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अदम गोंडवी की ग़ज़लें

स्मरण

 

अदम गोंडवी की ग़ज़लें


सुप्रसिद्ध कवि अदम गोंडवी ऊर्फ रामनाथ सिंह का 18 दिसंबर को निधन हो गया. वे पिछले कई महीने से बीमार चल रहे थे. यहां हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुये उनकी कुछ ग़ज़ले प्रस्तुत कर रहे हैं.

काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास में

अदम गोंडवी

उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में
000
मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की

आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की

यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी
ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की?

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की

याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार
होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की.
000
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है
000
हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये
000
जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में
गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गयी
राम सुधि की झोपड़ी सरपंच की चौपाल में

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए
हम को पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में
000
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है

लगी है होड़-सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
000
वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करें

लोकरंजन हो जहां शम्बूक-वध की आड़ में
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें

कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्या करें

बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है
ठूंठ में भी सेक्स का एहसास लेकर क्या करें

गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें

18.12.2011, 12.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

वीरेंद्र त्रिपाठी [virendratripathi009@gmail.com] लखनऊ - 2016-08-30 18:36:47

 
  अदम गोण्डवी अपनी माटी से जुड़े रचनाकार रहे ।वे मजलूमों , शोषितों के हिमायती थे । विनम्र श्रद्धांजलि । 
   
 

रणजीत प्रताप सिंह [ranjeetpratap1987@gmail.com] चकरौत गोण्डा उ प्र - 2015-10-19 14:37:03

 
  अदम जी ने बेझिझक समाज की कुरीतियो पर प्रकाश डाला समाज की बुराइयों को निष्पक्षता के साथ वर्णित किया हमारा समाज ऐसे महान कवि का हमेशा ऋणी रहेगा 
   
 

श्रीश राकेश जैन [] लहार,म.प्र. - 2012-01-20 18:16:55

 
  अदम साहब जमीन से जुड़े रचनाकार रहे हैं. उन्होंने जिस बेबाकी और सादगी के साथ ज्वलंत मुद्दों पर निडर होकर कलम चलायी है, उसकी वजह से वे हर आम आदमी के चहेते बन गए. उनकी शायरी हिंदी की बहुमूल्य धरोहर है साथ ही आम आदमी का संबल भी. उन्हें मेरा शत-शत नमन. 
   
 

vipin bihari shandilya [vicharmimansa27@gmail.com] balaghat-madhyapradesh - 2012-01-01 06:34:30

 
  अदम गोंडवी साहब सच्चे मायनों में जनकवि थे. इस युग के इस \"निराला\" को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि. 
   
 

Ram Balak Roy Raman [] samastipur - 2011-12-23 16:28:08

 
  बहुत तौली हुई कविता गोंडवी साहब की मिली. मेरी ओर से उनको श्रद्घांजलि. 
   
 

शरद कोकास [sharadkokas.60@gmail.com] दुर्ग - 2011-12-18 14:33:46

 
  अदम गोंडवी साहब के निधन का समाचार आज मुझे गोंडा से एक ऐसे शख्स ने फोन पर बताया जिनका साहित्य से कुछ लेना देना नहीं है । इस कदर लोकप्रिय थे वे जन जन में । उन्हे विनम्र श्रद्धांजलि और उनकी रचनाओं को यहाँ प्रस्तुत करने के लिये आपको बहुत बहुत धन्यवाद ।  
   
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