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आमचो बस्तर
पुस्तक अंश
आमचो बस्तर
राजीव रंजन प्रसाद
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आमचो बस्तर उपन्यास
राजीव रंजन प्रसाद
प्रकाशकः यश पब्लिकेशन
1/10753, गली नं-3, सुभाष पार्क, नवीन
शहदरा, निकट कीर्ति मंदिर, दिल्ली 110 032
मूल्यः 795 |
6 दिसम्बर 1992 के बाद.....। रेड़ियो पर खबरों ने बताया कि मध्यप्रदेश सरकार बखास्त
कर दी गयी है। बस्तर में शांति थी।
शाम के साढे पाँच का वक्त; शैलेष और मरकाम दादू की दूकान पर, चाय के साथ अखबार
निगलने में व्यस्त थे। धरमपुरा में कहीं हो रहे रामायण पाठ की दूकान तक मद्धम आवाज
पहुँच रही थी – ‘कोउ नृप होहुँ हमहि का हानी..”
“मरकाम सर क्या आदिवासी हिन्दू धर्म को मानते हैं?” शैलेष ने जिज्ञासा सामने रखी।
बड़ा स्वाभाविक प्रश्न था। बस्तर की हर आदिम जनजाति के किये इष्ट देवी की तरह पूज्य
माँ दंतेश्वरी का मंदिर एक शक्तिपीठ है और यह भगवान शिव की दिवंगत पत्नी सती के
दंतखंड़ के गिरने के स्थल के रूप में जाना जाता है।
“हिन्दू क्यों?”
“सर पूजा-अनुष्ठान, देवी-देवता, तंत्र-मंत्र बहुत कुछ हिन्दू समाज के चलन से एक
रूपता रखता दिखता है।”
“बहुत घालमेल है शैलेष, चूंकि इस भूमि पर अनेकों राजवंशों का प्रभाव था। राजा के
आचरण और विश्वास प्रजा की सोच-समझ के साथ जुड़ते चले गये। अनेकों किंवदंतियाँ देवी
देवताओं और उनसे जुड़े विश्वास को ले कर हैं। बस्तर राज्य के पहले काकतीय राजा
अन्नमदेव स्वयं भी देवी-देवताओं के साथ-साथ हमारे मिथक और धार्मिक लोक कथाओं का
हिस्सा हो जाते हैं। धरती और प्रकृति हम आदिमों का धर्म है। मैं ‘हिन्दू’ कह कर
अपनी पहचान को वर्गीकृत नहीं करना चाहता। देवी-देवता, तंत्र-मंत्र, अनुष्ठान-तिहार
हो सकता है तुम्हे ऐसी छवि देते हैं लेकिन हमारी दुनियाँ अलग तरह से “बनी और बसी”
मरकाम ने वाक्य समाप्त करते ही चाय सुड़सुड़ाई।
“हिन्दू समाज में माँ दंतेश्वरी पूज्य हैं। भैरम देवता के मंदिर भारत भर में हैं।
बारिश का देवता इन्द्र ही है और भगवान शिव संहार के देवता।” शैलेष ने चर्चा आगे
बढ़ाई।
“यार! देवी देवताओं पर धर्म और संस्कृति का कोई कॉपीराईट थोडे ही है। जरूरी है क्या
कि हमारा इन्द्र और हिन्दू देवताओं का राजा इन्द्र एक ही हो? हमारी बस्तर भूमि का
अपना मातृसत्तात्मक देव परिवार है। देवी दंतेश्वरी के साथ इस परिवार में भैरमदेव,
पाटदेव और भीमादेव प्रमुख हैं।“
“सर अब आप फँस गये। चाय चाहे जितनी भी हो जाये इस विषय को पूरा करके ही उठेंगे”
“तो फिर थोड़ा टहल लेते हैं। पास में ईसाई मिशनरी, उनका स्कूल और हॉस्टल है। यहाँ
आदिवासी बच्चों के लिये धर्म की अलग परिभाषा है। वहाँ तक चलते हैं”
“ठीक है सर, आप दंतेश्वरी देवी के परिवार का वर्णन कर रहे थे।“
“हमारी किंवदंतियों में दंतेश्वरी माता और भैरमबाबा किसी साधारण ग्रामीण दम्पति की
