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नामवर होने का अर्थ-एक

नामवर होने का अर्थ-एक

 

परिमल की वह गोष्ठी और नागार्जुन का संग-साथ

भारत यायावर


24 अगस्त, 1952 को नामवर प्रयाग पहुँचे. रविवार था. शंभुनाथ मिश्र के घर ‘परिमल’ की गोष्ठी हो रही थी. अध्यक्षता डॉ॰ रघुवंश कर रहे थे. सबसे पहले सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने पिछली बैठक का विवरण पढ़ा. फिर धर्मवीर भारती के नए उपन्यास ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ पर चर्चा शुरू हुई. विजयदेव नारायण साही ने सबसे पहले इस उपन्यास की मौखिक समीक्षा शुरू की. उन्होंने इस उपन्यास के निष्कर्षवादी कहानीपन के व्यंग्य तथा मासिक कथा-चक्र, अनध्याय आदि बातों पर स्टाइनबेक का असर ही नहीं, नकल बताया. उन्होंने यह भी कहा कि इस नकल में स्टाइनबेक की तरह यथार्थ की पकड़ और पात्रों के प्रति सहानुभूति और सामूहिक शक्ति का अभाव है. डॉ॰ हरदेव बाहरी ने कहा कि लेखक ने टेकनीक पहले चुनी और कथा बाद में ली. नामवर ने इस उपन्यास पर पाँच बातें बताईं –


1.समालोचकों के प्रति अत्यधिक सतर्क रहने के कारण उपन्यासकार भारती ने उपन्यास के पात्रों के स्वाभाविक जीवन और गतिविधि को कुंठित कर दिया है.
2.यह उपन्यास नहीं कथाख्यान है, घटनाएँ घटित होती नहीं दिखाई जातीं, बल्कि सूचित की जाती है.
3.इसमें अनेक प्रकार की शैलियों को समेटने की चेष्टा की गई है और कैशोर्य कथ्य उसका भार सम्भालने में लचक गया है.
4.यथार्थ और स्वप्न में विरोध ही नहीं, असंबद्धता भी है. काश ! लेखक का स्वप्न माणिक मुल्ला का स्वप्न बनकर आता.
5.पूरा उपन्यास एक बहुत बड़े उपन्यास के कथामुख हैं.

नामवर की टिप्पणी के बाद नर्मदेश्वर चतुर्वेदी, इलाचन्द्र जोशी, सुरतदास, ओंकारनाथ श्रीवास्तव, जितेन्द्र, अजित कुमार ने इस उपन्यास पर अपनी-अपनी बातें रखीं. साही ने पुनः पूर्व में दिये गये अपने वक्तव्य को विस्तृत रूप में प्रस्तुत कर स्पष्ट किया. अंत में, धर्मवीर भारती ने अत्यंत ही विनम्रता से सभी की बातों को स्वीकार किया और नामवर की रचनात्मक आलोचना के लिए कृतज्ञता प्रकट की. भारती की बातों से नामवर को लगा कि वे उनके विचारों को जानने के लिए पहले से बहुत आकुल थे.

‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ पर विचार-विमर्श समाप्त होने के बाद गिरिधर के ‘अग्निमा’ काव्य-पुस्तक पर चर्चा प्रारम्भ हुई. धर्मवीर भारती ने इस पुस्तक का परिचय देते हुए कहा कि यह वर्तमान प्रगति की सड़क के किनारे का उपेक्षित फूल है. डॉ॰ बाहरी ने उसके श्मशान प्रेम पर प्रहार किया और भाषा सम्बन्धी 84 दोष दिखाए. नामवर ने कहा कि उपन्यास की आलोचना करने के बाद कविता की आलोचना करने के लिए दृष्टिकोण और ढंग बदलना आवश्यक है. यह वर्तमान प्रगति की सड़क के किनारे का फूल नहीं बल्कि हमारे ही कल के गाए हुए गीतों की गूँज है - यानी वह आज से दस वर्ष पहले के हिन्दी गीतिकाव्य का अंग है - वह गीतिकाव्य जो छायावादी गीतों तथा उर्दू गजलों के समन्वय से बच्चन के रूप में प्रकट हो रहा था. यह उस युग की समूची काव्य-क्रिया का प्रतिनिधि नहीं बल्कि उसके एक तार-गति का प्रतिनिधि है. अतः इसमें सबकुछ खोजना अनुचित है. वैयक्तिता इसका गुण भी है और दोष भी. गुण इस मायने में कि उससे तन्मयता अथच् मार्मिकता आयी है. किन्तु दोष इसलिए है कि श्दमहंजपअम बंचंइपसपजलश् (आत्म-निषेध की योग्यता) का अभाव है. इससे प्रतीकों और उपमाओं में बहु-जीवन की छवियाँ न आ सकीं. इसकी गीतिमयता में एकस्वरता है.

