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मुझ पर भरोसा रखना

पुस्तक अंश

 

मुझ पर भरोसा रखना

विन्सेंट वान गॉग के पत्र भाई थियो के नाम
अनुवाद व संपादनः राजुला शाह


प्रकाशकः सीज़नग्रे

मूल्यः 450 (डाक व्यय अतिरिक्त)

 

डाक द्वारा पुस्तक मंगाने का पता
ज्योत्सना मिलन

अनसूया कार्यालय, हिंदी भवन परिसर, शामला हिल्स, भोपाल 462 002

फोनः 0755 2738702 www.seasongray.wordpress.com seasongray@gmail.com

 

संजय भारती

212 सी एल/ए अशोक मित्र रोड, कांचरापाड़ा-743 145

फोनः 033-25850249


 

प्रिय थियो,

कुछ ख़ास है जो तुम्हें बतलाना है। हो सकता है तुम जानते हो और तुम्हें यह नई ख़बर न लगे। बहरहाल मैं तुम्हें उस प्रेम के बारे में बताना चाहता हूँ, जो इन गर्मियों में मैंने हमारी दूर की रिश्तेदार की के लिए महसूस किया है। किंतु जब मैंने उसे यह बतलाया तो उसने कहा कि उसके लिए भूत और भविष्य एकसार हैं और वो मेरी भावनाओं का प्रतिदान करने में कभी भी समर्थ नहीं होगी।

मुझे एक विचित्र अनुभव हुआ। मेरी समझ ही जैसे बंद हो गई। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मेरी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। क्या मुझे उसका ‘नहीं, नहीं, कभी नहीं’ स्वीकार कर लेना चाहिए ?

यह सब मैंने तुम्हें पहले इसलिए नहीं लिखा क्योंकि सब कुछ बहुत ही धुँधला और अनिश्चित सा था। इसलिए मैंने मामले को गंभीरता से लेते हुए की के अलावा इस विषय पर माँ, पिताजी, स्ट्रेकर अंकल-आंटी और प्रिंसनहेज वाले अंकल-आंटी से भी चर्चा की। इनमें से केवल एक व्यक्ति को मेरी उम्मीद ना छोड़ने के इरादे में थोड़ा सार दीखा और वह भी वो व्यक्ति जिससे यह सर्वथा अनपेक्षित था--हमारे अंकल विन्सेंट। उन्हें खासतौर पर मेरा की के ‘नहीं, कभी नहीं’ को लेने का ढंग जँचा--कुछ असंजीदा, कुछ कुछ खिलंदड़ा सा तरीका। जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं ऐसे ही हर तरह के अवसाद और निराशा से परे, अपनी मेहनतकश ज़िंदगी जीते हुए चलते जाना चाहता हूँ। उससे मिलने के बाद न जाने मुझे ऐसा क्यों लग रहा है, कि मेरे काम भी कुछ बदलाव आया है।

मेरी स्थिति अब कमोबेश स्पष्ट है! सबसे अधिक समस्या मुझे इन बड़े-बूढ़ों के साथ होगी जिनके लिए यह फाइल ही अब बंद हो चुकी है और वे चाहते हैं कि मेरे लिए भी वैसा ही हो। मुझे लगता है, कुछ समय तक तो वे मेरे साथ शालीनता से पेश आएँगे और फिर धीरे से मुझे बीच अधर में छोड़कर अंतर्धान हो जाएँगे। एक दिन सहसा धीरे से मुझे सबसे काटकर अलग कर दिया जाएगा।

ऐसी कड़ी बातें बोलने के लिए मैं माफी चाहता हूँ। किन्तु यथास्थिति बतलाने के लिए ये जरूरी है। मैं मानता हूं कि इस वर्णन में मैं रंग कुछ भड़कीले लगा रहा हूँ और रेखाएँ कुछ ज़्यादा ही रूखी, किंतु इसीलिए कि तुम्हें एक स्पष्ट तस्वीर मिले। इसलिए कृपया इसे बुज़ुर्गों के प्रति असम्मान न समझना। मेरा ख्याल है कि वे ऐसा रुख जानबूझकर अपना रहे हैं; उनकी कोशिश रहेगी कि मैं और की एक दूसरे से मिलकर बातचीत या मेल मिलाप न बढ़ाएँ क्योंकि उस स्थिति में की के विचार और इरादे बदलने की संभावना है जो उन्हें कतई नहीं सुहाएगा।

