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लाल्टू की पांच कविताएं

साहित्य

 

लाल्टू की पांच कविताएं


अढ़ाई की कविता

लाल्टू


सफर में अकेला आदमी तीन लोगों के लिए अढ़ाई टिकट खरीदता है। बाकी दो लोगों को वह खुद में समेट चुका है। वह आदमी अढ़ाई हो गया है।

उसके साथ खड़ी एक आदमी है। वह उसके साथ अढ़ाई होने का अहसास बाँटती है, जैसे वह बाँटती है और सब कुछ। अढ़ाई होते हुए वह बहुत खुश है।

इसी बीच तीसरा आदमी मुँह में उँगली डाले अदृश्य लोगों से बात कर रहा है। वह शायद पूछ रहा है, तीन लोग अढ़ाई कैसे हो सकते हैं। अढ़ाई के खयाल में खोया वह नन्हा आदमी कई लोगों की आँखों में
हमेशा के लिए बस जा रहा है। सालों बाद लोग अचानक फिर उसे देखेंगे, पर वह नहीं दिखेगा। उसे देखने को उतावले लोग परेशान सोचते रहेंगे कहाँ देखा था उसे।

दूर एक शहर में दिनों तक खड़ा रहता है अढ़ाई दिनों का झोपड़ा।


पढ़ाई की कविता

ज़मीं फैलती है मुझमें। खुलते जाते हैं सपनों के आयाम।

तड़पता हूँ बेचैन, नींद आएगी कब!

जागते रहने की इच्छा से कब मुक्त हो पाऊँगा।

पढ़ता हूँ ज्ञान-विज्ञान, कविताएँ कहानियाँ। पढ़ता हूँ खुद को। पढ़ता हूँ - जगा रहता हूँ। पढ़ते हुए ढूँढता हूँ दुनिया जहाँ जागते रहने की ज़रूरत न हो।

फिलहाल पढ़ता हूँ और सात अरब लोगों के सपनों से जुड़ता हूँ।
अँधेरा घिर आता है, फिर भी पढ़ता हूँ ।

पास जो खाली जगह थी, पढ़ते हुए देखता हूँ वह भर आई है।
पढ़ते हुए बन रहा हूँ प्रेमी, पढ़ते हुए बन रहा हूँ इन्कलाबी।

पढ़ते हुए अवसाद के रूबरू हो रहा हूँ।


कढ़ाई की कविता

जिसकी तस्वीर इन कपड़ों पर काढ़ी जा रही है, वह इतिहास का सबसे असफल आदमी है।

कढ़ाईगरों के साथ वह ताउम्र रहा, यह बात न तो कढ़ाईगरों को मालूम है, न उनकी सुइयों को।
सुइयों से खेलती उँगलियाँ बचपन से ही इतनी खुरदरी हो गई हैं कि वे कढ़ाई के साथ गीत गाती हैं।

अक्सर यह गीत उस आदमी के बारे में होता है, जिसके बारे में सारी दुनिया गीत गाती है।

वह इतिहास का सबसे असफल आदमी है। कढ़ाईगरों के साथ रहते हुए वह दुनिया के तमाम और लोगों के साथ भी रह रहा था। उसकी असफलता से हम जानते हैं कि वह निहायत ही अकेला आदमी था।

उसकी ज़ुर्रत कि उसने खुद को सबके साथ घोषित किया हुआ था। उसने लोगों को छुआ और लोगों ने उसकी तस्वीर काढ़ना शुरू किया।

दुनिया भर में कपड़ों पर, लकड़ियों पर, कुछ लोग अपने शरीर पर उसकी तस्वीर काढ़ रहे हैं। लोगों का बस चलता तो वे ज़मीं आस्माँ के चप्पे चप्पे पर उसको टाँक देते।

वह इतिहास का सबसे असफल आदमी है। कढ़ाई करते हुए लोग गा रहे हैं गीत उस आदमी के बारे में।


चढ़ाई की कविता

टीले पर चढ़ कर पेड़ों के पीछे छिपा तालाब दिख जाता है। पेड़ों के पीछे साफ दिखता तालाब चढ़ाई के बाद गंदा दिखता है। चढ़ाई के बाद हम तालाब की गंदगी में डूब जाते हैं। चढ़ाई के बाद हम बहुत गहराई में उतर जाते हैं।

टीले पर चढ़ने के लिए एक भीड़ चली आ रही है। भीड़ सूचना क्रांति और फेसबुक से अंजान है। पर तालाब की गंदगी का आभास भीड़ को है।

भीड़ में हर एक दूसरे को थामे हुए है। टीले की ओर आती हुई भीड़ एक लहर है। आवाज़ की, ऊर्जा की, प्राण की, प्यार की।

टीले पर से हम देखते हैं प्यार का समंदर चढ़ा आता है। गंदा तालाब साफ होने को तड़पता है।

तालाब में प्यार की परछाईं पड़ती है। धीरे धीरे बदलता है उसका रंग।


लड़ाई की कविता

2010 में आदमी लड़ रहा है 1850 की लड़ाई। एक दिन में आधा दिन माँग रहा है अपने लिए।

आधी रात को मकान की छत बना रहा है आदमी। जिसे मकान में रहना है, वह 2010 में आदमी को देखता है जैसे 1890 को आने में अभी और कई साल लगेंगे।

आदमी सोचता है कि वह इस ग्रह का वासी नहीं है। अपने ग्रह में उसे दो तिहाई दिन अपने लिए मिल सकता है। अपने ग्रह में बच्चों के साथ खेलने के अलावा वह सपने भी देख सकता है। यहाँ इस ग्रह में वह इंतज़ार में है कि 2020 या 2030 तक वह 1890 से आगे चल पाएगा। इस तरह वह फुकुयामा को बतलाता है कि इतिहास और खगोल, सब गड्डमड्ड हैं।

छत बनाते हुए उसे देखते लगता है कि वह रात के अँधेरे में नहीं लड़ सकता। सभी फुकुयामा इस खयाल में पूरी उन्नीसवीं सदी बिता देते हैं।

पर वक्त है कि चलता रहेगा। ग्रह चलेंगे, नक्षत्र चलेंगे।

आदमी है कि लड़ता रहेगा।

01.03.2012, 23.36 (GMT+05:30) पर प्रकाशित