते हैं और इस उम्मीद में घोड़ों को खुला छोड़़कर, गाड़ी से उतर कर वापस लौट जाते हैं कि यदि कोई बोतल न फूटी होगी तो उसका मजा लेंगे।’’
Internation Finance Corporation, (1995) Preface

हालांकि लगभग डेढ़ दशक बाद, अनेक निजी परियोजनाओं, विशेषतः पानी के क्षेत्र में, के प्रमाणों से यह दिखाई देता है कि निजीकरण का मॉडल मौजूदा समस्याओं के दीर्घावधि और स्थाई हल प्रदान करने में असफल रहा है। वास्तव में, कई बड़ी जानीमानी निजी परियोजनाएँ असफल हो गई हैं। इन निजी परियोजनाओं को तेजी से बढ़ती जल दरों, अक्षम संचालन और निम्न गुणवत्ता की सेवा के कारण तीव्र राजनैतिक एवं सामाजिक प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा।

वास्तव में, विश्व बैंक की एक अधिकारी, ईसाबेल गुरेरो, जो रूसी और मैक्सिको के निजीकरण कार्यक्रम से जुड़ी हुई थी, ने स्वीकारा कि ‘‘निजीकरण को आगे बढ़ाना एक भूल थी’’। देखिए बॉक्स-2

 

बॉक्स- 2
भूल की स्वीकारोक्ति
एक दशक से ज्यादा समय के बाद, विश्व बैंक की अधिकारी स्वीकार करती है कि ‘‘निजीकरण एक भूल थी’’। विश्व बैंक की भारत में प्रमुख अधिकारी ईज़ाबेल गुरेरो ने अक्टूबर 2007 में तहलका को दिए एक साक्षत्कार में कहा-‘‘शायद कभी-कभी हम पर उचित कारणों से आरोप लगते हैं। .......आरोपों के लिए पिछले समय की कुछ सच्चाईयाँ है। हमने निजीकरण को अवश्य आगे बढ़़ाया। पतन के बाद के सोवियत संघ जाने वाली टीम में मैं भी शामिल थी और हम सब ने कहा था कि निजीकरण एक अच्छा समाधान है। और बाद में हमने यह अनुभव किया कि यह एक भूल थी। क्योंकि पहला कारण यह था कि उस समय वहाँ कोई संस्था नहीं थी और हमने संस्थाओं के महत्त्व को नहीं समझा। यदि आपके पास सही अभिशासन (गवर्नन्स) न हो तो निजीकरण पर कुछ ही लोगों का कब्जा हो जाता है और तब आप असमानताएँ पैदा करते हैं। मैक्सिको छोड़़ने के ठीक पहले मैंने एक पर्चा लिखा था जो ठीक यही कहता है। 1990 के दशक में निजीकरण, जो शायद विश्व बैंक की सहायता से हुआ था, के परिणामस्वरूप खूब सारा समेटकर कुछ लोग बहुत अमीर हो गए और वे नुकसान पहुँचाते हैं। निजी एकाधिकार के कारण मेक्सिको में टेलिफोन की दरें विश्व में सर्वाधिक है और यह बुरे निजीकरण के कारण हुआ’’।
- तहलका (अंग्रेजी) के 13 अक्टूबर 2007 के अंक में ‘निजीकरण बहुत थोड़े हाथों में अत्यधिक दौलत दे देता है’ शीर्षक से इज़ाबेल गुरेरो द्वारा दिए गए साक्षात्कार का अंश।
स्रोत - http://www.tehelka.com/story_main34.asp? filename=Bu131007PRIVATISATION.asp

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