तरह हैं। गोंडी में दंतेश्वरी माता को हम ‘यायाल मुत्ते’ नाम से बुलाते हैं। बड़ी
रोचक कहानी है। दंतेवाड़ा में माता दंतेश्वरी और भैरमबाबा शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम
के पास रहते थे। मुझे शायद भैरमबाबा को मिला कर उनके आठ भाईयों के नाम भी याद हैं –
लिंगाभैरम, बनभैरम, जटाभैरम, चीनाभैरम, मटकुलभैरम, टुंडालभैरम, पाटभैरम और
घाटभैरम।“
“सर आपका नॉलिज और आपकी याददाश्त को क्या कहूँ...” शैलेष की आँखों में प्रशंसा का
भाव था।
“पूरी कहानी तो सुनो। एक दिन दंतेश्वरी माता जंगल से कोलियार भाजी तोड़ लायीं। भाजी
काटते समय उनकी छोटी उंग्ली कट गयी और खून निकलने लगा। माई दंतेश्वरी ने उस समय
भाजी में ही हाँथ पोछ लिया। बाद में वो भाजी को धोना भूल गयी और इस तरह खून से सनी
भाजी पक गयी। भैरमबाबा जब खाने लगे तो उन्हें स्वाद कुछ अलग लगा। उन्होंने आज बनी
स्वादिष्ट कोलियार भाजी का कारण पूछा। माई ने पहले तो नहीं बताया लेकिन भैरमबाबा के
बार बार कारण जानने की जिद के आगे झुक कर उन्हें अपनी गलती बतानी ही पड़ी । भैरमबाबा
के कारण जानते ही पति-पत्नी में झगड़ा हो गया। भैरमबाबा ने गुस्से में कहा कि आज
तुमने मुझे मुझे अपना खून पिला दिया, क्या पता किसी दिन कोई आदमी ही खिला दोगी? हो
सकता है मुझे ही मार दो? और इस तरह माई पर अपना गुस्सा निकालते हुए भैरमबाबा अपने
निवास से निकल कर नीचे कूद पड़े। शैलेष तुमने तो शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम पर पत्थर
में उभरे भैरमबाबा के पैरो के निशान देखे ही होंगे। इसका संबंध इसी मिथक से जुड़ा
हुआ है। कहते हैं बाद में भैरम बाबा जिस जगह जा कर रहने लगे उस स्थान का नाम ही
भैरमगढ़ पड़ गया”
“महत्व की जानकारी है।......ये भीमादेव कौन हैं?” शैलेष की रुचि इस विषय में जाहिर
थी।
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दोनों टहलते हुए इमली के पेड़ के नजदीक आ पहुँचे। नीचे ही पड़ा लकड़ी का हाँथ भर का
टुकड़ा मरकाम ने उठाया और इमली पर निशाना लगा कर दे मारा। कुछ ही देर में दोनों
मित्रों ने जेबें भर भर कर इमली बटोर ली थी।
“भीमादेव बस्तर के खेतीहर देवता हैं। भतरी मान्यता है कि ‘नांगर धरला भीम, पानी
देला इन्दर’ यानी कि जब भीमादेव खेती के काम में सक्रिय होता है तब वह हल चलाता है।
भीमादेव के हल चलाने से प्रभावित हो कर ही इन्द्र पानी बरसाता है।”
“यानी कि जब बारिश कम होगी तो यह माना जायेगा कि किसी बात से रुष्ट हो कर भीमादेव
ने हल नहीं चलाया?”
“बिलकुल सही, फिर भीमादेव को मनाने के लिये देवगुड़ी में पूजापाठ होता है, मन्नत
माँगी जाती है। वैसे भीमादेव का पूरा श्रंगार साँप ही हैं। उनके सिर पर ‘महामण्डल’
साँप की पगड़ी बँधी है। ‘टोकी-बोंडकी’ साँप का जनेऊ पहना हुआ है। ‘दूध-नाग’ साँप का
कौपीन और ‘बंदूक-माना’ साँप का कमरपट्टा पहनते हैं। ‘सुपली’ साँप भीमादेव के पैरों
के कडे हैं।“ मरकाम ने स्वरूप वर्णन सामने रख दिया।
“और पाटदेव?