की स्वयं सोचती है कि उसका निश्चय ध्रुव है और बड़े-बुज़ुर्गों ने भी मुझे यह दिखलाने की चेष्टा में कोई कसर नहीं छोड़ी है। वे बदलाव की संभावना से आक्रांत हैं। साथ ही लगता है कि उनका ख्याल बदल भी सकता है, की के विचार बदलने पर नहीं, बल्कि तब, जब मैं एक हजार गिल्डर्स के आसपास की आय का इंतजाम कर लूँ। इन रूखी रेखाओं में स्थिति के चित्रण के लिए माफी चाहता हूँ। शायद सभी तुम्हें ये बताना चाहें कि मैं परिस्थिति पर अपनी ओर से कुछ थोप रहा हूँ; किंतु ये तो सब जानते हैं कि प्रेम में ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं होती। इसलिये यह तो ख्याली तौर पर भी मेरे ज़ेहन का हिस्सा नहीं। किंतु मुझे नहीं लगता की से मिलने, बात करने, पत्र लिखने की मेरी इच्छा को बेजा माना जाना चाहिए। इससे हम एक दूजे को कुछ बेहतर जान सकते हैं, मिसाल के तौर पर यही कि हम दोस्ती के लायक हैं भी या नहीं। ऐसा खुला द्वार तो दोनों के ही लिए अच्छा हो सकता है। किंतु इस मुद्दे पर सभी बड़े-बुज़ुर्ग कमर कसकर मेरे विरोध में डटे हुए हैं। खैर। अब तक तुम इतना तो जान गए होगे कि मैं भी कोई कम जिद्दी नहीं हूँ। मैं उसके निकट आने के लिए जो कुछ भी मुझसे बन पड़ेगा करूँगा।

तब तक प्रेम करूँगा उससे
जब तक ना करे वह मुझसे

थियो, क्या तुम भी प्रेम में हो? काश तुम होते। सच मानो तो इसके छोटे छोटे दुःख भी मूल्यवान हैं। कभी कभी मन बहुत उदास हो जाता है, कभी ऐसा लगता है मानो आप साक्षात नर्क में पहुँच गए हों-किंतु उसके साथ ही बहुत सी सुंदर चीज़ें भी होती हैं। समझ लो जैसे प्रेम की ये तीन अवस्थाएँ हैं,

-न किसी को प्रेम करना, न किसी का प्रेम पाना
-प्रेम करना किंतु उसका प्रतिदान न पाना (जो मेरी स्थिति है)
-प्रेम करना और प्रेम पाना

ज़ाहिर है दूसरी स्थिति पहली से अधिक वरणीय है और तीसरी से बेहतर क्या हो सकता है।
तो दोस्त, प्रेम में जरूर पड़ो, और उसके बारे में मुझे बताओ भी। तब तलक और कुछ नहीं तो मेरी स्थिति के लिए तुम मुझे सांत्वना तो दे ही सकते हो और थोड़ी मैं तुम्हें !

रैपार्ड आया था। वह अपने संग कुछ जलरंग वाले काम लाया था जो बहुत ही गज़ब थे। मॉव भी जल्द ही आएगा या फिर हो सकता है मैं ही उसके पास चला जाऊँ। मैं बहुत काम कर रहा हूँ और शायद ड्राईंग में थोड़ा सुधार भी है। अब मैं ब्रश से अधिक काम कर रहा हूँ। जाड़ा इतना बढ़ गया है कि अब मैं अधिकतर घर के भीतर ही धूनी रमाता हूँ। मॉडल के लिए कभी किसी दर्जिन को बिठा लेता हूँ तो कभी किसी टोकरी बनाने वाली को। तो,

फिलहाल बस इतना ही...... मुझ पर भरोसा रखो और जल्दी लिखो।

तुम्हारा
विन्सेंट

...और यदि तुम्हें कभी प्रेम में ‘नहीं कभी नहीं’ सुनने मिले तो उसे चुपचाप स्वीकार मत करना। खैर, तुम्हारा भाग्य बलवान है और मुझे विश्वास है तुम्हारे संग ऐसा होगा ही नहीं।
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