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कहानी का लोकतंत्र

पुस्तक अंश

 

कहानी का लोकतंत्र

पल्लव
 

तय था हत्या होगी
(समकालीन कहानी में किसान)

कहानी का लोकतंत्र

आलोचना

पल्लव

प्रकाशकः आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा

मूल्यः 250 रुपये


“हिन्दी के विमर्शवादी लेखन ने साहित्यिक रचनाओं के विषयों को बहुत सीमित कर दिया है. ....... भारतीय किसानों में ज्यादातर लोग वही हैं जो इन साहित्यिक विमर्शों के पात्र है लेकिन विमर्शों की राजनीति के चलते किसान को किसान के रूप में या मजदूर को मजदूर के रूप में देखने के बजाय स्त्री, दलित, आदिवासी आदि के रूप में देखना जरूरी हो जाता है और यह भुला दिया जाता है कि साम्राज्यवाद किसी देश पर (प्रत्यक्ष या परोक्ष) आक्रमण करते समय वहाँ के लोगों की लिंग, जाति, धर्म, क्षेत्र जैसी पहचानें नहीं पूछता और अपने देश की सरकार अगर किसानों की दशा सुधारने के लिए भूमि सुधार जैसे उपाय करना चाहे, तो ऐसे उपाय इन अलग-अलग पहचानों के आधार पर नहीं किये जा सकते.” -रमेश उपाध्याय, कथन - 54

तो क्या यह एक कारण है कि हिन्दी कहानी के अपूर्व उछाल के इस लकदक दौर में किसान नहीं है? प्रेमचंद, रेणु, शेखर जोशी, विद्यासागर नौटियाल, सुरेश कांटक या विजेन्द्र अनिल की कहानियों आते रहे वे किसान कहानी में नहीं अखबार में एक या दो कॉलम की खबर में कैद हो गए जिसका शीर्षक हमेशा ‘आत्महत्या’ से मिलता जुलता होता है. भारत खेती किसानी करने वालों का देश है, यहीं ‘उत्तम खेती मध्यम बान, नीच नौकरी भीख निदान’ जैसी कहावत प्रचलित हो सकती थी और हमारे देखते-देखते किसानी से मुक्ति खोजता किसान जीवन से भी हार मानता जा रहा हैै. यह पूंजीवादी भूमण्डलीकरण की नीतियों का ही परिणाम है कि हमारे यहाँ किसानी पर सबसे ज्यादा मार पड़ी है और देश के सबसे सम्पन्न इलाकों के किसानों ने सबसे ज्यादा आत्महत्या की. आत्महत्या समस्या का निदान हर्गिज नहीं है लेकिन इससे इन किसानों की निरुपायता और प्रतिरोध की बलवती इच्छा का परिचय तो मिलता ही है. शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी,1936 में प्रेमचंद ने विश्वसनीय ढंग से दिखा दिया था कि खेती अब मुनाफे का सौदा नहीं रही. होरी का बेटा गोबर शहर चला जाता है न लौट आने के लिए. इसके बाद आजादी की नयी बयार में हरित क्रांति, श्वेत क्रांति जैसे कुछ पल तो आए लेकिन यह सब बहुत थोड़ी देर का दृश्य था. बीते दस¬-बीस वर्षों की बात की जाए तो कृषि संरचना में नये दबाव और ग्रामीण जीवन में धन की गैर जरूरी कृत्रिम भूख ने मिलकर तबाही का यह दृश्य निर्मित किया है. उपभोक्तावाद मध्य वर्ग का ही दुश्मन नहीं है बल्कि उसने छोटे किसानों - मजदूरों और बच्चों को भी अपनी चपेट में ले लिया है. इस दौर की हिन्दी कहानी को देखें तो सीधे-सीधे और प्रकारान्तर भी दुर्दशा का दस्तावेज मिलता है जो किसानों के जीवन को बेहद बारीकी से देख रहा है.