“पाटदेव की कहानी जुड़ी है नारायनपुर तहसील के तिमनार गाँव से। गाँव भर में एक साँप
की दहशत हो गयी थी। शाम होते ही एक लम्बा चौड़ा और मोटा नाग पास की पहाडी से नीचे
उतर कर गाँव में आ जाता। वह घर घर में घुस कर घूमता रहता लेकिन किसी को काटता नहीं
था। एक दिन गाँव के सभी लोग नारायनपुर जा कर एक स्थान पर इकट्ठा हुए एवं वहाँ चीना
हल्बा से मिले। इसे हम तो ‘जातनाईक’ कहते हैं तुम लीड़र समझ सकते हो।“
“जी मैं समझ गया था।“
“चीना हल्बा ने एक सिद्ध माड़िया पुजारी से गाँव वालों को मिलवाया। पुजारी ने समस्या
को जानने के लिये अनुष्ठान किया। उसी रात उसको सपना आया जिसके विषय में उसने तिमनार
गाँव के लोगों को बताया कि वह साँप नहीं एक देव है। वह किसी का कुछ नहीं बिगाडेगा
बस उसका मान करना है। पुजारी के बताये अनुसार गाँव वालों ने पाँच पाँच हाँथ लम्बी
दो गोल बेल की लकडियों को तीन समानान्तर दो-दो हाँथ की लकड़ी से जोड़ दिया। इस तरह एक
सीढ़ीनुमा प्रतीक चिन्ह बनाया गया और उसे मातागुड़ी में स्थापित कर पूजा की जाने लगी।
यही पाटदेव हैं। तुम इस प्रतीक देवरूप को ले कर आंगादेव का भ्रम मत पाल लेना।
पाटदेव का नाम सुनते ही चोर-डाकू, भूत-प्रेत, रोग-शोक सब भाग जाते हैं। पाटदेव
अन्न-धन और पशु-धन के संरक्षक हैं। चीना हलबा बाद में तिमनार गाँव से पाटदेव को
नारायनपुर ले आया और वहाँ मातागुड़ी में स्थापित कर पूजा की जाने लगी। चीना हल्बा और
बाद में उसके परिवार के लोग पाटदेव के पुजारी रहे। राजा अन्नमदेव जब चक्रकोट आये तो
वे पाटदेव को अपने साथ ले आये थे। अब पाटदेव को जगदलपुर में ही मावली माता के मंदिर
में स्थायी रूप से स्थापित कर दिया गया है। उनके चिन्ह स्वरूप में एक ही बदलाव हुआ
है कि सबसे सामने वाली आडी लकड़ी पर चांदी का एक साँप जड़ दिया गया है।“
“आपने बता दिया नहीं तो यही सवाल मैं करने वाला था कि पाटदेव मावली माता के मंदिर
तक कैसे पहुँचे।....। आपने आंगादेव और देव प्रतीकचिन्ह की कुछ बात बीच में की थी।”
“आंगादेव वंश के देवता हैं। तीन साजा, बेल या इरा लकड़ी की डंडियाँ जमीन में
समानांतर गाड़ी जाती हैं। बीच की लकड़ी देवता का प्रतीक होती है जिसमें किसी साँप या
चिडिया जैसी आकृति बनी होती है। दो सिर वाली आकृति यदि बनी हो तो आंगा पति और पत्नी
दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मोरपंख, चाँदी के गहनों आदि से इसे सजाया जाता
है।“
“बहुत से देवी देवता हैं”
“शैलेष, भारत में किसी भी जगह से अधिक देवी देवता तुम्हे बस्तर में मिलेंगे। सारी
दंतकथाओं में एक खास बात कि वे अपने परिवेश और राजनीति से भी प्रभावित हैं। मुरिया
मान्यताओं में एक कहानी खास ध्यान खींचती है कि पहले देवता वारंगल में रहते थे।
वहाँ से वो एक लाल धागे के सहारे उपरी दुनियाँ में चले गये। उपर से उन्होंने बस्तर
को देखा और इसकी सुन्दरता पर मोहित हो गये। वे फिर एक रेशमी धागे को पकड़ कर बस्तर
की पहाडियों में उतर आये और वहीं रहने लगे।“
“इस कहानी के पीछे काकतीय राजाओं का इतिहास भी दिखता है?”
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“यह तो समाजशास्त्रियों और मानवविज्ञानियों की बातें हैं। मैं तो अपनी समझ और
याददाश्त से तुम्हे मोटी मोटी चीजे बता रहा हूँ। असल में आदिवासियों की धार्मिक
मान्यताओं पर हिन्दू परम्पराओं का गहरा प्रभाव तो पड़ा ही है। इसलिये यदि जातियों की
उत्पत्ति की भी प्रचलित कहानियाँ लो तो सारा घालमेल दिखता है खास कर शैव सम्प्रदाय
से बहुत सी निकटता देख सकते हो। अगर हलबा जाति की उत्पत्ति की ही बात करो तो एक
मजेदार कहानी है। राजा के खेत में धान की बालिया लहरा रही थीं। उसे चिडियों से
बचाने के लिये चार बिजूका या हिलने वाले पुतले जो भी ठीक समझो रखवालों ने खड़े कर
दिये थे। एक दिन शिव-पार्बती विचरण करते हुए निकले। पार्बती जी चारों हिलते डुलते
पुतलों को देख कर बहुत खुश हुई। उन्होंने शिव जी को दिखा कर कहा कि कैसे सुन्दर
हिलने वाले पुतले हैं जैसे अब बोल पडेंगे। शिव जी ने सचमुच ही उन पुतलों को जीवित
कर दिया। दो स्त्री और दो पुरुष बन गये। महादेव ने उन्हें कहा कि जाओ आज से तुम
हालिबा-टा हो। हालिबा-टा का अर्थ तुम समझ ही गये होगे, यानी कि हिलने वाला। इसी से
