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सुदूर अजाने कोने में समानशील-समधर्मा मिला

नामवर होने का अर्थ-तीन

 

सुदूर अजाने कोने में समानशील-समधर्मा मिला

भारत यायावर


प्रगतिशील लेखक संघ में उनकी सक्रियता 1951 ई॰ से ही बढ़ गयी थी. 5 मार्च, 1953 ई॰ को दिल्ली में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के महा-अधिवेशन में भाग लेने दिल्ली गये, जिसमें रामविलास शर्मा को हटाकर कृश्न चंदर को महासचिव बनाया गया था और उसके बाद ही प्रगतिशील लेखक संघ बिखर तो नहीं गया लेकिन शिथिल जरूर हो गया. उसकी एक अलग ही कहानी है.

 
1957 ई॰ में इसका पुनः गठन हुआ और अमृत राय इसके सचिव बनाये गये तथा नामवर संयुक्त सचिव. इसी वर्ष अमृत राय के साथ मिलकर उन्होंने एक ऐतिहासिक महत्त्व का लेखक-सम्मेलन करवाया था, जिसमें पहली बार मुक्तिबोध और परसाई के सानिध्य में आये. इस अवसर पर अमृत राय ने ‘हंस’ का एक वृहद अंक निकाला था. इस सम्मेलन में उन्होंने ‘नये साहित्य के मूल्यांकन की समस्याएँ’ निबन्ध पढ़ा था, जो वहीं से प्रकाशित ‘साहित्यकार’ पत्रिका के फरवरी, 1958 अंक में छपा था. इसी सम्मेलन से वे मुक्तिबोध की कविता ‘कवि’ में प्रकाशनार्थ ले आये थे और मुक्तिबोध पर टिप्पणी लिखी थी, जो उन्हें बहुत पसंद आयी थी.

मुक्तिबोध ने उन्हें एक पत्र लिखा था - “औपचारिक पत्र लिखने का मुझे अभ्यास नहीं है. दिल की बात कहूँ तो यह कि आप मेरे समीप होते तो गले लगा लेता, इसलिए नहीं कि तारीफ हुई है, वरन् इसलिए कि एक सुदूर अजाने कोने में एक समानशील-समधर्मा मिला. ... काश, प्रगतिशील आन्दोलन हम जैसों को थोड़ा समझ पाता. पिछले बारह वर्ष के पूरे कालखण्ड में उसने काव्य-मर्मज्ञता के क्षेत्र में जरा-सी समझ, सहानुभूति और सहिष्णुता का परिचय दिया होता तो उसकी वैसी गत नहीं होती, जैसी है.“ मुक्तिबोध ने 1957 ई॰ में ही उन्हें अपना ‘समधर्मा’ मान लिया था. 1958 ई॰ में दिल्ली से श्रीनरेश मेहता और श्रीकान्त वर्मा के संपादन में ‘कृति’ नामक पत्रिका निकली. जिसके प्रवेशांक (अक्टूबर, 1958) में ‘शमशेर की रचना-प्रक्रिया’ शीर्षक निबन्ध छपा. इसके दूसरे अंक (नवम्बर, 1958) में ‘आत्म-संघर्ष के कवि: गजानन माधव मुक्तिबोध’ छपा. ‘कृति’ के जून, 1960 ई॰ के अंक में ही केदारनाथ सिंह के कविता-संग्रह ‘अभी, बिल्कुल अभी’ की उनकी लिखी समीक्षा प्रकाशित हुई एवं अक्टूबर, 1960 के अंक में निर्मल वर्मा के कहानी-संग्रह ‘परिन्दे’ की समीक्षा ‘कालातीत कलादृष्टि’ शीर्षक छपीं. ये दोनों समीक्षाएँ हिन्दी साहित्य में बहुचर्चित रही हैं.

नामवर सिंह ने बी॰एच॰यू॰ में सन् 1951 ई॰ के अगस्त महीने से फरवरी, 1959 ई॰ तक हिन्दी विभाग में पढ़ाया. शुरुआती दो वर्ष शोध-प्रज्ञ की हैसियत से और 1953 ई॰ के मई से फरवरी, 1959 ई॰ तक व्याख्याता के रूप में. 1951 ई॰ में बी॰ए॰ में पढ़ाये उनके प्रथम शिष्य श्रीनारायण पाण्डेय थे, जो उन्हें बहुत मानते थे. एक बार वे उन्हें अपने गाँव भी ले गये थे. बाद में वे एम॰ए॰ करने कलकत्ता चले गये और वर्द्धमान विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक हो गये. नामवर ने अपने जीवन-काल में काशीनाथ सिंह के बाद सबसे ज्यादा चिट्ठियाँ इन्हें ही लिखीं. 1953 ई॰ तक विश्वनाथ त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, विष्णुचन्द्र शर्मा, विजय मोहन सिंह, विद्यासागर नौटियाल आदि जैसे प्रतिभाशाली लेखकों का संग-साथ उनको मिला, जो शिष्य से ज्यादा उनके मित्र थे. इनके साथ केदार चाय की दुकान पर रोज शाम को अड्डा जमता. नामवर तब प्रतिदिन अपनी नयी-नयी जानकारियों और उद्भावनाओं से उन्हें चमत्कृत करते. वे हिन्दी के छात्रों को तब ‘बकलमखुद’ के निबन्धों वाली फक्कड़ाना शैली में पढ़ाया करते. वे छात्रों के बीच लोकप्रियता की चरम पर थे. इधर आचार्य द्विवेदी से तो सभी का मिलना-जुलना था, किन्तु नामवर उनके सबसे करीबी हो गये थे. ऐसे माहौल में जो पहले नामवर के मित्र थे, अब उनमें ईर्ष्या पैदा होने लगी. इनमें प्रमुख शिवप्रसाद सिंह थे. कुछ पुराने प्राध्यापक द्विवेदी जी के खिलाफ थे.

