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आमचो बस्तर

पुस्तक अंश

 

आमचो बस्तर

राजीव रंजन प्रसाद

आमचो बस्तर

आमचो बस्तर उपन्यास
राजीव रंजन प्रसाद
प्रकाशकः यश पब्लिकेशन
1/10753, गली नं-3, सुभाष पार्क, नवीन शहदरा, निकट कीर्ति मंदिर, दिल्ली 110 032
मूल्यः 795


6 दिसम्बर 1992 के बाद.....। रेड़ियो पर खबरों ने बताया कि मध्यप्रदेश सरकार बखास्त कर दी गयी है। बस्तर में शांति थी।

शाम के साढे पाँच का वक्त; शैलेष और मरकाम दादू की दूकान पर, चाय के साथ अखबार निगलने में व्यस्त थे। धरमपुरा में कहीं हो रहे रामायण पाठ की दूकान तक मद्धम आवाज पहुँच रही थी – ‘कोउ नृप होहुँ हमहि का हानी..”

“मरकाम सर क्या आदिवासी हिन्दू धर्म को मानते हैं?” शैलेष ने जिज्ञासा सामने रखी।

बड़ा स्वाभाविक प्रश्न था। बस्तर की हर आदिम जनजाति के किये इष्ट देवी की तरह पूज्य माँ दंतेश्वरी का मंदिर एक शक्तिपीठ है और यह भगवान शिव की दिवंगत पत्नी सती के दंतखंड़ के गिरने के स्थल के रूप में जाना जाता है।

“हिन्दू क्यों?”

“सर पूजा-अनुष्ठान, देवी-देवता, तंत्र-मंत्र बहुत कुछ हिन्दू समाज के चलन से एक रूपता रखता दिखता है।”

“बहुत घालमेल है शैलेष, चूंकि इस भूमि पर अनेकों राजवंशों का प्रभाव था। राजा के आचरण और विश्वास प्रजा की सोच-समझ के साथ जुड़ते चले गये। अनेकों किंवदंतियाँ देवी देवताओं और उनसे जुड़े विश्वास को ले कर हैं। बस्तर राज्य के पहले काकतीय राजा अन्नमदेव स्वयं भी देवी-देवताओं के साथ-साथ हमारे मिथक और धार्मिक लोक कथाओं का हिस्सा हो जाते हैं। धरती और प्रकृति हम आदिमों का धर्म है। मैं ‘हिन्दू’ कह कर अपनी पहचान को वर्गीकृत नहीं करना चाहता। देवी-देवता, तंत्र-मंत्र, अनुष्ठान-तिहार हो सकता है तुम्हे ऐसी छवि देते हैं लेकिन हमारी दुनियाँ अलग तरह से “बनी और बसी” मरकाम ने वाक्य समाप्त करते ही चाय सुड़सुड़ाई।

“हिन्दू समाज में माँ दंतेश्वरी पूज्य हैं। भैरम देवता के मंदिर भारत भर में हैं। बारिश का देवता इन्द्र ही है और भगवान शिव संहार के देवता।” शैलेष ने चर्चा आगे बढ़ाई।

“यार! देवी देवताओं पर धर्म और संस्कृति का कोई कॉपीराईट थोडे ही है। जरूरी है क्या कि हमारा इन्द्र और हिन्दू देवताओं का राजा इन्द्र एक ही हो? हमारी बस्तर भूमि का अपना मातृसत्तात्मक देव परिवार है। देवी दंतेश्वरी के साथ इस परिवार में भैरमदेव, पाटदेव और भीमादेव प्रमुख हैं।“

“सर अब आप फँस गये। चाय चाहे जितनी भी हो जाये इस विषय को पूरा करके ही उठेंगे”

“तो फिर थोड़ा टहल लेते हैं। पास में ईसाई मिशनरी, उनका स्कूल और हॉस्टल है। यहाँ आदिवासी बच्चों के लिये धर्म की अलग परिभाषा है। वहाँ तक चलते हैं”

“ठीक है सर, आप दंतेश्वरी देवी के परिवार का वर्णन कर रहे थे।“

“हमारी किंवदंतियों में दंतेश्वरी माता और भैरमबाबा किसी साधारण ग्रामीण दम्पति की तरह हैं। गोंडी में दंतेश्वरी माता को हम ‘यायाल मुत्ते’ नाम से बुलाते हैं। बड़ी रोचक कहानी है। दंतेवाड़ा में माता दंतेश्वरी और भैरमबाबा शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम के पास रहते थे। मुझे शायद भैरमबाबा को मिला कर उनके आठ भाईयों के नाम भी याद हैं – लिंगाभैरम, बनभैरम, जटाभैरम, चीनाभैरम, मटकुलभैरम, टुंडालभैरम, पाटभैरम और घाटभैरम।“