हलबा जाति अस्तित्व में आयी।“ मरकाम ने आखिरी वाक्य के साथ ही जो इमली मुँह में
डाली थी वह बहुत खट्टी थी।
“सर आपकी अब तक की बहुत सी कहानियों में शिव जी ने बड़ी भूमिका निभाई है”
“नहीं नहीं एक दम से निष्कर्ष पर मत पहुँचो। मैंने कहा न कि बहुत घालमेल है। हलबा
लोगों की उत्पत्ति की एक और कहानी है जो कृष्ण रुक्मणि के महाभारतकालीन प्रसंग से
जुड़ी है। कहते हैं कि जब कृष्ण ने रुक्मणि का हरण कर लिया था तो रुक्मणि के भाई और
उसके सैनिकों ने पीछा किया। तब बलराम की वीरता से सैनिक इतने प्रभावित हुए कि
उन्होंने बलराम के हल और मूसल को अपना लिया। इन सैनिकों के वंशज ही हलबा हैं।“
“मुझे दोनों ही कहानियों में जो बात महत्व की लगती है वो है इनका कृषि कर्म से जुड़ा
होना”
“अब तुम भतरा जाति के आदिवासियों को ही लो। उनकी उत्पत्ति को ले कर कोई सूत्र हाँथ
नहीं लगता और पहचान को ले कर जो बात इतिहास से निकल कर आती है वह राजा
पुरुषोत्तमदेव की जगन्नाथपुरी यात्रा से जुड़ी हुई है। उनके साथ जो आदिवासी यात्रा
पर गये थे उन्हें लौट कर राजा ने भद्र कह कर संबोधित किया तब से ही वे आदिवासी और
उनके वंशज भतरा कहलाने लगे।“ इमली का बीज सड़क के किनारे थूकते हुए मरकाम ने वाक्य
पूरा किया।
“यानी कि भद्र शब्द से भतरा बन गया”
“बिलकुल हो सकता है।
“भतरा जाति भी उन्ही देवी देवताओं को मानती है जिन्हें हलबे और राजमुरिया आदि मानते
हैं। भीमादेव, माटीदेव, भैरमदेव, आंगादेव, पाटदेव, भंगाराम, मावली माता, कंकालिन
माता आदि इनके आराध्य हैं। तीज त्यौहारों में देवगुडिया आबाद हो जाती हैं,
पशु-पक्षियों की बलि होती है, मांस मदिरा चलती है। झाड-फूंक, सिरहा-गुनिया सब कुछ
है लेकिन एक बात जो शायद तुम्हारे महत्व की होगी कि भतरा जाति के लोग सफेद और गेरुए
रंग को शुभ मानते हैं।“
“और मुरिया? मैंने लिंगो पेन देवता के बारे में बहुत सुना है। उसने घोटुल की
स्थापना की थी?”
“यह लम्बी कहानी है। मेरा खयाल है जब हम मिशनरी स्कूल तक पहुँचेंगे मेरी कहानी
चलेगी”
“बताईये न सर, मैं जानना चाहता हूँ”
“नारायनपुर के समीप रावघाट पर्वत श्रृंखला क्षेत्र में कभी सात भाई रहा करते थे। वह
क्षेत्र 'दुगान हूर` के नाम से जाना जाता था। इन्ही सात भाइयों में सबसे छोटे भाई
का नाम था 'लिंगो`। लिंगो न केवल अपने भाईयों की तुलना में बलिष्ठ और सुन्दर था
बल्कि वह चमत्कारिक और बुद्धिमान भी था।....। कहते हैं वह एक साथ बारह प्रकार के
वाद्ययंत्र समान रूप से बजाता लेता था। खेत-खलिहान तथा अन्य काम के समय सभी छह भाई
सवेरे से अपने- अपने काम में चले जाते। छहों भाइयों का विवाह हो चुका था, लिंगो
अकेला अविवाहित था। लिंगो न केवल अपने भाइयों का, बल्कि वह अपनी छहों भाभियों का भी
प्यारा था। लिंगो सुबह उठते ही संगीत-साधना में जुट जाता। उसके संगीत में ऐसा
सम्मोहन था कि छहों भाभियाँ अपने सारे काम भूल कर मन्त्र-मुग्ध हो सुना करती थीं।“
“कृष्ण लीला जैसा लगता है”
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“इस संगीत ने लिंगो के भाइयों और भाभियों के बीच तकरार करा दी। आखिर समय पर खाना न
बने और खलिहान में काम कर रहे उनके पतियों तक देर से पहुँचे तो झगड़े होने ही थे।
छहों भाई लिंगो से नाराज हो गये। क्यों न हो? लिंगो का संगीत बाकी छ: भाईयों की
गृहस्थी खराब कर रहा था। पति थक-हार कर घर लौटते और पाते कि लिंगो का संगीत चल है
और उनकी पत्नियाँ मन्त्र-मुग्ध सुन रहीं हैं। भाईयों की समझाईश से भी लिंगो का
संगीत प्रेम कम नहीं हुआ। सभी पतियों को अपनी पत्नियों और लिंगो को ले कर शक भी
होने लगा कि उनके बीच आपस में संबंध हैं। इसी से झगड़ा बढ़ गया। अब भाईयों ने लिंगो
को ही मार देने की योजना बना ली। अपने पतियों का साथ पत्नियों को भी देना ही पड़ा
चूंकि अब बात ‘शक’ की थी।“
“यानी की सचमुच कृष्ण जैसा संघर्ष था लिंगो का?“
“बिलकुल था। तो मैं बता रहा था कि योजना बना कर सातो भाई शिकार करने गए। जंगल पहुँच
कर अपनी योजना के अनुसार सभी भाईयों ने एक पे़ड़ की खोह में छुपे 'बरचे` को मारने के
लिये लिंगो को पे़ड़ पर चढ़ा दिया और स्वयं उस पे़ड़ के नीचे तीर-कमान साध कर खड़े हो
गये।
“बरचे क्या होता है सर?”
