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शहरयार की तीन ग़ज़लें

कविता

 

शहरयार की तीन ग़ज़लें

सुप्रसिद्ध शायर कुंवर अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान यानी शहरयार नहीं रहे. 13 फरवरी 2012 को उन्होंने अलीगढ़ में अंतिम सांस ली. हम उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुये उनकी तीन रचनायें यहां पेश कर रहे हैं.


एक

ज़िंदगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है
हर घडी होता है अहसास कहीं कुछ कम है

शहरयार


घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है
अपने नक्शे के मुताबिक़ यह ज़मीन कुछ कम है

बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफी है, यकीन कुछ कम है

अब जिधर देखिए लगता है कि इस दुनिया में
कहीं कुछ ज़्यादा है, कहीं कुछ कम है

आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
यह अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है

दो
ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं
तेरे अलावा याद हमें सब आते हैं

जज़्ब करे क्यों रेत हमारे अश्कों को
तेरा दामन तर करने अब आते हैं

अब वो सफ़र की ताब नहीं बाक़ी वरना
हम को बुलावे दश्त से जब-तब आते हैं

जागती आँखों से भी देखो दुनिया को
ख़्वाबों का क्या है वो हर शब आते हैं

काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया
देखो हम को क्या-क्या करतब आते हैं

तीन
ख़ून में लथ-पथ हो गये साये भी अश्जार के
कितने गहरे वार थे ख़ुशबू की तलवार के

इक लम्बी चुप के सिवा बस्ती में क्या रह गया
कब से हम पर बन्द हैं दरवाज़े इज़हार के

आओ उठो कुछ करें सहरा की जानिब चलें
बैठे-बैठे थक गये साये में दिलदार के

रास्ते सूने हो गये दीवाने घर को गये
ज़ालिम लम्बी रात की तारीकी से हार के

बिल्कुल बंज़र हो गई धरती दिल के दश्त की
रुख़सत कब के हो गये मौसम सारे प्यार के
 

14.02.2012, 01.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

प्रभु नारायण वर्मा [पीएनvermabob@gmail] अम्बिकापुर - 2012-03-19 13:39:28

 
  खता मुआफ हुज़ूर , पहली ग़ज़ल के दूसरे और तीसरे शेर में ज़मीन और यक़ीन की जगह ज़मीं और यकीं होना चाहिए।  
   
 

sumit sharma [sumit.yaas@gmail.com] bilaspur - 2012-02-28 07:13:22

 
  वो कौन था वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे
सूना है आज कोई शख्स मर गया यारो.
 
   
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