जयनन्दन के करीब दस-बारह वर्ष पहले आए अपने संग्रह ‘विश्व बाजार का ऊँट’ में ‘छोटा किसान’ शीर्षक से एक कहानी लिखी थी जिसमें दादू महतो के गाँव छोड़ जाने का वृत्तान्त बुना गया था. असल बात यह है कि गोबर के शहर जाने की प्रक्रिया कभी थमी नहीं लेकिन इसे नयी गति इन पिछले सालों में ही मिली जब किसान को यह पक्का विश्वास हो गया कि रात दिन करने पर भी फसल की लागत न निकलना तय है और खेती अब वाकई झूठी मरजाद है. इस दृष्टि से देखें तो शहर आकर रिक्शा चला रहे, होटलों पर काम पर रहे या कैसी भी मजदूरी कर रहे आदमी की कहानी दरअसल उस किसान की ही कहानी मालूम होती है जो अपने खेतों से निकाल दिया गया है. खेतों से चिपक कर गाँव में रह रहा किसान जब भी कहानी में आया तब उसने कोई प्रसन्न करने वाला समाचार नहीं दिया. क्या आश्चर्य कि इन ज्यादातर कहानियों का अंत भी दुखद और त्रास से भरा ही था. जयवंदन के दादू महतो गांव ऐसे छोड़ रहे हैं मानो जीवन से ही विदा ले रहे हों. कहानीकार भी उसके यहाँ खबर लेने पहुँचा तो साथ में बैंक या प्रशासन के वे अफसर थे जो उससे कर्जा वसूलने जा रहे थे. कैलाश बनवासी ने अपने दूसरे कहानी संग्रह ‘बाजार में रामधन’ (2004) में दो बातें स्पष्ट कर दी थी, पहली पारंपरिक कृषि की विदाई और दूसरी गाँव की उपजाऊ भूमि पर इण्डस्ट्री की नजर. इस संग्रह की शीर्षक कहानी बैलों की बिक्री के बहाने पारंपरिक किसानी का मर्सिया सुनाती है तो ‘एक गाँव फुलझर’ में लग रहा कारखाना गाँव के जीवन को किसी भी तरह उन्नत करने का संकेत नहीं दे रहा था. हाल में आए उनके नये संग्रह ‘पीले कागज की अगली इबारत (2008) की एक कहानी ‘झुका हुआ गाँव’ में वे बताते हैं - ‘गाँव में अजब सी उदासी पसरी थी. गली, घर, छप्पर-छानी सब ओर इसी उदासी का भूरा रंग था. परती जमीन का धूसर रंग.’ इन बीते चार सालों में यहाँ के ज्यादातर लोग बैंक के कर्जदार हो चुके हैं और अब बैंक के अफसर आए हैं जो ‘ऋण वसूली कैंप’ में बैठे हैं. और सब यही कह रहे थे - छूटबो साहब... छूटबो मालिक! हर कोई कर्जे से मुक्त होना चाहता है लेकिन कहाँ से लाए वह धन जो उसे मुक्ति दे ? वरिष्ठ कथाकार पुन्नी सिंह को कहानी का शीर्षक भी ‘मुक्ति’ ही था जो ‘परिकथा’ के प्रवेशांक (मार्च-अप्रेल 2006) में प्रकाशित हुई थी. यह कहानी किसानों की समस्या का दूसरा चित्र है. इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि खेती का रहे एक तबके में संपन्नता भी आई. वे बड़े किसान, मझोले किसान या ऐसे किसान थे जिन्हें आय के दूसरे स्रोत भी हासिल थे. इस कहानी में कृषि में एम.एससी. की उपाधि प्राप्त एक युवा किसान रविंदर आत्महत्या कर लेता है और इसका एक ही कारण है भूख. यह भूख धन अकूत धन के लालच से पैदा हुई है. रातों रात अमीर बन जाने का लालच. कौन बनेगा करोड़पति. कहानी घर-घर की. चमचमाती कारें, झकाझक साड़ियाँ और आलीशान मकान. रविंदर पढ़ा लिखा है और नये दौर का किसान है. उसे लगता है कि गेहूँ, मक्का या दूसरी पारंपरिक फसलों के दिन लद गए. वह नयी खेती करना चाहता है. सफेद मूसली की खेती. लाख-सवा लाख की लागत लगाकर बीस लाख रुपये कमाने की उसकी जिद इतना धन तो दे ही देती है कि वह सल्फास की गोलियाँ खरीद सके.
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