“बरचे, गिलहरी प्रजाति का है। गिलहरी से थोड़ा बड़ा जन्तु होता है। बरचे का रंग भूरा
और पूँछ लम्बी होती है। आज भी इसका शिकार कर के आदिवासी बड़े चाव के खाते हैं।“
“अच्छा!!”
“आगे सुनो..... लिंगो पे़ड़ पर चढ़ गया और बरचे को तलाशने लगा। इसी समय एक भाई ने
मौका देख कर नीचे से तीर चला दिया। तीर लिंगो की बजाय पे़ड़ की शाख पर जा लगा। पे़ड़
था बीजा का। तीर लगते ही शाख से बीजा का रस जो लाल रंग का होता है, नीचे टपकने लगा।
छहों भाइयों ने सोचा कि तीर लिंगो को लगा है और यह खून उसी का है। अब लिंगो का
जीवित रहना मुश्किल है, सोच कर सभी भाई वहाँ से घर भाग आये। इधर लिंगो को समझ नहीं
आया कि उसके भाई उसे अकेला छोड़ कर भाग क्यों गये। घर पहुँच कर चुपके से अपने भाई और
भाभियों की बातें सुनीं तो उसके रोंगटे खड़े हो गये। उसने किसी को नहीं बताया कि वह
सब जान गया है। लिंगो इस तरह से घर के भीतर आया जैसे कि उसने कुछ सुना ही न हो। उसे
जीवित देख कर उसके भाईयों-भाभियों को बड़ा आचर्य हुआ। लेकिन बात आयी-गयी हो गयी।“
“फिर?? “ शैलेष अपनी जिज्ञासा छिपा नहीं पा रहा था।
“दिन फिर पहले की ही तरह गुजरने लगे। अब लिंगो का अब विवाह ऐसे परिवार में किया गया
जहाँ लोग जादू-टोना जानते थे। उसकी पत्नी भी यह विद्या जानती थी। इसलिये स्थिति यह
हुई कि परिवार में कभी कोई बच्चा या भाई-भाभी बीमार पड़ते तो हर बार छोटी बहू पर ही
शक की सुई जा ठहरती थी, कि वही सब पर जादू- टोना कर रही है। छहों भाइयों ने छोटे
भाई और बहू को घर से बाहर निकाल दिया। उन्हें सम्पत्ति में भी हिस्सा नहीं मिला, बस
भाईयों ने यादगार के तौर पर एक ‘मोह्ट’ दे दिया।“ मरकाम कहानी सुनाने के प्रवाह में
था।
“यह ‘मोह्ट” क्या चीज है?”
“मोह्ट अँग्रेजी के 'यू` आकार की एक चौडी कील जैसी जोती है जिससे हल फँसा रहता है।“
“आगे सुनाईये सर, लिंगो का क्या हुआ?”
“लिंगो उसे ले कर अपनी पत्नी के साथ वहाँ से चल पड़ा। चलते-चलते वे एक गाँव के पास
पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि धान की मिजाई करने के बाद निकला ढ़ेर सारा पैरा या
पुआल खलिहान में रखा हुआ था। घर से निकलने के बाद से लिंगो और उसकी पत्नी भूखे थे
उन्होंने इसी पुआल को दुबारा मींज कर कुछ धान अपने लिये निकाल लेने का अनुरोध किसान
से किया। उस किसान ने लिंगो की पूरी कहानी सुन कर उसे मिजाई करने की अनुमति दे दी।
लिंगो ने गाँव के लोगों से बैल माँगे और 'मोह्ट` को उसी स्थान पर स्थापित कर मिजाई
शुरु की। मिजाई पूरी होने पर गाँव वालों ने देखा कि उस पैरा से ढ़ेर सारा धान निकल
गया है। सब आश्चर्य चकित हो गये और लिंगो को चमत्कारी पुरुष मान लिया गया। लिंगो उस
गाँव का देवता बन गया और वही बस गया। उस गाँव का नाम था 'वलेक् नार`। 'वलेक्` यानी
सेमल। हल्बी भाषा में सेमल को सेमर कहा जाता है। आज इस गाँव को लोग सेमरगाँव के नाम
से जानते हैं।“
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“तो ये कहानी है लिंगो पेन की?”
