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नामवर के शिष्य मित्र

नामवर होने का अर्थ-दो

 

नामवर के शिष्य मित्र

भारत यायावर


मेरे सहपाठी बाल कोतमिरे को साथ लेकर पंडित जी (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी) मुझे देखने घर आये. लगभग आधा घंटा बैठे. उनके दर्शन मात्र से रही-सही कमजोरी भी दूर हो गयी. उनकी दृष्टि में कैसी तरलता थी और अंगुलियों के स्पर्श में कितनी शीतलता ! - ‘गौरव था नीचे आये गुरुवर मिलने को मुझसे !“


दोनों भाई जब ठीक हुए तो रामजी माँ और उनको गाँव ले गये. वे सात दिनों तक गाँव में रहे और फिर अकेले बनारस लौट आये. अपने गाँव में बिताये क्षणों को याद करते हुए उन्होंने 27 अक्टबर, 1953 की डायरी में लिखा: “सात दिन बनारस में रहकर आज फिर बनारस लौट आया. यहाँ सारा घर सूना है. माँ, काशी, विजय कोई नहीं. कुर्सी पर बैठा-बैठा अधमुंदी आँखों आगत-अनागत के वन में भटक रहा हूँ. जोते-बोए-हेंगाए हुए खेतों की मिटती-सी मेड़ों पर शाम का वह टहलना, भूने हुए ताजा बाजरे की उम्मी, लोक-विश्वास की उपेक्षा करके दिठवन एकादशी से पहले ही ईख चूसना, बैठका छोड़कर अपनी छोटी-सी मड़ैया में सारा दिन एकान्तवास - वह सबकुछ मुझे वापस आने के लिए आवाज दे रहा है. बाजरे के खेतों को देखते ही यह मन अतीत के सपनों से भर उठता है. स्कूल में पढ़ने के वे दिन. दशहरे की लम्बी छुट्टियाँ. गाँव जाने के लिए हफ्ता भर पहले से ही बेचैनी रहती थी. गाँव में मेरी सबसे प्रिय जगह थी बाजरे के खेत का मचान. सिर्फ खाने के लिए ही मैं घर आता था. बाकी समय मचान पर. लोगबाग पागल कहते थे. उस मचान पर रहते जाने कितनी कविताएँ पढ़ी और कितनी लिखीं. तब सुबह गेहूँ के सुनहरे अंकुरों से फूटती थी और शाम धान की बालियों से होकर गुजरती. शरत ऋतु, चिड़ियों की चहकार के साथ आसमान से उतरती थी और किशोर मन को अलौकिक आभा से भर देती थी. आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो वह संसार कितना पीछे छूट गया है !“

और वह अपना गाँव, गाँव की प्रकृति और उसमें रमना, कविताएँ लिखना धीरे-धीरे पीछे ही छूट गया, उससे वे बिल्कुल अलग ही हो गये. यह उनका विस्थापन था. किन्तु बनारस के माहौल में वे बरसों से रमे हुए थे और वहाँ से भी उन्हें विस्थापित कर देने की साजिश रची जा रही थी.

1953 ई॰ में ‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’ की भूमिका के अलावा उन्होंने तीन महत्त्व के निबन्ध लिखे - (1) छायावादी आलोचना, यह निबन्ध उन्होंने शचीरानी गुर्टू के अनुरोध पर लिखा था, जो छायावादी साहित्य पर मूल्यांकन परक एक पुस्तक संपादित कर रही थी. (2) प्रसाद की काव्य-भाषा एवं (3) इतिहास में लोक-साहित्य.