विजयदेव नारायण साही ने नामवर के विचारों में अंतर्विरोध बताया और ‘निगेटिव कैपेबिलिटी’ की नामवर की अवधारणा का खण्डन किया. धर्मवीर भारती ने बीच में बोलने का समय माँगकर साही को उत्तर दिया और नामवर के मंतव्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘आत्मनिषेध’ का अर्थ ‘स्वानुभूति निषेध’ नहीं है. नामवर को भारती की सूझ और पकड़ पर खुशी हुई. साही ने भारती के क्षेपक के बाद नामवर की टिप्पणी पर फतवा देने का आरोप लगाया, जिसे डा॰ रघुवंश ने गलत बताया और इसके लिए साही को कड़ाई से रोका भी. सुबह आठ बजे से प्रारम्भ हुई यह गोष्ठी दोपहर को जलपान के साथ समाप्त हुई.

गोष्ठी के उपरांत नर्मदेश्वर चतुर्वेदी नामवर को अपने घर ले गए. उन्होंने एक ही थाल में नामवर के साथ भोजन किया. ब्राह्मण होते हुए चतुर्वेदी जी ने ऐसा कदम उठाया था कि एक ही थाल में दोनों ने अपने साथ नामवर को खिलाया - यह उनके लिए एक अनोखा अनुभव था.

फिर वे वहाँ से शमशेर बहादुर सिंह के निवास पर पहुँचे. वहीं नागार्जुन से भेंट हुई. नागार्जुन का जीवंत व्यक्तित्व और अनोखा अंदाज नामवर को मोहित कर गया. उन्होंने गपशप करते हुए कुछ मजेदार क्षण बिताए फिर दोनों बातें करते हुए उपेन्द्रनाथ अश्क के घर गए. अश्क ने अपने नाटकों का एक सेट आलोचना लिखने के लिए भेंट किया. वहाँ से लौटने के बाद शमशेर को साथ लेकर सुमित्रानंदन पंत के यहाँ गए. उन्हें मधुमेह की बीमारी हो गई थी. वे शमशेर के द्वारा बताए गए ‘विजयसाल’ की लकड़ी का पानी पी रहे थे और जिससे उनके स्वास्थ्य में सुधार था. रात को वे प्रयाग से काशी लौट गए. उन्होंने 26 अगस्त की नागार्जुन के सम्मान में अपने छात्रावास में एक गोष्ठी रखा था, जिसमें आने के लिए नागार्जुन को निमंत्रित किया.

इस तरह का तब का साहित्यिक वातावरण था. लोग जमकर एक-दूसरे की आलोचना करते थे, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर एक-दूसरे से सद्भाव रखते थे. साही और नामवर में तीखी नोक-झोंक चलती थी, किन्तु वे एक-दूसरे के ज्यादा अंतरंग थे. यही वह समय था, जब वे नागार्जुन के स्नेह-सानिध्य में भी आ रहे थे.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

शरद कोकास [sharadkokas.60@gmail.com] दुर्ग - 2012-01-30 17:09:16

 
  भारत यायावर जी के लेख का निष्कर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसी स्थितियाँ आज भी हैं, व्यक्तिगत तौर पर सद्भाव आज भी लेखक रखते हैं यद्यपि समय बदल गया है और चुनौतियाँ भी पहले से अधिक हैं। 
   
 

saroj mishra [mishra8800@indiatimes.com] bilaspur - 2012-01-30 17:01:05

 
  सूरज का सातवाँ घोड़ा’,पूरा उपन्यास एक बहुत बड़े उपन्यास के कथामुख हैं. लोग जमकर एक-दूसरे की आलोचना करते थे, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर एक-दूसरे से सद्भाव रखते थे. साही और नामवर में तीखी नोक-झोंक चलती थी, किन्तु वे एक-दूसरे के ज्यादा अंतरंग थे. यही वह समय था, जब वे नागार्जुन के स्नेह-सानिध्य में भी आ रहे थे. इस तरह तब का साहित्यिक वातावरण था. 
   
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