“नहीं आगे भी तो सुनो। अब लिंगो की कीर्ति गाँव के बाहर भी फैली और उसके भाइयों के
कानों तक बात पहुँची। उसकी प्रगति सुन कर भाइयों को बड़ी पीड़ा हुई। उन्होंने पुन:
लिंगो को मार डालने की योजना बनायी और सब सेमरगाँव आ पहुँचे। भाईयों ने बारह गाँव
से लोहार मंगा कर बड़ा सा कडाहा तैयार करवाया। उसके भाईयों ने बारह बैल गाड़ियों में
से लकड़ी इकट्ठा की फिर इस कडाहे में तेल डाल कर नीचे आग लगायी गयी। लिंगो को पकड़,
उस कडाहे में उतार कर ढक्कन बंद कर दिया गया। यह लिंगो की पवित्रता की अग्निपरीक्षा
थी। लिंगो नहीं मरा। अंदर ठंडक ही रही और आग में से भाईयों को उन अट्ठारह वाद्य
यंत्रों की आवाज आती रही जिन्हें बजाने में लिंगो प्रवीण था।“
“लिंगो की कहानी में त्याग, बलिदान और बुराई पर जीत जैसी बहुत सी बातें हैं।“ शैलेष
ने बात आगे बढ़ाई।
“अच्छा एक बात बताओ। तुम कहानी को कृष्ण के साथ क्यों जोडना चाहते थे?”
“उसकी साम्यता के कारण”
“और ईसाई मिशनरियों द्वारा यही साम्यता मसीह के साथ दर्शायी जाती है। लिंगो का
बलिदान और जीवन ईसा से भी एक तरह की समानता रखता है। उनके द्वारा कामवासना को
ठुकराना, उनमें चालाकी और शत्रुता का अभाव, उनके द्वारा अपने हत्या के प्रयासरत
भाईयों को क्षमा करते रहना, मारने के प्रयास के बाद भी जीवित रहना या हो जाना। ईसा
मसीह की कहानी के भी तो यही मुख्य विन्दु हैं। लेकिन इससे लिंगो इसाई तो नहीं हो
जाता? न ही ऐसी समानता के कारण हिन्दू? मुझे लगता है लिंगो लिंगो है और अपनी खुद की
पहचान रखता है। लिंगो ने सृष्टि की रचना की, लिंगो ने चाँद और सूरज बनाये, लिंगो ने
शराब की खोज की और पहली बार आग भी लिंगो ने ही जलाई थी। जटिल है सभी मिथक कहानियों
को समझना, लेकिन इनकी मौलिकता है।“ मरकाम ने दृढता से कहा।
दोनो टहलते हुए पल्ली गाँव तक पहुँच गये थे। मिशन स्कूल सामने ही दिख रहा था। कुछ
लड़के बाहर ही खेल रहे थे। मरकाम ने एक लड़के को हाँथ के इशारे से बुलाया।
“”बेटा क्या नाम है तुम्हारा?” उसने पूछा।
“’माईकल...” लड़के के अस्पष्ट सा जवाब और भाग गया।
“शैलेष तुम ढूंढोगे तो तुम्हे नाम अब पॉल, स्कॉट, माईकल जाने क्या क्या मिलेगें।
नये चलन में नितिन, किशोर, सुरेश और रमेश भी मिल जायेंगे। क्या जरूरी है कि धर्म
थोप दो, सोच थोप दो, नाम थोप दो, पहचान थोप दो?....? आदिवासी हिन्दू क्यों बने,
मुस्लिम क्यों बने, क्रिस्चियन क्यों बने? वो जैसा है वैसे ही क्यों न पहचाना जाये
और इसी तरह आगे बढ़े ?” मरकाम सचमुच तैश में आ गये थे।
“बात तो सही है सर। यह अपनी ही दुनिया है।”
“हाँ! हमारी दुनिया की उत्पत्ति भी अपनी तरह से हुई है। एक गोंडी मिथक कथा है जो
बस्तर के पालनार गाँव से जुड़ी हुई है। यहीं से जलप्रलय के साथ साथ ही पृथ्वी की
उत्पत्ति हुई है। सब तरफ पानी ही पानी था और पानी पर सिर्फ एक तूम्बा तैर रहा था।“
“तूम्बा वही जो लौकी से बनता है”
“यार तूम्बे के बिना बस्तर की पहचान ही कहाँ है? लौकी के जो फल बुढ़ा जाते हैं उसको
तोडकर उसका शीर्ष भाग काट लिया जाता है। इसके बाद सावधानी से भीतरी अंश को निकाल कर
इसे खोखला बना लेते हैं। अब खोखले भाग में पानी भर कर उसे एक जगह सुरक्षित रख दिया