आरोप ओढ़ने की नहीं, विछाने की चीज है
इस तरह नामवर सिंह छठे दशक के दौरान साहित्य में जहाँ जड़े जमा रहे थे, वहीं उन्हें दूसरी ओर काशी से उखाड़ फेंकने की तैयारी हो रही थी. 13 फरवरी, 1957 ई॰ को उन्होंने श्रीनारायण पाण्डेय को पत्र लिखा - “जिंदगी वहाँ से शुरू होती है जहाँ से विरोध शुरू होते हैं. यह मैं नहीं कह रहा हूँ - मेरे सीने की वे तमाम चोटें कह रही हैं जो पिछले सात-आठ साल के सधे प्रहारों में लगी हैं और जिनका घाव अब भी ताजा है. आरोप करने वालों को करने दें, क्योंकि जिनके पास करने को कुछ नहीं होता, वही दूसरों पर आरोप करता है. अपनी ओर से आप अधिक से अधिक वही कर सकते हैं कि आरोपों को ओढ़े नहीं. आरोप ओढ़ने की चीज नहीं, बिछाने की चीज है - वह चादर नहीं, दरी है. ठाठ से उसपर बैठिए और अचल रहिए.“

नामवर सिंह ने यह जीवन-दर्शन बहुत सारी चोटें, आघातें खाकर और विरोध सहकर निर्मित किया था. इसलिए जब वे फरवरी-मार्च, 1959 ई में कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से चकिया-चंदौली से लोक-सभा का चुनाव लड़कर और चुनाव में हारकर बनारस पहुँचे तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था. अब वे बेरोजगार थे. काशीनाथ सिंह उस समय एम॰ए॰ की परीक्षा दे रहे थे. अब उनके सामने मुख्य समस्या थी कि घर-गृहस्थी कैसे चले. उसी समय उनके संकटमोचक मित्र विश्वम्भरशरण पाठक उनके घर पहुँचे और बताया कि सागर विश्वविद्यालय में लेक्चरर की एक जगह विज्ञापित हुई है, मैं फार्म लेता आया हूँ. तुम फार्म भर दो. मैं लेता जाऊँगा और जमा कर दूँगा. वे नामवर से फॉर्म भरवाकर ले गये. चयन समिति में हजारीप्रसाद द्विवेदी और धीरेन्द्र वर्मा थे, इसलिए सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष नन्ददुलारे वाजपेयी के न चाहते हुए भी उनकी नियुक्ति हो गयी. एक साल तक वह अस्थायी नियुक्ति थी. एक साल के बाद वाजपेयीजी ने उनकी सेवा-संपुष्टि नहीं की. नामवर की यह नौकरी 1 मई, 1960 ई॰ में चली गयी. सागर में वे विजय चौहान के साथ प्रेमचन्द के एक रिश्तेदार अधिवक्ता बासुदेव प्रसाद श्रीवास्तव के सिविल लाइन्स वाले बंगले में रहते थे. विजय चौहान सुभद्राकुमारी चौहान के पुत्र थे और तब राजनीतिशास्त्र के वहाँ प्राध्यापक थे. नामवर जब सागर विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे थे तब उनकी लोकप्रियता और छात्रों के बीच उनका प्रभाव बहुत बढ़ गया था. अशोक वाजपेयी तब वहाँ पढ़ते थे. वे बताते हैं कि जब नामवर पढ़ा रहे होते तो अन्य कक्षाओं के विद्यार्थी भी उनका व्याखान सुनने पहुँच जाते.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Pallav [pallavkidak@gmail.com] Delhi - 2012-02-05 11:08:02

 
  उम्दा आलेख. 
   
 

श्‍यामबिहारी श्‍यामल [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] वाराणसी - 2012-02-01 14:22:29

 
  वाह... तृप्तिकर भाषा-शैली में नामवर जी की जीवन-कथा... भारत यायावर जी ने बड़े मनोयोग से कथा-सूत्र संजोए हैं. यहां उपलब्‍ध कराने के लिए रविवार का आभार... यादगार कार्य के लिए लेखक को बधाइयां. 
   
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