“सर आपका नॉलिज और आपकी याददाश्त को क्या कहूँ...” शैलेष की आँखों में प्रशंसा का भाव था।

“पूरी कहानी तो सुनो। एक दिन दंतेश्वरी माता जंगल से कोलियार भाजी तोड़ लायीं। भाजी काटते समय उनकी छोटी उंग्ली कट गयी और खून निकलने लगा। माई दंतेश्वरी ने उस समय भाजी में ही हाँथ पोछ लिया। बाद में वो भाजी को धोना भूल गयी और इस तरह खून से सनी भाजी पक गयी। भैरमबाबा जब खाने लगे तो उन्हें स्वाद कुछ अलग लगा। उन्होंने आज बनी स्वादिष्ट कोलियार भाजी का कारण पूछा। माई ने पहले तो नहीं बताया लेकिन भैरमबाबा के बार बार कारण जानने की जिद के आगे झुक कर उन्हें अपनी गलती बतानी ही पड़ी । भैरमबाबा के कारण जानते ही पति-पत्नी में झगड़ा हो गया। भैरमबाबा ने गुस्से में कहा कि आज तुमने मुझे मुझे अपना खून पिला दिया, क्या पता किसी दिन कोई आदमी ही खिला दोगी? हो सकता है मुझे ही मार दो? और इस तरह माई पर अपना गुस्सा निकालते हुए भैरमबाबा अपने निवास से निकल कर नीचे कूद पड़े। शैलेष तुमने तो शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम पर पत्थर में उभरे भैरमबाबा के पैरो के निशान देखे ही होंगे। इसका संबंध इसी मिथक से जुड़ा हुआ है। कहते हैं बाद में भैरम बाबा जिस जगह जा कर रहने लगे उस स्थान का नाम ही भैरमगढ़ पड़ गया”

“महत्व की जानकारी है।......ये भीमादेव कौन हैं?” शैलेष की रुचि इस विषय में जाहिर थी।
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

aaryan chiram [aaryanchiram@gmail.com] kodagaon(kanker) - 2015-03-30 03:37:15

 
  मुझे हल्बा जाति के बारे में अधिक जानकारी चाहिए 
   
 

Rajkumar Agrawal [rkagrawalbsp@gmail.com] Bilaspur - 2012-08-02 14:25:12

 
  Out of box news and articles. 
   
 

Chandram Banzarey [9425226597@indiatimes.com] manikpur colony, korba - 2012-06-12 03:22:31

 
  An excellent costly book on Bastar tribes. We find a vast description on Bastar tribal culture and customs in it. Congratulations to Rajiv for writing the novel. But description of the origin of Bastar customs and beliefs from Hinduism is unacceptable. A separate-angled research (not based on Hindu and Brahmin scriptures/beliefs)is needed to establish the origin. 
   
 

ramnath oima [oimagovindald@gmail.com] allahabad - 2012-05-07 13:27:43

 
  if you want to learn culture mythology and deep knowledge on gond tribale community you get born in gond community informatin and enterpretation is not enough to understand the gond community. 
   
 

श्‍याम बिहारी श्‍यामल [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] जगतगंज, वाराणसी, उप्र - 2012-03-18 23:15:49

 
  वाह... उपन्‍यास में करीने से बुना छत्‍तीसगढ़ के एक बड़े प्रक्षेत्र का सांस्‍कृतिक लोक-संसार...। लेखक ने बहुत ही रोचक ढंग से संबंधित आदिवासी समाज के आस्‍था-विश्‍वासों की जमीन को शब्‍दबद्ध किया है, बधाई। एक बात जिस पर ध्‍यान गया कि कई कथाएं ऐसी भी हैं जो झारखंड के आदिम समाज में भी प्रचलित हैं। आसमान और बुढि़या वाली कथा तो बिल्‍कुल इसी रूप में वहां भी कही-सुनी जाती है। ...बहरहाल, पूरी किताब के प्रति गहरी जिज्ञासा जगाने वाला अंश। उपलब्‍ध कराने के लिए \'रविवार\' का हार्दिक आभार...  
   
 

YOGESH CHANDAK [ykcchandak017@gmail.com] - 2012-03-06 06:35:00

 
  \"आदिवासी हिन्दू क्यों बने, मुस्लिम क्यों बने, क्रिस्चियन क्यों बने? वो जैसा है वैसे ही क्यों न पहचाना जाये और इसी तरह आगे बढ़े ?” राजीव जी, वास्तविक तथ्यों पर आधारित ये जानकारियां बहुत सहज-सरल व रोचक हैं. 
   
 

rahul [rahul@yashpublications.com] new delhi - 2012-03-02 13:09:16

 
  Heartiest Congratulations to author Rajeev Ji. 
   
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