जाता है। आठ दस दिनों में लौकी का भीतरी भाग पूरी तरह सड़ जाता है। सडे हुए अंश को
बाहर निकाल कर अच्छी तरह धो कर सुखा दो और तूम्बा तैयार। यह हम आदिवासियों का वाटर
बोटल, पेज कैरियर या सल्फी होल्डर सब कुछ है। इतना ही नहीं अंचल के कई वाद्य हैं
जैसे किंदरी, तोहेली, डुमिर, रामबाजा....इन सभी में तूम्बे का घट लगा होता है।
घोटुल मुरिया तो अपने कई नृत्यों में तूम्बों से भयानक मुखौटे भी बना कर प्रयोग में
लाते हैं। और हाँ एक भतरी कहावत भी तो है कि ‘तूम्बा गेला फूटी, देवा गेला उठी’।
तूम्बा का फूटना एक अपशकुन है।“
“सर हम विषय से भटक गये। आप बता रहे थे कि पालनार गाँव के पास से जलप्रलय के साथ
साथ ही पृथ्वी की उत्पत्ति हुई है। सब तरफ पानी ही पानी था और पानी पर सिर्फ एक
तूम्बा तैर रहा था।“
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“हाँ हाँ... इस तूम्बे में गोंडों का आदिपुरुष, डड्डे बुरका कवासी, अपनी पत्नी के
साथ बैठा हुआ था। तभी कहीं से भीमादेव प्रकट हुआ और हल चलाने लगा। जहाँ जहाँ वह
नागर चलाता धरती प्रकट होने लगती। जब दुनिया की आवश्यकता जितनी धरती बन गयी तब भीमा
ने हल चलाना बंद कर दिया। अब उसने पहली बार धरती पर अनाज, पेड-पौधे, लता-फूल, जड़ी
-बूटियाँ, घास-फूस उगा दिये। जहाँ जहाँ मिट्टी हल चलाने से खूब उपर उठ गयी थी, वहाँ
पहाड़ बन गये थे। इसके बाद डड्डे बुरका कवासी ने धरती पर अपनी गृहस्थी चलाई। उसको दस
लड़के और दस लडकियाँ हुईं। आपस में उनकी शादियाँ कर दी गयी। इस तरह दस गोत्र बन गये।
मुझे सभी गोत्र नाम याद हैं, आखिर मेरी उत्पत्ति की कहानी है।“ मरकाम मुस्कुराने
लगे।
“आपकी याददाश्त कमाल की है। आगे बताईये सर....” शैलेष की जानने की लालसा चरम पर थी।
“हमारे दस गोत्र हैं – मडकामी, मिडियामी, माडवी, मुचाकी, कवासी, कुंजामी, कच्चिन,
चिच्चोंड, लेकामी और पुन्नेम। इन्ही गोत्रों में किसी के पेट से बकरा तो किसी के
उल्लू तो किसी के साँप आदि पैदा हुए। इसी तरह पूरी सृष्टि बन गयी। ‘डड्डे बुरका
कवासी’ ने अपने बेटों को आदेशित कर दिया कि एक ही गोत्र में विवाह वर्जित है।“
“प्रलय और उसके बाद आदि पुरुष द्वारा सृष्टि की रचना का मिथक कई अलग अलग धर्मों की
मान्यताए भी हैं।“
“तो ये भी सुनो। बहुत पहले आकाश धरती के बहुत निकट था। एक बुढिया जब ओखली में मूसल
से धान कूटती थी तो वह बार बार आकाश से टकरा जाता था। गुस्से से उसने आकाश को मूसल
से टक्कर मार दी। ड़र के मारे आकाश इतनी उपर चला गया कि फिर नीचे उतरा ही नहीं। सभी
गोंड़ उसी बुढ़िया के वंशज हैं।” मरकाम मुस्कुरा दिया।
“सर बस्तर में कोई एक जाति तो है नहीं। अलग अलग जाति में हर का अपना विश्वास ऐसे
में एक सांस्कृतिक पहचान की बात भी कठिन है”
“शैलेष, ये तो मानोगे कि यहाँ सभी वनवासियों का जीवन - मांस, मंद और सल्फी है। सभी
निर्विवाद रूप से दंतेश्वरी माता, मावली माता, भीमादेव, भैरमदेव, पाटदेव, आंगादेव
आदि को मानते हैं। मेले मंडई और मुर्गा लड़ाई सभी के जीवन में है। गीत-नाच सबके खून
में दौडता है। सभी भूत-प्रेत, जादू-टोना, झाड-फूंक, सिरहा-गुनिया, पँजियार, पेरमा,
गाँयता, बालपा, लेसपा के बीच जीने के आदी है। ऐसी समानता काफी नहीं है? यही तो जीता
जागता धर्म है?”
