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माशूक़

पुस्तक अंश

 

माशूक़

कवाफ़ी की कविताएं
हिंदी भाषांतर- पीयूष दईया
 

माशूक़

माशूक़
कवाफ़ी की कविताएं
भाषांतर- पीयूष दईया
प्रकाशकः यात्रा बुक्स
203, आशादीप अपार्टमेंट्स, 9 हेली रोड
नई दिल्ली 100 001
मूल्यः 200

दीवालें
बिना कान दिए, बिना रियायत, बिना शरम
उन्होंने मेरे चारों ओर दीवालें चिन दी,मोटी और उँची।

और अब मैं यहां बैठ महसूस करता हूं नाउम्मीदी।
मुझे कुछ और सूझता नहीं: मेरा यह भाग्य कुतरता है मन---

क्योंकि कितना कुछ था बाहर करने को मेरे पास।
जब वे चिन रहे थे दीवालों को, ओह!क्यों नहीं मैंने तवज़्जो दी

लेकिन मैंने कभी नहीं सुना राजगीरों को, एक हलचल तक नहीं।
उन्होंने मुझे बाहरी दुनियां से अलग बन्द कर दिया अननभूत तरह से।

समाप्त
भय और संदेहों में गिरे,
मुहाल मन और भयभीत आंखों से,
हम पिघले ज्यों हमने खाका खींचा कि कैसे बर्ताव करें
ताकि ख़तरे और टाल सकें जो
हमें धमका रहा है भयावह तरह से।
हम भूल तब भी करते हैं,
कि खतरा नहीं है हमारे रास्ते पर :
संदेश थे धोखा
(या हमने उन पर कान नहीं दिया,
या उन्हें ठीक तरह से भांप नहीं पाए)।
एक और विनाश,
जिसकी कल्पना तक नहीं की थी,
अचानक, हम पर गिरता है सरपट,
और बेतैयार जैसे हम हैं
---अब नहीं बचा समय---
हमें चिथड़े-चिथड़े कर देता।

मैं गया था
रोका नहीं था मैंने अपने को। छोड़ दिया था बिल्कुल छुट्टा ख़ुद को और गया था।
भोगविलास ओर जो थे आधे असली---
आधे थे भटकते मेरे भेजे में,
मैं गया था आलोकित रात में;
और गटक ली थी तेज शराब हलक में, ऐसे जैसे
पीते हैं विलासिता के मरदाने।

जहां तक हो सके
और अगर तुम बना नहीं सको अपना जीवन
जैसा चाहो वैसा
तो कम से कम इतना करो : उसे बिगाड़ो मत
(---बैर मत काढ़ो यूं ख़ुद से---)
सब के इतना मुंह लगा रह कर
लटकते-मटकते उठते बैठते चटरपटर करते

अपना जीवन सस्ता मत बना लो
दर-दर मारे-मारे फिर कर
हर कहीं इसे कुलियों जैसे ढोते-घसीटते और बेपर्दा करते
यारबाशों और उनके लगाये मजमों की चालू चटोरागीरी के लिए
कि यह भासने लगे--
कोई ऐसा जो लग लिया हो पीछे छेड़खानी करते तुमसे।
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