नामवर सिंह के लोलार्क कुण्ड पर स्थित किराये के मकान के बगल में ही शांतिप्रिय द्विवेदी रहते थे. उनके घर में नल नहीं था, इसलिए सड़क किनारे सार्वजनिक नल का उपयोग करने के दौरान मुहल्लेवालों से उनका झगड़ा-झंझट हो जाता, तो नामवर को ही इसकी पंचायत करनी पड़ती. शातिप्रिय द्विवेदी छायावाद-युग के अपने ढंग के विशिष्ट आलोचक थे, पर तब तक महत्त्वहीन हो चुके थे. नामवर उनके लेखन शैली को पसंद करते थे, क्योंकि उनकी आलोचनात्मक भाषा रचनात्मक होती थी. वे इस उपेक्षित आलोचक पर पहले से ही कुछ लिखना चाहते थे. उन्होंने शांतिप्रिय द्विवेदी पर एक लेख लिखा - ‘रचनात्मक समीक्षा’ शीर्षक वह लेख पटना से प्रकाशित ‘अवंतिका (संपादक - लक्ष्मीनारायण सुधांशु) मासिक के जुलाई, 1954 अंक में छपा. इस लेख में लेखक की जगह ‘प्रो० नामवर सिंह, एम०ए०’ छपा

नामवर के शिष्य मित्र

तब उनके घनिष्ठ मित्र उनके दो शिष्य थे - केदारनाथ सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी. उस समय को याद करते हुए केदारनाथ सिंह कहते हैं - “उन दिनों उनके भीतर का अध्येता बहुत ज्ञान-पिपासु और नए विचारों से जुड़ने की आकांक्षा से लबालब भरा था, इसलिए उनका झुकाव क्रमशः व्यक्तित्व के उस हिस्से की ओर होता गया जो बहुत-कुछ चिंतक जैसा था. याद आता है कि एक शाम सड़क पर टहलते हुए उन्होंने एक दिलचस्प बात कही थी कि घटना, मनुष्य और विचार, इन तीनों में से विचार के साथ को वे अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं. वह व्यक्ति ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है जो विचार के स्तर पर सक्रिय रहता है. .... बनारस के दिनों में, दिन भर पढ़ने के बाद हमलोग अक्सर टहलने निकला करते थे. शाम को नामवरजी तब सर्वोंत्तम रूप में होते थे. उन दिनों वे बहुत मेहनत करते थे. .... उन दिनों जो कुछ पढ़ते थे, उसका दायरा बहुत व्यापक था, विस्तृत साहित्य का अध्ययन करते थे. वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति का आस्वादपरक अध्ययन भी वे करते थे. साथ, ही गालिब, मीर को भी पढ़ते थे. पश्चिमी कविता, कहानी, आधुनिक साहित्य सभी कुछ पढ़ा करते थे. बौदलेयर, रैम्बो, पाल एलुआर उन्हें विशेष प्रिय थे. इन रचनाकारों की अनेक पंक्तियाँ उन्हीं के मुख से हमने पहली बार सुनी थीं. इनके साथ ही अँग्रेजी के उन कवियों को भी उन्होंने ध्यान से पढ़ा था जिन्हें प्रगतिशील आलोचकों ने आधुनिकतावादी कहकर खारिज कर दिया था. नामवर जी उन दिनों एक ऐसे विद्यार्थी की तरह पढ़ा करते थे जिसे किसी बड़ी परीक्षा में उतीर्ण होना हो. वे खूब तैयारी करते थे. नोट्स लेते थे. मुकम्मल अध्येता की तरह पढ़ते थे. पहली बार ब्रेश्ट की कविता, उन्नीस सौ चौवन में उन्होंने सुनाई थी जब ब्रेश्ट को कोई हिन्दी में जानता तक न था. वे नई से नई पुस्तक लेकर आते और जरूरी बातें बताते, अनेक अंश सुनाते, पढ़के अंश सुनाते. थ्री पैनी ओपेरा पढ़ा, कविताएँ सुनाईं. उन दिनों अपने वक्त से, अपने शहर से बहुत आगे की जिज्ञासा और आस्वाद का धरातल उनके पास था. लेकिन इसी वक्त बावन-तिरेपन के आसपास एक खास तरह की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया भी शुरू होती है. यह वह वक्त था जब नई कविता का दौर शुरू हो रहा था. नई कविता का केन्द्र इलाहाबाद था, बनारस नहीं. एक सचेत साहित्यकर्मी की तरह नामवर जी ने इलाहाबाद के उस रचनात्मक दौर के प्रतिपक्ष के रूप में स्वयं को निर्मित करने की कोशिश की.“
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