“बात तो ठीक है आपकी”
“इस सांस्कृतिक ताकत से ही मुझे बस्तरिया होने का गर्व मिलता है। अंग्रेजों ने सारे
हिन्दुस्तान में तोड़ने का जो सफल प्रयोग किया, वही कोशिश यहाँ भी की गयी थी। राजा
भूपालदेव के समय की बात है। भोंसला राजा रघुजी तृतिय ने दंतेवाड़ा में मुस्लिम और
अरब सैनिकों की एक टुकडी अंग्रेजों के दबाव में आ कर भेज दी थी। कारण तुम समझ ही
सकते हो? उनकी समझ में भी आदिवासी हिन्दू थे और उनकी अपेक्षा थी कि मुस्लिम टुकडी
के कारण साम्प्रदायिक तनाव होंगे। आदिवासी इस कदम को देवी का अपमान समझेंगे। अरब
सैनिकों की टुकडी लगभग बाईस साल तक दंतेश्वरी मंदिर में तैनात रही। यहाँ लोग देवी
से सीधे जुड़े हुए हैं जैसे आत्मा और परमात्मा। उन्हें क्या मतलब कि हिन्दू क्या और
मुसलमान क्या? वर्ना जैसे दंगे देश भर में हो रहे हैं वैसों का अतीत में भी इतिहास
होता?”
“यह तो है”
“...और यार जरूरी है क्या कि हमारी पहचान को कोई भी धर्म अपने चश्मे से देखे? मुझे
पहचान मिटाने की इस साजिश से बहुत ड़र लगता है। और उन लोगों से भी ड़र लगता है जो आज
कल जंगल के भीतर हमारी लड़ाई लड़ने के नाम पर घुस गये हैं। इस सप्ताह मेरा एक आदिवासी
दोस्त लेक्चर देने लगा कि देवता झूठ है। मैने कारण पूछा तो पता चला कि जंगल के भीतर
नक्सलियों ने “बाबा कार्ल मार्क्स” की घुट्टी पिलायी है। बहुत खतरनाक है ये भी। यह
हमारी पहचान मिटाने की वैसी ही खतरनाक साजिश है जितना कि अपनी पहचान में हमे ढ़ालने
की कोशिश। कल मेरे पास मेरा अपना चेहरा नहीं होगा।“ मरकाम के मुख पर तमतमाहट थी।
दोनों अब धरमपुरा लौटने लगे।
02.03.2012, 00.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | Rajkumar Agrawal [rkagrawalbsp@gmail.com] Bilaspur - 2012-08-02 14:25:12 | | | |
Out of box news and articles. | | | | | | | | Chandram Banzarey [9425226597@indiatimes.com] manikpur colony, korba - 2012-06-12 03:22:31 | | | |
An excellent costly book on Bastar tribes. We find a vast description on Bastar tribal culture and customs in it. Congratulations to Rajiv for writing the novel. But description of the origin of Bastar customs and beliefs from Hinduism is unacceptable. A separate-angled research (not based on Hindu and Brahmin scriptures/beliefs)is needed to establish the origin. | | | | | | | | ramnath oima [oimagovindald@gmail.com] allahabad - 2012-05-07 13:27:43 | | | |
if you want to learn culture mythology and deep knowledge on gond tribale community you get born in gond community informatin and enterpretation is not enough to understand the gond community. | | | | | | | | श्याम बिहारी श्यामल [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] जगतगंज, वाराणसी, उप्र - 2012-03-18 23:15:49 | | | |
वाह... उपन्यास में करीने से बुना छत्तीसगढ़ के एक बड़े प्रक्षेत्र का सांस्कृतिक लोक-संसार...। लेखक ने बहुत ही रोचक ढंग से संबंधित आदिवासी समाज के आस्था-विश्वासों की जमीन को शब्दबद्ध किया है, बधाई। एक बात जिस पर ध्यान गया कि कई कथाएं ऐसी भी हैं जो झारखंड के आदिम समाज में भी प्रचलित हैं। आसमान और बुढि़या वाली कथा तो बिल्कुल इसी रूप में वहां भी कही-सुनी जाती है। ...बहरहाल, पूरी किताब के प्रति गहरी जिज्ञासा जगाने वाला अंश। उपलब्ध कराने के लिए \'रविवार\' का हार्दिक आभार... | | | | | | | | YOGESH CHANDAK [ykcchandak017@gmail.com] - 2012-03-06 06:35:00 | | | |
\"आदिवासी हिन्दू क्यों बने, मुस्लिम क्यों बने, क्रिस्चियन क्यों बने? वो जैसा है वैसे ही क्यों न पहचाना जाये और इसी तरह आगे बढ़े ?” राजीव जी, वास्तविक तथ्यों पर आधारित ये जानकारियां बहुत सहज-सरल व रोचक हैं. | | | | | | | | rahul [rahul@yashpublications.com] new delhi - 2012-03-02 13:09:16 | | | |
Heartiest Congratulations to author Rajeev Ji. | | | | | | |
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